अब नहीं बजती टेलीफोन की घंटी Trin. Trin..
याद आता है मुझे वो समय जब घर के ड्राइंग रूम में एक चोंगे वाला बेसिक फ़ोन रखा रहता था। घर में एक घंटी क्या बजी सभी उसे उठाने के लिए लपके। वो भी क्या दिन थे जब फ़ोन लाइन की तारों से घरों के छज्जे पर जाल बना रहता था। चिड़ियाँ और कौवे उसी पर बैठे चेह्कते और कौव्वाते रहते थे। आज ना तो वो फ़ोन की लाईनें दिखती हैं और न ही चिड़ियाँ। सब न जाने कहाँ गुम गये।
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उन दिनों रिश्तों की अहमियत हुआ करती थी। आज मोबाइल नाम का यंत्र सबके पास हैं और दूरियां तो बस नाम भर की हैं लेकिन रिश्ते भी अब दूरियों की तरह ही केवल नाम भर के रह गये हैं।
एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल ने किया टेलीफोन का अविष्कार
आपको बता दूं की टेलीफोन का अविष्कार यूएसए के एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल ने 10 मार्च 1876 में किया था। पहले टेलीफोन लाइन के लिए लोहे के तारों का प्रयोग होता था जो बाद में ताम्बे के तारों से बदल दिया गया जो छज्जे छज्जे से होकर जाने लगीं | धीरे धीरे तकनीकी विस्तार होता गया और यह तार अंडर
ग्राउंड हो गये ।
टेलीफोन प्रणाली में स्विच बोर्ड एक जरूरी अंग
सबसे पहले की टेलीफोन प्रणाली में स्विच बोर्ड एक जरूरी अंग होता था, इसकी डिजाइनिंग बड़ी टाइप्ड होती थी। यह केद्रीय टेलीफोन केंद्र यानि की टेलीफोन एक्सचेंज में रहता था ।सभी टेलीफोन इससे जुड़े होते थे। सभी टेलिफोन के नंबर इस बोर्ड पर लिखे रहते थे और हर एक नम्बर के ऊपर एक छोटा सा बल्ब लगा होता था। जब आपका टेलीफोन उठता था तो यह बल्व जल उठता था और इसके सामने बैठा हुआ टेलिफोन ऑपरेटर एक प्लग की मदद से अपने हेडफोन का कनेक्शन आपके टेलीफोन से स्थापित करता था।
टेलीफोन की घंटी
आपसे टेलीफोन नंबर मालूम करके वह आपके टेलिफोन का संबंध उस टेलिफोन से स्थापित करता था और अपने सामने लगे हुए बटन को दबाकर उस दूसरे टेलिफोन की घंटी बजाता था। इस तरह से वह दूसरे स्थान के व्यक्ति को सूचना देकर आप दोनों की वार्ता प्रारंभ करता था। अगर कनेक्शन सही नहीं रहा तो यह प्रक्रिया और जटिल हो जाती थी |
डायल फोन का ज़माना
फिर आया डायल फोन का ज़माना जो सीधे दुसरे से कनेक्शन बनाता था और इसके लिए किसी बीच के आदमी की जरूरत नही होती थी। इस पर एक गोल चकरी लगी होती थी जिसमें 0 से 9 तक के अंक होते थे। उस चकरी पर निर्धारित नम्बरों के छल्ले में ऊँगली डाल कर उसे घुमाना होता थे जिससे डायरेक्ट उससे कांटेक्ट होता था जिससे आपको बात करनी है।
1973 में मार्टिन कूपर ने किया मोबाइल फोन का अविष्कार
धीरे धीरे समय बदला और इसकी डिजाईन बदल गयी और फिर 1973 में मार्टिन कूपर द्वारा मोबाइल फोन के अविष्कार के बाद फोन की दुनिया में विरानगी छा गयी। इसके आने से बड़ी सहूलियतें हुई लेकिन इसने लोगों को झूठ बोलना सिखा दिया।
जब भी घंटी बजती है..
टेलीफोन बेचारा अब सिर्फ ब्रॉडबैंड के लिए इस्तेमाल होता है | मेरे घर के बीच वाले कमरे में रखा हुआ वो सफ़ेद टेलेफोन आज भी मुझे देख रहा है | कभी कभी जब उसमे छ आठ दिन में कोई घंटी बजती है तो उसकी आवाज़ सुन कर मैं बहुत खुश हो जाती हूँ | बचपन की धुन सुनाई देने लगती है ।
टेलीफोन की आँखों का दर्द
जब कभी मैं उसके चोंगे को उठा कर कोई नम्बर मिलाती हूँ तो उस टेलीफोन की आँखों ( जो सिर्फ मुझे दिखती है ) में मुझे बड़ी चमक दिखती है | कुछ आंसू भी दिखते हैं जो मुझसे कहते हैं धन्यवाद तुमने आज मुझे इस्तेमाल किया पर तुरंत वही आंसू दुःख में बदल जाते है यह कहते हुए की उसे मालूम है अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं।
जरूरत के हिसाब से होती है चीजें
बुरा लगता है उसे देख कर, जैसे की कोई बूढा नौकर जो पहले बड़े उत्साह के साथ घर के लिए काम करता था पर अब कमजोर होकर एक कोने में पड़ा है और उसे कोई नही पूछता, अब तारों पर चिड़ियाँ नहीं चहकती,समय का चक्र है, कल मैं भी ऐसी ही हो जाउंगी।













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