Google Monopoly: क्या खत्म होने जा रहा है गूगल का एकाधिकार
Google Monopoly: इंटरनेट पर किसी भी तरह की जानकारी के लिए गूगल पर कीवर्ड्स डालकर खोजने की आदत हर इंटरनेट यूजर की हो चुकी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दुनियाभर में इंटरनेट पर सर्च इंजिन के रूप में गूगल का सबसे ज्यादा उपयोग होता है। हालांकि इंटरनेट की दुनिया में 21 अन्य सर्च इंजन भी हैं। लेकिन पिछले 20 सालों से गूगल अपना एकाधिकार बनाए हुए है। लेकिन अब इस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। अमेरिका में गूगल के खिलाफ यह गंभीर आरोप लगा है कि वह अपना दबदबा बनाए रखने के लिए सालाना 10 अरब डॉलर कुछ खास कंपनियों पर खर्च करता है। यह एक गंभीर आरोप है। इस पर मामला कोर्ट में पहुंच गया है।
गूगल पर क्या है आरोप
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस का आरोप है कि गूगल अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए अनुचित तरीका अपना रही है। और इसके जरिए कंपनी भारी भरकम लाभ कमा रही है। डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने कोर्ट में गूगल के खिलाफ केस करके दावा किया है कि कंपनी ने एप्पल समेत दुनिया के बड़े स्मार्टफोन निर्माताओं के साथ एक गोपनीय समझौता किया है। इस समझौते के तहत इन कंपनियों के स्मार्टफोन पर सर्च इंजिन के रूप में गूगल को डिफॉल्ट स्टेटस में कर दिया गया है। यानी यूजर जब भी कुछ खोजना चाहेगा तो सर्च इंजिन के रूप में उसके सामने गूगल ही आएगा। इससे विज्ञापनदाता कंपनियां भी सबसे ज्यादा विज्ञापन गूगल को ही देती है। कारण साफ है क्योंकि सबसे ज्यादा यूजर गूगल को ही सर्च के लिए यूज करेंगे।

समझौते से स्मार्टफोन निर्माताओं को क्या है फायदा
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस का आरोप है कि गूगल इस समझौते के बदले में इन कंपनियों को सालाना 10 अरब डॉलर देती है। यानी ये कंपनियां गूगल से पैसे लेकर अपने फोन पर गूगल को डिफॉल्ट स्टेटस पर रखती हैं। और यूजर को जब कुछ भी खोजना होता है तो उसके सामने दूसरे सर्च इंजिन नहीं आते हैं। इस तरह गूगल ने सर्च और सर्च इंजन विज्ञापन के बाजार में अपनी स्थिति प्रभावी बना ली है।
यूजर को किस तरह प्रभावित करता है गूगल
डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस का कहना है कि यह एक तरह से बाजार और कारोबार के नैतिक मानदंडों के खिलाफ है और यूजर के अधिकारों का भी उल्लंघन है। यूजर सर्च इंजिन के रूप में किसका उपयोग करे या न करे, यह चयन करना पूरी तरह से उसका अधिकार है। कोर्ट में पेश केस के मुताबिक गूगल ने एक तरह से लोगों की चॉइस के अधिकार को ही खत्म कर दिया है। गूगल सर्च के कारोबार में अनुचित तरीके से लगातार अपनी ग्रोथ कर रहा है। अब गूगल पर खोजे जाने वाले डिजिटल विज्ञापन और उनके नतीजे भी जांच के दायरे में हैं। इसमें डिस्प्ले वीडियो और विज्ञापन आदि शामिल हैं।
किसके खिलाफ दायर किया गया है केस
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने गूगल की मालिक कंपनी अल्फाबेट इंकॉरपोरेट के खिलाफ केस किया है। इसका मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया स्थिति माउंटेन व्यू में है। फिलहाल इसके चेयरमैन जॉन एल हेनेसी और सीईओ भारतीय मूल के सुंदर पिचाई हैं। अल्फाबेट इंकॉरपोरेट की स्थापना गूगल ने 2 अक्टूबर 2015 को की थी जबकि गूगल की स्थापना 4 सितंबर 1998 को हुई थी। गूगल के इतिहास में उसके खिलाफ यह सबसे बड़ा मुकदमा है। अगर गूगल पर आरोप साबित हो जाते हैं तो दुनियाभर में गूगल के कारोबार और उसकी प्रतिष्ठा पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
अब क्या करेगी अमेरिकी सरकार
अमेरिकी सरकार ने गूगल की मालिकाना कंपनी अल्फाबेट पर इंटरनेट सर्च इंजिन कारोबार में अनुचित और गैरकानूनी तरीके से एकाधिकार कायम करने के खिलाफ सबूत कोर्ट के सामने रखेगी। अगले 10 हफ्ते तक अमेरिका के वकील और वहां के अटार्नी जनरल यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि गूगल कैसे अपने सर्च इंजिन को डिफॉल्ट स्टेटस के रूप में लॉक करके रखता है। सरकार के वकील और अटार्नी जनरल यह भी साबित करने की कोशिश करेंगे कि डिजिटल विज्ञापन स्पेस में गूगल का रवैया एकाधिकार वाला है। यह अपने छोटे प्रतिस्पर्धियों और छोटी कंपनियों को पनपने नहीं देती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यूजर को हर हाल में गूगल पर ही आने को विवश करती है।
अपनी सफाई में क्या कहना है गूगल का
गूगल ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह अपनी उत्कृष्टता और अपने कर्मचारियों की कड़ी मेहनत की वजह से दुनिया भर के यूजर्स में सर्वाधिक लोकप्रिय है। उसने कहा कि कंपनी लगातार यह सुनिश्चित करती है कि उसकी सेवा यूजर के लिए उपयोगी हो और सभी के लिए मुफ्त हो। उसने अपने सभी समझौतों को कानूनी रूप से वैध तथा बाजार के नियमों और कारोबार की आचार संहिता के अनुकूल बताया। गूगल का कहना है कि वह अपने यूजर्स को अधिक से अधिक सुविधाजनक और उपयोगी सेवा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
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