Rambhadracharya Ji: एक बार सुनकर किसी भी विषय को कंठस्थ कर लेते हैं जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य
Rambhadracharya Ji: वे बचपन से ही नेत्रहीन है। इसके बावजूद उन्होंने अपने ज्ञान रूपी चक्षुओं से 22 से अधिक भाषाओं का ज्ञान हासिल किया तो 100 से अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। वे विश्व के पहले दिव्यांग विश्वविद्यालय के संस्थापक भी है।
सुप्रीम कोर्ट में उन्हीं के अकाट्य प्रमाणों का परिणाम है कि आज हिंदुस्तान में रामलला का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो चुका है। जी हां, हम बात कर रहे हैं संस्कृत विद्वान, तुलसीपीठ के संस्थापक व पद्मविभूषण जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी की।

जिन्हें हाल ही में केन्द्र सरकार ने ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा है। रामभद्राचार्य ही एक ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को हराकर जगद्गुरु का पद संभाला है। स्वामी विवेकानंद के बाद उनके पास ही ऐसी विलक्षण प्रतिभा है कि वह सुनकर ही विषय को कंठस्थ कर लेते हैं।
74 वर्षीय रामभद्राचार्य 36 वर्षों से है जगद्गुरु, जेआरएफ और पीएचडी की डिग्री भी
14 जनवरी 1950 को शाण्डीखुर्द, जौनपुर यूपी में जन्मे स्वामीजी के नेत्रों की ज्योति दो महीने में ही बीमारी से चली गई। इनका वास्तविक नाम गिरधर मिश्रा था। पांच साल की आयु में इन्होंने श्रीमद्भागवत तो सात वर्ष में संपूर्ण रामचरितमानस याद कर ली।
1973 में काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से नव्यव्याकरण में शास्त्री परीक्षा में सर्वाधिक अंक, 1975 में अखिल भारतीय संस्कृत वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम, तो 1978 में यूजीसी जेआरएफ पाने वाले वे पहले युवा संन्यासी बने।
1981 में रामभद्राचार्य ने 'आध्यात्मरामायणे अपाणिनीयप्रयोगाणां विमर्शः विषय पर पीएचडी की। 19 नवंबर 1982 को स्वामी रामभद्राचार्य ने चित्रकूट में तुलसीपीठ की स्थापना की। इसके 6 वर्ष बाद उन्हें 1988 में जगतगुरु रामानंदाचार्य पद पर सुशोभित किया गया। तब से लेकर आज दिन तक वे इस पद पर प्रतिष्ठित हैं। चित्रकूट में तुलसी पीठ की स्थापना करने वाले रामभद्राचार्य विश्व के पहले दिव्यांग विश्वविद्यालय के संस्थापक और आजीवन कुलाधिपति भी हैं।
चार महाकाव्यों व 100 से अधिक पुस्तकों का लेखन
रामभद्राचार्य संस्कृत, हिंदी, अवधी व मैथिली सहित कई भाषाओं के जानकार हैं। उन्होंने चार महाकाव्य सहित 100 से अधिक पुस्तकों और 50 शोध पत्रों का लेखन किया है। रामचरितमानस के एक महत्वपूर्ण संस्करण के संपादक के अलावा वे रामायण और भागवत के कथाकार हैं। इनके कथा कार्यक्रम भारत और अन्य देशों के विभिन्न शहरों में नियमित रूप से प्रसारित व आयोजित होते रहते हैं। वे विश्व हिंदू परिषद से भी जुड़े हुए हैं।
श्री रामभद्राचार्य की चर्चित रचनाओं में श्रीभार्गवराघवीयम्, अष्टावक्र, आजादचन्द्रशेखरचरितम्, लघुरघुवरम्, सरयूलहरी, भृंगदूतम् और कुब्जापत्रम् शामिल हैं। इसके अलावा पद्म विभूषण, देवभूमि पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, पूर्वांचल रत्न और राजशेखर सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
ऋग्वेद की जैमिनीय संहिता से उद्धरण देकर न्यायालय को किया चकित
सनातन धर्म में रामभद्राचार्य का नाम बहुत ही आदर व सम्मान के साथ लिया जाता है। इन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में रामलला के पक्ष में वेद पुराण के उद्धारण के साथ गवाही दी थी। महाराजश्री जब श्रीराम जन्मभूमि के पक्ष में वादी के रूप में उपस्थित थे तो उन्होंने ऋग्वेद की जैमिनीय संहिता से उद्धरण देकर सरयू नदी के स्थान विशेष से दिशा और दूरी का बिल्कुल सटीक ब्यौरा देते हुए श्रीराम जन्मभूमि की स्थिति बताई।
जिस पर कोर्ट के आदेश से जैमिनीय संहिता मंगाई गई और उसमें जगद्गुरु द्वारा निर्दिष्ट संख्या को खोलकर देखा तो समस्त विवरण सही था। जिस स्थान पर श्रीराम जन्मभूमि की स्थिति बताई गई, विवादित स्थल ठीक उसी स्थान पर है। जगद्गुरु के वक्तव्य ने फैसले का रुख पलट दिया। अब श्री रामभद्राचार्य जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।












Click it and Unblock the Notifications