Balochistan: बलूचिस्तान में विद्रोह, पाकिस्तान के एक और विभाजन की स्थिति

Balochistan: इस्लामाबाद में इन दिनों बलूच अपने गायब हुए कारीबियों की फ्रेम की हुई तस्वीरें लेकर सड़कों पर डटे हुए हैं। वे इस उम्मीद के साथ आए हैं कि एक दिन अधिकारी उनकी बात सुन लेंगे और उनके पिता, पति या भाई को वापस कर देंगे।

Insurgency in Balochistan create situation of another partition of Pakistan

बलूचिस्तान के 2,200 लोग गायब हैं और किसी को पता नहीं कि उन्हें कहां रखा गया है। वे जिंदा भी हैं या नहीं?

बलूच मौजूदा पाकिस्तान में अलग-थलग और परित्यक्त महसूस कर रहे हैं, जैसे कि वे अपने ही देश में कोई विदेशी, आतंकवादी या आप्रवासी हों। मीडिया भी उनसे अनगिनत सवाल करता है। राजनेता और नौकरशाह उनसे बात तक नहीं करते। हर गुज़रते दिन के साथ, निराशा की भावना और भी गहरी होती जा रही है।

इस्लामाबाद के शिविर बच्चों, उनकी माताओं से भरे हुए हैं। कड़कड़ाती ठंड के मौसम में खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री उन पर लाठीचार्ज को सही ठहराते है, उन्हें दुश्मन देश का एजेंट बताते हैं। अदालत और आयोग से भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हो रहा है। इसी बीच बलूचिस्तान में अलग देश की मांग भी जोर पकड़ रही है। जानते हैं कि क्या है बलूचिस्तान में विद्रोह का मामला और कैसे पाकिस्तान के एक और विभाजन की संभावना बढ़ रही है?

जब बलूचों ने 15 अगस्त, 1947 को की थी स्वतंत्रता की घोषणा

पाकिस्तान दुनिया का सबसे ज्यादा जातीय और भाषाई समूहों में बंटा देश है। प्रत्येक प्रांत एक निश्चित भाषाई समूह से जुड़ा हुआ है। पंजाबी बहुल पंजाब, सिंधियों के लिए सिंध, बलूचों के लिए बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा पश्तूनों का प्रांत है। बलूचिस्तान में पश्तून, सिराकी और सिंधी भी अच्छी-खासी संख्या में है।

बलूच जिस बलूचिस्तान की बात करते हैं उनमें कलात, खारन, मकरान और लासबेला भी शामिल हैं। बलूचों ने पाकिस्तान के औपचारिक अस्तित्व में आने के एक दिन बाद 15 अगस्त, 1947 को अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। तब की कलात विधानसभा के दोनों सदनों ने पाकिस्तान के साथ बलूचिस्तान के विलय को अस्वीकार कर दिया था। हालांकि बाद में कलात के राजा खान को पाकिस्तान ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर कर दिया, पर इसके साथ ही बलूचिस्तान में खूनी आंदोलन शुरू हो गया।

बलूच राष्ट्रवादी नेता प्रिंस अब्दुल करीम ने झालावन क्षेत्र में एक सशस्त्र आंदोलन शुरू कर दिया। बाद में पाकिस्तान के हुक्मरानों ने इस क्षेत्र को टुकड़े टुकड़े में विभाजित करना शुरू कर दिया। इसका एक बड़ा हिस्सा पंजाब में मिला दिया गया और सिंध, एनडब्ल्यूएफपी और बलूचिस्तान को एक प्रांत में बदल दिया गया। इस मनमाने पूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ दूसरा बलूच विद्रोह शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व मीर नोरोज़ खान ज़हरी ने किया। बाद में कुछ शर्तों के साथ उसने आत्मसमर्पण किया, लेकिन उसे उसके साथियों के साथ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और जेल में ही उसकी मृत्यु हो गयी।

