Justin Trudeau: खालिस्तानियों के प्रति जस्टिन ट्रुडो की नरमी पर भारत नाराज
Justin Trudeau: कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो जी20 के कुछ उन बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्होंने दिल्ली सम्मेलन के दौरान कुछ अलग कारणों से अखबारों की हेड लाइन में जगह पाई। 10 सितंबर को उनका जहाज खराब हो गया था, जिसके कारण उन्हें रात यहीं बितानी पड़ी। पूरी दुनिया के अखबारों ने उनके बारे में यही छापा। भारत की अध्यक्षता में जी20 सम्मेलन में दिल्ली आने वाले मेहमानों में संभवतः वे अकेले ऐसे मेहमान थे, जिन्हें भारतीय राजनयिकों और नेताओं ने वो तव्वजो नहीं दी, जो बाइडेन, सुनक और बाकी के मेहमानों को दी। कारण, जस्टिन टूडो बेहतर जानते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक अच्छे मेजबान के नाते उनके अलग से मुलाकात की, लेकिन उन मुलाकातों में जो बात हुई, वह कनाडा के प्रधानमंत्री को समझ में आ गई होगी। कनाडा खालिस्तानी समर्थकों का गढ़ बनता जा रहा है और प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की चिंता से उन्हें ठीक से अवगत करा भी दिया। गार्जियन अख़बार ने लिखा भी है कि ट्रूडो के प्रति भारतीय लीडरशिप का ठंडा व्यवहार ओटावा में दक्षिणपंथी सिख अलगाववादियों से निपटने को लेकर उनकी सरकार और जी20 के मेजबान भारत के बीच तनाव के कारण रहा।

जस्टिन की वोट बैंक की राजनीति
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो को नई दिल्ली में संपन्न जी20 की बैठक में ज्यादा तवज्जो नहीं मिली, तो वहीं कनाडा में अपने वोट बैंक की राजनीति के चलते ट्रुडो ने भी सम्मेलन में कोई विशेष उत्साह नहीं जताया। विश्व के प्रमुख मीडिया गार्जियन ने विशेष तौर पर लिखा है कि जी20 शिखर सम्मेलन में ट्रूडो की उपस्थिति उनके जी7 समकक्ष राष्ट्रीय अध्यक्षों की तुलना में कम महत्वपूर्ण थी।
भारत के विरोध के बाद कार्रवाई का दिखावा
कनाडा की सड़कों पर आए दिन खालिस्तानियों के हिंसक प्रदर्शन का नजारा देखने को मिल रहा है। वहां मंदिरों और भारतीय दूतावास को निशाना बनाया जा रहा है। खालिस्तानी समर्थक न केवल भारतीय दूतावास के बाहर पहुंचकर हंगामा करते हैं बल्कि भारत विरोधी नारे भी लगाते हैं। कनाडा में रहने वाला भारतीय समुदाय भी इन घटनाओं से आहत है। उनका मानना है कि खालिस्तान समर्थकों का विरोध प्रदर्शन अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि चरमपंथ को बढ़ावा देने जैसा है। भारत द्वारा विरोध दर्ज करने के बाद भी ट्रूडो सरकार इसके खिलाफ किसी तरह का कदम उठाती नहीं दिखती। यही कारण है कि भारत और कनाडा के रिश्तों में खालिस्तान के मुद्दे का असर जी.20 में भी देखने को मिला।
इंदिरा गांधी हत्याकांड की झांकी निकाली
कनाडा में खालिस्तानी समर्थक लंबे समय से हंगामा और विरोध प्रदर्शन करते आए हैं लेकिन कुछ समय से उनकी घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हाल ही में खालिस्तान समर्थकों ने भारतीय दूतावास के बाहर खालिस्तानी झंडा लहराया, तो इंदिरा गांधी हत्याकांड की झांकी निकाली। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में हिंदू मंदिर के बाहर दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखे और साथ ही तोड़फोड़ की गई। खालिस्तानी समर्थकों ने भारतीय दूतावास के हाई कमिशनर संजीव कुमार वर्मा और टोरंटो में कॉन्सुलेट जनरल अपूर्वा श्रीवास्तव का पोस्टर जारी किया जिस पर लिखा था किलर्स इन टोरंटो। इन घटनाओं पर भारत के विरोध के बावजूद भी ट्रूडो सरकार चुप रही।
कनाडा सरकार ने भारत के आरोपों को गलत बताया
करीब दो महीने पहले भारत सरकार ने कहा था कि कनाडाई सरकार खालिस्तानी आतंकियों पर कार्रवाई के नाम पर नरम रुख अपना रही है। इसके बाद ट्रूडो ने अपनी ही सरकार का बचाव करते हुए भारत के आरोपों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि कनाडा में अलग अलग विचारधारा के लोग रहते हैं और हर किसी को अपनी बात रखने का हक है। उनकी सरकार आतंकवाद को लेकर गंभीर है और ये सोच गलत है कि खालिस्तान समर्थकों को लेकर उनका रवैया लचीला है। लेकिन भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सीधे तौर पर कहा कि कनाडा की सरकार वोट बैंक के कारण खालिस्तानी समर्थकों पर एक्शन नहीं ले रही है।
आठ लाख की सिख आबादी पर सभी दलों की नजर
कनाडा में विभिन्न राजनीतिक दलों का सिखों के प्रति प्रेम नया नहीं है। वहां जो दल सत्ता में आता है, वह सिखों की मांगों का समर्थन करता आया है। क्योंकि कनाडा में सिख वोट बैंक काफी मायने रखता है। ये न केवल ट्रूडो की लिबरल पार्टी बल्कि कंजर्वेटिव और जगमीत सिंह की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए भी अहम है। यहां सिख आबादी आठ लाख के करीब है। सिखों के प्रति कनाडाई पीएम इतने उदार हैं कि उन्हें मजाक में जस्टिन सिंह ट्रूडो भी कहा जाता है। वर्ष 2015 में ट्रूडो ने कहा था कि उन्होंने जितने सिखों को अपनी कैबिनेट में जगह दी है, उतने तो भारत की कैबिनेट में भी नहीं है। उस वक्त उनकी कैबिनेट में चार सिख मंत्री थे। इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि कनाडा की राजनीति में सिखों का कितना वर्चस्व है। गौरतलब है कि किसान आंदोलन के दौरान भी ट्रूडो ने भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा था कि यह स्थिति चिंताजनक है। हम सभी प्रदर्शनारियों के परिवारों और दोस्तों को लेकर चिंतित हैं।
पांच साल पहले भारत दौरे में नहीं मिली थी तवज्जो
जस्टिन ट्रूडो 2018 में भी अपने परिवार के साथ सात दिवसीय भारत दौरे पर आए थे। तब भी तनाव साफ दिख रहा था। ट्रूडो को भारत सरकार की तरफ से खास तवज्जो नहीं दी गई। उनका स्वागत भी तत्कालीन कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया था, जो जूनियर लेवल के मंत्री थे। इसके अलावा जब वो ताज महल देखने आगरा गए तो सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी उनकी अगवानी नहीं की। इस दौरान जस्टिन पीएम मोदी के गृहनगर गुजरात पहुंचे, तो अकेले ही अहमदाबाद घूमे। अपनी यात्रा के छठे दिन उन्होंने पीएम मोदी से मुलाकात की। मोदी ने भी उनके आने पर कोई वेलकम ट्वीट नहीं किया। उस समय केंद्र सरकार ने कहा कि जस्टिन अपनी निजी यात्रा पर भारत आए हैं। अगर वे सरकारी यात्रा पर आते तो प्रोटोकॉल का पालन किया जाता।












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