..तो मुख्यमंत्रियों को हराने के विशेषज्ञ बन जाएंगे केजरीवाल!

Varanasi-kejriwal
वाराणसी। जंगमबाड़ी इलाके में पान की दुकान पर खड़े कुछ युवकों के समूह से आवाज आई- "लहर भले मोदी की है, लेकिन यहां एक यह नारा भी तैर रहा है-अभी तो शीला हारी हैं, अब मोदी की बारी है। इस नारे की सच्चाई हालांकि 16 मई को सामने आ जाएगी।"

कान में आवाज आते ही कदम रुक गए। दरअसल, इसी नारे पर आम आदमी पार्टी (आप) के समर्थकों पर वाराणसी में हमले हो रहे हैं। लेकिन वहां खड़े एक युवक ने कहा, "भाई साहब, यहां ऐसा कुछ नहीं है। हम सभी मित्र हैं। बस समझ लीजिए यह हमारी संसद चल रही है।" बिल्कुल संसद की ही तरह सभी भिड़े हुए थे, लेकिन थे आपस में मित्र।

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चंद मिनट बाद कांग्रेस समर्थक दो साथी अपनी बात रख सदन से बहिगर्मन कर गए। फिर मोदी समर्थक राम बाबू ने भड़ास निकाली। वह भी पान घुलाते हुए खिसक लिए। बच गए कारोबारी राजेश यादव और कल्लू भाई। दोनों ने फिर वही नारा दुहराया। पता चला कि दोनों केजरीवाल समर्थक हैं।

दोनों युवकों से रुखसत होने के बाद मैं इस नारे की गहराई नापने में जुट गया। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला (दीक्षित) को पटखनी देने के बाद अरविंद केजरीवाल अब गुजरात के मौजूदा मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पटखनी देने की बात कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर 'मुख्यमंत्री' ही उनके निशाने पर क्यों हैं?

शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री के रूप में लगातार तीन कार्यकाल पूरे किए। मोदी भी बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकाल पूरे कर चुके हैं। शीला चौथी पारी खेलने की कोशिश में चुनाव हारी हैं, मोदी मगर प्रधानमंत्री बनने की जुगत में हैं।

अरविंद केजरीवाल ने शीला को जब हराया था, तब उन्होंने राजनीति में कदम रखे ही थे। आज उनके नाम के आगे पूर्व मुख्यमंत्री का तमगा है। दिल्ली में उनकी पार्टी का जनाधार रहा है, लेकिन वाराणसी उनके लिए बिल्कुल नई जगह है, जहां उन्हें तमाम तरह के विरोधों से जूझना पड़ रहा है।

केजरीवाल में शीला को हराने की जो जिद थी, वही जिद आज वाराणसी में भी बरकरार है। वह दिन-रात वाराणसी में घाट-घाट का पानी पी रहे हैं, और गांव-गांव की खाक छान रहे हैं। अपने सवाल के जवाब के लिए मैंने भी वाराणसी संसदीय क्षेत्र के शहरी और ग्रामीण इलाकों की खाक छानी।

मोदी और केजरीवाल दोनों के पक्ष में जवाब मिले।कबीरचौरा इलाके में दवाखाना चलाने वाले डॉ. प्रदीप मिश्रा कहते हैं कि मोदी की हार की कल्पना कैसे की जा सकती है।

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पिपलानी कटरा इलाके के निवासी संगीतकार नरेंद्र त्रिपाठी मोदी की जीत को काशी की अस्मिता से जोड़ते हैं। वह कहते हैं, "मोदी की जीत बनारस की अस्मिता से जुड़ा है। बनारस भाजपा का गढ़ है। तीन विधानसभा क्षेत्रों पर भाजपा का कब्जा है। उसे अपना दल का समर्थन भी है।

फिर मोदी की जीत पर संदेह कैसे हो सकता है।"लेकिन मीरापुर बसही निवासी अपना दल के ब्रह्मचारी एक चौंकाने वाली बात कहते हैं। वह कहते हैं कि उनकी पार्टी का सारा वोट केजरीवाल को जा रहा है।

लोगों के नब्ज टटोलने पर पता चला कि अपना दल ही नहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोगों का झुकाव भी अब केजरीवाल की ओर है। सेवापुरी विधानसभा क्षेत्र के बसपा सेक्टर प्रभारी महेंद्र ने कहा, "बसपा उम्मीदवार ने दो गाड़ियां भेजी थीं, एक दिन बाद ही खिंचवा ली। तब हमने भी झाड़ू उठा लिया। केजरीवाल की स्थिति मजबूत है।"

महेंद्र ने कहा कि यही स्थिति रोहनिया विधानसभा क्षेत्र में भी है। सेवापुरी के बड़ौरा गांव निवासी अध्यापक राजकुमार यादव यों तो समाजवादी पार्टी (सपा) से जुड़े रहे हैं, लेकिन इस बार वह केजरीवाल के साथ हैं। वह स्पष्ट कहते हैं, "सपा उम्मीदवार तो मुकाबले में भी नहीं हैं। फिर वोट क्यों बर्बाद किया जाए। हम लोग इस बार केजरीवाल के साथ हैं।"

वहीं, आजाद बुनकर संघ के अध्यक्ष हाजी अब्दुल्ला बताते हैं, "बनारस के बुनकर केजरीवाल के साथ हैं। बाकी मुसलमानों का भी यही रुझान है। मुद्दा मोदी को हराने का है।"बातचीत का निष्कर्ष यह कि सपा, बसपा और अपना दल का वोट केजरीवाल के पक्ष में जा सकता है।

वाराणसी में कुल 15,32,438 मतदाता हैं। इसमें लगभग तीन लाख व्यापारी, इतने ही मुस्लिम, लगभग दो लाख ब्राह्मण, इतने ही कुर्मी, लगभग डेढ़ लाख भूमिहार, इतने ही दलित, लगभग सवा लाख यादव और बाकी अन्य जातियों के लोग शामिल हैं। बातचीत के निष्कर्ष को यदि जातीय समीकरण की कसौटी पर परखें तो केजरीवाल की झोली वोटों से भरती दिख रही है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक आनंद दीपायन कहते हैं, "लोगों का रुझान सही है। मतदान के दिन तक यदि यही रुझान बना रहा तो परिणाम केजरीवाल के पक्ष में जा सकता है।"

रुझान वोट में बदला और केजरीवाल अगर वाराणसी में मोदी को शिकस्त दे देते हैं, तो बेशक वह मुख्यमंत्रियों को हराने के 'विशेषज्ञ' माने जाएंगे। उन्होंने वाराणसी में कदम रखने के बाद जिस बिंदु से शुरुआत की थी, तब और अब की स्थिति में काफी फर्क दिख रहा है। मोदी को हराने की कठिन चुनौती स्वीकार करते हुए, तमाम विरोधों का सामना करते हुए अपनी मेहनत से वह हालात को अपने पक्ष मोड़ लेंगे, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आज भी शायद ही कोई मानने को तैयार हो कि बनारस का परिणाम चौंकाने वाला हो सकता है।

आप के एक नेता को मगर विश्वास है कि यहां का नतीजा सुनकर देश चौंकेगा। उन्होंने नाम न जाहिर करने के अनुरोध के साथ कहा, "केजरीवाल हमेशा अकल्पित और चौंकाने वाले परिणाम देते हैं, और वाराणसी में भी यही होने जा रहा है।" बहरहाल, बनारस की जनता इन सभी कयासों को विराम देते हुए 12 मई को अपना अंतिम निर्णय देगी, जिसकी घोषणा 16 मई को होगी।

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