जनरल जिया की दोहरी नीति

1970 में पाकिस्तान के आम चुनाव में बलूच राष्ट्रवादियों ने नेशनल अवामी पार्टी (एनएपी) के बैनर तले चुनाव लड़ा और अच्छा प्रदर्शन किया। वे अपनी सरकार बनाने में सफल रहे, लेकिन फरवरी 1973 में अताउल्लाह मेंगल की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। एक बार फिर इस्लामाबाद के साथ तीव्र टकराव की स्थिति पैदा हो गई और विद्रोह का एक नया दौर शुरू हो गया। लगभग 11,500 बलूच लड़ाकों के खिलाफ 80,000 से अधिक सैन्य बल को उनके प्रतिरोध को कुचलने के लिए उतारा गया। हालांकि जिया-उल-हक ने हिरासत में लिए गए बलूच नेताओं के लिए सामान्य माफी की घोषणा कर कुछ सकारात्मक संकेत दिया, लेकिन उन्होंने भी बलूचिस्तान से सैनिकों की वापसी की माँग नहीं मानी।

इस्लामाबाद द्वारा लगातार शोषण किए जाने के कारण बलूचों के मन मे अब अलगाव की भावना उच्चतम स्तर पर है। संसदीय ढांचे के तहत न्याय नहीं मिलने के कारण ही नौजवान बंदूक उठा रहे हैं। बलूचिस्तान में सैन्य कार्रवाई भी जारी है और सुलह के प्रयास फेल होते दिखाई दे रहे हैं।

बद से बदतर होता जा रहा है बलूचिस्तान

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे कम विकसित और सबसे पिछड़ा प्रांत है। बलूचिस्तान में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 58 प्रतिशत है। साक्षरता दर भी सबसे कम केवल 29.81 प्रतिशत है। पुरुष साक्षरता केवल 18.3 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 10 प्रतिशत से भी कम महिलाएं साक्षर हैं। मुख्य रूप से खेती यहाँ जीविका का साधन है। बलूचिस्तान के अधिकांश निवासियों के लिए दो समय की रोटी मुश्किल है।

बलूच लोग क्या सोच रहे हैं और महसूस कर रहे हैं, इसकी किसी को भी चिंता नहीं है। बलूचिस्तान जल रहा है, और काफी समय से जल रहा है। कभी पाकिस्तानी शासकों ने बांग्ला को गैर-मुस्लिम और दूषित भाषा कहकर उपहास किया था, आज बलूच लोगों को वे ही अपमानजनक रूप से बलूची कहते हैं। वे बलूचिस्तान को एक आदिवासी समाज मानते हैं। वर्तमान विद्रोह को सीआईए, रॉ और मोसाद समर्थित आतंकवादी कार्रवाई बताते हैं।

बलूचों के लिए है अलग कानून

शिक्षा के लिए आंदोलनरत यासमीन बलूच लिखती हैं - "स्कूलों में छात्र सुविधाओं से वंचित हैं, न तो पानी की अच्छी व्यवस्था है और न ही अच्छे शिक्षक। बलूचों की प्रतिभा को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन संस्थानों और समाज में अवसरों की उपलब्धता न होना उन्हें दबाव में रखता है। बलूचिस्तान में छात्रों के सामने कई समस्याएं हैं।"

"सरकार और मीडिया बलूचिस्तान के मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके उलट बलूच छात्रों के अपहरण और उनकी हत्या के साथ डंप नीति ने भी बलूचों को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ दिया है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का वह प्रांत है, जहां सबसे अधिक निरक्षरता है। सरकार बुनियादी अधिकार देने का आश्वासन तो देती है लेकिन लोग भूख-प्यास से मर जाते हैं। बलूचों का कहना है कि हम अनपढ़, अशिक्षित और मूर्ख नहीं हैं, इस्लामाबाद की निर्दयता हमें असफलता की ओर धकेल देती है।"

पाकिस्तान में आतंकवादियों और अपराधियों को भले ही सलाखों में नहीं डाला जाता है, लेकिन बलूचिस्तान में छात्रों द्वारा अपने हक की आवाज उठाने पर उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया जाता है। बलूचों के लिए पाकिस्तान में कानून, नियम और फैसले अलग हैं। हमेशा उन्हें मौलिक अधिकारों और सम्मान पूर्वक जीवन से वंचित रखा जाता है।

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