GDP Growth: जीडीपी में तेजी, क्या परिणाम देगी

विपक्ष कहता है कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। चारों ओर महंगाई है, बेरोजगारी है। गरीब और पिसते जा रहे हैं और कुछ लोगों के हाथों में देश की संपत्ति पहुंच रही है। सरकार कहती है कि चारों ओर खुशहाली है। करोड़ों लोग गरीबी रेखा से उपर आ चुके हैं। प्रति व्यक्ति आय दुगनी हो गई है। अपनी बात को वजन देने के लिए सरकार लगातार जीडीपी के आंकड़े पेश कर रही है, जो कि पिछली तिमाही में 7.8 प्रतिशत रही। यह वाकई दुनिया में सबसे तेज जीडीपी वृद्धि दर है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि जीडीपी क्या है? और जीडीपी में यह तेजी, क्या परिणाम देगी?

जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट। हिंदी में इसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। यह सकल घरेलू उत्पाद समस्त वस्तुओं के उत्पादन और सेवाओं का सामूहिक मूल्य है। इसमें देश की समस्त आर्थिक गतिविधियों को सम्मिलित करते हैं। इसलिए इसकी वृद्धि दर का सीधा मतलब, वस्तुओं के उत्पादन एवं सेवाओं में अनुपातिक वृद्धि। इसको दो तरीके से मापते हैं। एक एक्चुअल या रियल जीडीपी और दूसरा नॉमिनल जीडीपी।

GDP Growth

रियल या वास्तविक जीडीपी से आशय वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य से मुद्रा स्फीति की दर को घटा कर गणना करना। यानी यदि इस समय 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर है और मुद्रा स्फीति 7 फीसदी है तो वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर आधे प्रतिशत के आस पास ही है। नॉमिनल जीडीपी का मतलब बिना मुद्रा स्फीति को समायोजित किए हुए वस्तुओं और सेवाओं का बाजार मूल्य। सरकार अपने जीडीपी के आंकड़े को नॉमिनल जीडीपी के रूप में ही प्रदर्शित करती है।

जीडीपी में तेजी का सीधा मतलब है कि देश की आर्थिक गतिविधियों में विस्तार और तेजी आ रही है। यदि सरकार मुद्रा स्फीति की दर को काबू में रखती है तो देश के आर्थिक क्षेत्र के लाभ में बढ़ोतरी होती है और हमारी कंपनियों में अतिरिक्त निवेश की क्षमता बढ़ती है और फिर देश में नए रोजगार का सृजन होता है। भारत के मामले में यह स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

जीडीपी में बढ़ोतरी के साथ साथ मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर भी बढ़ी है। भारत में खुदरा मूल्य मुद्रास्फीति जुलाई 2023 में बढ़कर 7.44 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल 2022 के बाद सबसे अधिक है, जबकि जून में मुद्रा स्फीति की दर 4.87 प्रतिशत थी, जबकि पूर्वानुमान 6.4 प्रतिशत का था।

पिछले दो महीनों में ही सब्जियों के दाम 37.3 प्रतिशत, मसालों के 21.6 प्रतिशत, अनाज के 13 प्रतिशत, दालों के 13.3 प्रतिशत और दूध के दाम 8.3 प्रतिशत बढ़ गए। इस कारण खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 11.51 प्रतिशत हो गई, जो जनवरी 2020 के बाद सबसे अधिक है। रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति की दर को 4 प्रतिशत के नीचे रखने का लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन वास्तविक मुद्रा स्फीति कुछ और ही है। विपक्ष के लिए यह सरकार की नाकामी है। पर सरकार इसे यूक्रेन युद्ध जैसा अंतरराष्ट्रीय संकट और अनियमित मानसून को जिम्मेदार बता रही है।

