आखिरकार रात के अंधेरे में ही क्यों दी जाती है फांसी?
पटना। आज तक देश में जब भी किसी मुजरिम को फांसी की सजा दी जाती है तो रात के अंधेरे में दी जाती है। दरअसल अंधेरे में फांसी देने का नियम आज से नहीं बल्कि सदियों पुराना है।
मुगल काल में भी अगर किसी को फांसी की सजा मुकद्दर की जाती थी तो उन्हे दिन के उजालों में नहीं बल्कि रात के अंधेरे में फांसी पर लटका दिया जाता था और अगर बात करें अंग्रेजी हुकूमत की तो उनके द्वारा भी फांसी देने का तरीका यही था।
रात के अंंधेरे में ही आतंक का खात्मा
जानकारों की अगर मानें तो फांसी की सजा उसी मुजरिम को दी जाती है जिसके आतंक से इंसान कांप उठता है। उसे रात के अंधेरे में इसलिए फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाता है कि जब कल नया सवेरा होगा तो इसके आतंक का खात्मा हो चुका रहेगा।
जेल के सारे काम दिन के उजालों में
तो दूसरी तरफ अंधेरे में फांसी देने का कारण यह भी है कि जेल के सारे काम दिन के उजालों में किए जाते हैं। अगर दिन के उजालों में फांसी की सजा दी जाती है तो अन्य कामकाज ठप हो जाएंगे। इसको देखते हुए रात के अंधेरे में ही मुजरिम को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाता है।
आईये अब आपको बताते हैं कि फांसी देते वक्त क्या-क्या चीजें अनिवार्य होती हैं...
डॉक्टर की भूमिका अहम रहती है: जब भी किसी मुजरिम को फांसी पर लटकाया जाता है तो उससे पहले डॉक्टर के द्वारा चेकअप किया जाता है। जब डॉक्टर यह बता देते हैं कि मुजरिम पूर्ण रुप से स्वस्थ है तो उसे फांसी पर लटकाया जाता है। वहीं फांसी पर लटकने के 10 मिनट बाद एक बार फिर डॉक्टर चेकअप करते हुए यह बताते हैं कि फांसी दिए हुए व्यक्ति की मौत हो चुकी है। जब डॉक्टर के द्वारा यह कहा जाता है कि उसकी मौत हो चुकी है तो उसे फांसी के फंदे से निकाला जाता है।
जेल प्रशासन के द्वारा की जाती है मेहमान नवाजी: जब भी किसी कुख्यातो को फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए लाया जाता है तो उससे पहले जेल प्रशासन के द्वारा मेहमान नवाजी करते हुए उसकी आखरी इच्छा पूछी जाती है। यह इसलिए किया जाता है कि जेल मैनुअल मे यह नियम बनाया गया है। आखरी इच्छा पूछे बगैर किसी को फांसी के तख्ते पर नहीं लटकाया जाता है।
जल्लाद मांगता है माफी: मुजरिम को फांसी देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जल्लाद की ही होती है। क्योंकि इसी के द्वारा मुजरिम के गले में फांसी का फंदा डाला जाता है तथा रस्सी खींचा जाता है। अपने आपको पापों से बचाने के लिए जल्लाद फांसी देने के वक्त मुजरिम से माफी मांगते हुए अगर मुजरिम हिंदू है तो राम राम करते हुए रस्सी खींचता है और अगर वो मुस्लिम है तो उसे सलाम करते हुए रस्सी खींचने का काम करता है। वहीं रस्सी खींचने के बाद जल्लाद के द्वारा यह कहा जाता है कि हो सके तो मुझे माफ कर देना। क्योंकि मैं हुकुम का गुलाम हूं।
मजिस्ट्रेट से लेकर प्रशासन के वरीय पदाधिकारी : फांसी की सजा देने से पहले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ,जेल अधीक्षक के साथ-साथ प्रशासन के अन्य वरीय पदाधिकारी को मौजूद रहना पड़ता है। क्योंकि फांसी की सजा जिस वक्त मुकर्रर होती है उसी वक्त यह तय कर दिया जाता है कि इसे इतने बज कर इतने मिनट में फांसी के तख्ते पर लटकाना है। इसमें कोई गड़बड़ी ना हो इसके लिए प्रशासन के वरीय अधिकारी मौके पर मौजूद रहना पड़ता है।













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