Tea: रोचक है चाय के भारत आने की कहानी
Tea: दुनिया में पानी के बाद सबसे अधिक चाय पी जाती है। वर्ष 2022 में 6.7 अरब किलोग्राम चाय की खपत हुई थी और अनुमान के अनुसार वर्ष 2025 में 7.4 अरब किलोग्राम चाय की खपत हो जाएगी। चीन और भारत से होकर पूरी दुनिया में पहुंचने वाली चाय की दर्जनों किस्में हैं और कई तरीके से इसका सेवन हो रहा है। सबसे ज्यादा चाय तुर्किए के लोग पीते हैं। उनकी प्रति व्यक्ति खपत सालाना तीन किलो से भी अधिक है। भारत में एक आदमी एक साल में औसतन 750 ग्राम चाय की पत्ती से बनी चाय पी जाता है तो चीन में 560 ग्राम पत्ती की चाय लोग पीते हैं।
चाय आई कहां से?
चीनी लोक कथाओं के अनुसार, चाय का इतिहास 2737 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था, जब एक कुशल शासक और वैज्ञानिक सम्राट शेन नोंग ने गलती से चाय की खोज की। बगीचे में पानी उबालते समय, ऊपर लटके जंगली चाय के पेड़ से एक पत्ता उसके बर्तन में चला गया। सम्राट को पानी पीने में इतना आनंद आया कि वह पौधे पर और अधिक शोध करने के लिए मजबूर हो गया। किंवदंती है कि सम्राट ने अपने शोध के दौरान चाय के औषधीय गुणों की खोज की थी।

भारत में चाय का इतिहास
आमतौर पर भारत में चाय उत्तर पूर्वी भागों और नीलगिरी की पहाड़ियों में उगाई जाती है। आज भारत दुनिया में चाय का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसमें से 70 प्रतिशत की खपत अकेले भारत में ही होती है। हजारों साल पहले भारत में बौद्ध भिक्षुओं ने चाय का इस्तेमाल औषधीय कार्यों के लिए किया था। इसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है।
दरअसल, भारत में चाय पीने की परंपरा दो हज़ार साल पहले एक बौद्ध भिक्षु के साथ शुरू हुई थी। वर्ष 520 में उन्होंने चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भारत छोड़ दिया। बाद में वह जैन धर्म के प्रचारक बने। कुछ जैन सिद्धांतों को साबित करने के लिए उन्होंने नौ साल तक बिना सोए ध्यान करने की कसम खाई। ऐसा कहा जाता है कि जब वे अपने ध्यान के पांचवे साल में थे, तो उन्होनें झाड़ियों में से कुछ पत्ते लिए और उन्हें चबाना शुरू कर दिया।
इन पत्तियों ने उन्हें पुनर्जीवित रखा और उन्हें जागते रहने के लिए सक्षम बनाया। जब भी उन्हें नींद महसूस होती थी तो वो इस प्रक्रिया को ही दोहराते थे। इस तरह से वे सात साल लगातार अपनी तपस्या पूरा करने में सफल रहे। ये पत्ते कुछ और नहीं, बल्कि चाय के पौधे के पत्ते थे। इस तरह से चाय भारत में आई। भारत के पूर्वोत्तर में असम, कछार, दोआर और दार्जिलिंग में चाय का उत्पादन सबसे अधिक होता है।
चाय और ईस्ट इंडिया कंपनी
छठी शताब्दी में चाय पीने की परंपरा चीन से जापान पहुंची। एक बौद्ध भिक्षु द्वारा चाय चीन से जापान लाई गई। चाय जापान में शाही दरबार और बौद्ध मठों से लेकर जापानी समाज में बहुत तेजी से फैली। धीरे-धीरे इसकी खबर यूरोप तक पहुंची। चीन से चाय का व्यापार करने का पहला अधिकार पुर्तगाल को मिला। इंग्लैंड में चाय के नमूने 1652 और 1654 में पहुंचे। एशिया महाद्वीप में चाय का आगमन 19वीं शताब्दी में हुआ था, जब ब्रिटिश शासकों ने सीलोन और ताइवान (तब फार्मोसा) में चाय की खेती शुरू की।
18वीं सदी में अंग्रेजों के लिए बिना चाय के रहना नामुमकिन सा हो गया था, इसलिए जब चीन ने अंग्रेजों के साथ चाय का व्यापार अचानक समाप्त कर दिया तो अंग्रेजों और चीन के बीच संबंध बदल गए। जिसके बाद भारत में औद्योगिक चाय का उत्पादन शुरू हुआ। भारत में चाय का उत्पादन ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के उत्तर पूर्वी भाग में शुरू किया था। 19वीं सदी के अंत में असम में चाय की खेती का पहला बागान चीनी कंपनी द्वारा ही शुरू किया गया था।
1823 और 1831 में ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी रॉबर्ट ब्रूस और उसके भाई चार्ल्स ने ये पुष्टि की थी कि चाय का पौधा असम क्षेत्र में मौजूद है। इसके बाद कोलकाता में स्थापित बॉटनिकल गार्डन के अधिकारियों को इसके बीज और पौधों का नमूना भेजा गया। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक समिति का गठन किया, जिसमें चार्ल्स ब्रूस को भारत में चाय की पैदावार बढ़ाने का काम दिया गया। ब्रूस ने पहले नर्सरी स्थापित की और बाद में चीन से 80,000 चाय के बीज एकत्र किये।
नर्सरी में स्थापित बीज को गुणवत्ता के आधार पर छंटाई कर असम की देसी झाड़ियों की पत्तियों के साथ प्रयोग करके काली चाय का निर्माण किया गया। उन्होंने चीन से दो चाय निर्माताओं की भर्ती की और उनकी मदद से तेजी से चाय के उत्पादन के रहस्यों को भी सीखा। इस तरह से चाय एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रचलित होती गई और अब यह एक आम आदमी का पसंदीदा पेय बन गई है।
चाय के प्रकार
चाय भारत में दार्जलिंग, असम, काँगड़ा, नीलगिरी, अन्नामलाई, कर्नाटक, मुन्नार, त्रावणकोर और वायनाड आदि स्थानों पर उगाई जाती है। दुनिया में चाय की तीन प्रमुख किस्में है - इण्डियन टी, चायना टी और हाइब्रिड टी। इन चाय की किस्मों से ही चाय के विभिन्न प्रकार जैसे- ग्रीन टी, वाइट टी और हर्बल टी आदि उत्पादित होते हैं।
पीने के अतिरिक्त चाय के अन्य फायदे
कमाल की बात तो यह है कि भारत में चाय का इस्तेमाल अब स्वास्थ्य कैप्सूलों को बनाने के लिए भी किया जा रहा है। चाय पत्ती नाइट, काली चाय, हरी चाय और हर्बल चाय से प्राप्त किए जाते हैं और ये न्यूरो डिजनरेशन रोगों जैसे अल्जाइमर और पार्किंसन आदि को रोकने में और कैंसर, दिल की बीमारियों का मुकाबला करने में भी प्रभावी होते हैं। ये पॉली पेय पदार्थ, सौन्दर्य प्रसाधनों, खाद्य परिरक्षकों आदि में भी प्रयोग होते हैं।
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