आर्थिक विकास की अवधारणा और इसकी राष्ट्रीय आय के साथ तुलना का प्रचलन औद्योगिक क्रांति के बाद हुआ जब 1930 के दशक में, नोबेल पुरस्कार विजेता, साइमन कुज़नेट्स ने राष्ट्रीय सांख्यिकी के बारे में विस्तार से लिखते समय अमेरिका की राष्ट्रीय आय के मापक के रूप में जीडीपी का उपयोग करने का प्रचार किया।

जीडीपी की गणना के लिए विभिन्न तरीके उपलब्ध हैं। भारत में जीडीपी की गणना की सांख्यिकी और कार्यक्रम मंत्रालय के तहत केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय करता है। सांख्यिकी कार्यालय जीडीपी की गणना के लिए आवश्यक आंकड़े विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकार की एजेंसियों और विभागों से प्राप्त करता है। हमारे देश में जीडीपी की गणना दो तरीकों से की जाती है, एक लागत के आधार पर और दूसरा वस्तुओं एवं सेवाओं की बाजार कीमतों पर। लागत के आधार पर जीडीपी की गणना में मुख्य तौर पर आठ उद्योगों के आंकड़ों का उपयोग करते हैं- कृषि, वानिकी, मछली पकड़ने, खनन और उत्खनन, विनिर्माण, बिजली, गैस, जल आपूर्ति और निर्माण इनमें शामिल हैं। इनमें से कुछ आंकड़े राज्य सरकारों से प्राप्त होते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या जीडीपी में तेजी कुछ परिणाम देगी। तो जवाब है- हां। पिछले कुछ साल के जीडीपी के आंकड़े और प्रति व्यक्ति आय के बीच सीधा संबंध दिखाई देगा। 2022 में प्रति व्यक्ति जीडीपी 2389 डॉलर थी, जो कि 2021 के प्रति व्यक्ति जीडीपी 2238 डॉलर के मुकाबले 6.72 प्रतिशत अधिक थी। उसी तरह 2020 में प्रति व्यक्ति जीडीपी में 2019 के मुकाबले 19.68 प्रतिशत अधिक थी और 2019 में 2018 के मुकाबले 3.84 फीसदी अधिक।

फिर भी जीडीपी आर्थिक विकास का अकेला मापदंड नहीं हो सकता। जीडीपी सकल राष्ट्रीय उत्पाद की तुलना में अर्थव्यवस्था की सेहत मापने का अधिक उपयोगी उपाय है, जो एक निश्चित समय अवधि के दौरान देश के निवासियों की कुल आय को समझने के लिए सबसे सार्थक आंकड़ा है। फिर भी देश के आर्थिक विकास को सही तौर पर समझने के लिए दो अन्य और महत्वपूर्ण मानदंड हैं। एक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और मूल्य निर्धारण शक्ति यानी मुद्रास्फीति और दूसरा साप्ताहिक गैर-कृषि पेरोल सहित मासिक बेरोजगारी रिपोर्ट। इन्हीं दोनों आंकड़ों के आधार पर विपक्ष सरकार को घेरने में लगा है।

सरकार द्वारा जारी 14 अगस्त, 2023 को जारी आंकड़े के अनुसार जुलाई में खुदरा मूल्य सूचकांक 7.44 था, जबकि अनुमान 6.40 प्रतिशत का लगाया गया था। इसी तरह 12 जुलाई का जो आंकड़ा जारी किया गया उसके अनुसार खुदरा मूल्य सूचकांक 4.81 था, जो 4.58 प्रतिशत के अनुमान से थोड़ा ज्यादा था। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी, जो कि एक निजी संगठन (सीएमआईई) है, का अनुमान है कि वर्तमान में भारत में बेरोजगारी दर लगभग 7.95 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्र में यह 7.93 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण भारत में केवल 7.44 प्रतिषत। इस आधार पर हम कह सकते हैं जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद आम आदमी के जीवन में बहुत उत्साह का कारण नहीं है। हां, यदि महंगाई दर पर सरकार काबू पाती है, रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है तो निश्चित रूप से जीडीपी में तेजी कुछ बेहतर परिणाम देगी।

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