IAS Transfer: जानिए कैसे होती है आईएएस/आईपीएस अधिकारियों की ट्रांसफर, क्या हैं नियम
ऑल इंडिया सर्विसेज 1969 के नियम 7 के अनुसार राज्य सरकार के तहत काम करने वाले सिविल अधिकारियों पर केंद्र सरकार कोई एक्शन भी नहीं ले सकती है। अधिकारियों की ट्रांसफर पर केंद्र और राज्य दोनों की सहमति जरूरी है।

IAS Transfer: देश के अनेक राज्यों से ताबड़तोड़ आईएएस व आईपीएस के तबादलों की खबरें आ रही है। हाल ही में पंजाब सरकार ने 39 आईएएस का तबादला किया है। तो वहीं राजस्थान में भी गहलोत सरकार ने बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 74 आईएएस अफसरों के तबादले कर दिए। 18 मई को उत्तराखंड की सरकार ने भी बड़े स्तर पर प्रशासनिक फेरबदल किये थे। राज्य सरकार ने 24 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए हैं। जबकि यूपी की बात करें तो योगी सरकार ने भी DGP और एडिशनल DGP स्तर के आईपीएस अधिकारियों के तबादले किए है। वहीं 19 मई को 7 बड़े आईएएस अधिकारियों के तबादले भी किये गए हैं।
दिल्ली सरकार ने भी आईएएस व अन्य उच्च अधिकारियों के तबादलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। जिसके बाद कोर्ट ने दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था। पर केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023' जारी कर दिया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर किन नियमों के तहत राज्य सरकार तबादले करती है और क्यों इसकी जरूरत पड़ती है।
अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग के नियम
ऑल इंडिया सर्विसेज 1969 के नियम 7 के अनुसार राज्य सरकार के तहत काम करने वाले सिविल अधिकारियों पर केंद्र कोई भी एक्शन भी नहीं ले सकता है, जिसमें तबादले से संबंधित मामला भी शामिल है। अगर किसी खास हालात में एक्शन लेने की नौबत आ भी जाए तो केंद्र और राज्य दोनों की सहमति जरूरी है। वहीं इंडियन पुलिस सर्विस 1954 के नियम 6(1) के अनुसार राज्य को केंद्र की बात माननी पड़ती है।
राज्य सरकारें भी किसी खास एरिया में कोई बड़ा अधिकारी अपनी पावर का गलत इस्तेमाल न करने लगे इसलिये इन अधिकारियों का ट्रांसफर दो तीन वर्षों में कर देती है। शादी होने पर पति-पत्नी यदि एक ही स्टेट कैडर में नौकरी करना चाह रहे हों तो राज्य सरकार केंद्र सरकार से परामर्श कर एक अधिकारी का ट्रांसफर दूसरे कैडर में कर सकती है। एक अन्य जानकारी यह है कि एक आईएएस या आईपीएस अधिकारी को उसके गृह जिले में पोस्टिंग नहीं मिलती है। ऐसा इसलिए होता है ताकि वे अपने जानने वालों के प्रति विशेष झुकाव ना रख सकें।
डेपुटेशन पर संशोधन करना चाह रही केंद्र सरकार
केंद्र सरकार जल्द ही आईएएस (कैडर) नियम, 1954 में संशोधन करने जा रही है। इस संशोधन के प्रस्ताव के संबंध में राज्य सरकारों से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आईएएस अफसरों की सूची भेजने के निर्देश दिए गए है। दरअसल, अधिकारियों की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार आईएएस कैडर रूल 1954 में संशोधन कर ऐसा प्रावधान करने पर विचार कर रही है जिसमें राज्य से अधिकारियों को केंद्र में बुलाने के लिए संबंधित राज्य सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकार जिस अधिकारी को चाहेगी उसे केंद्र में जिम्मेदारी सौंप सकती है। हालांकि केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव का पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सरकार ने लिखित रूप से विरोध किया है।
अब तक के चर्चित तबादले
हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के तबादलों का सफर बेहद चर्चाओं में रहा है। इस अधिकारी के 28 सालों की सर्विस के भीतर 50 से ज्यादा तबादले किए गए। हिमाचल प्रदेश के 1982 आईएएस बैच के अफसर विनीत चौधरी का 31 साल के करियर में 52 बार ट्रांसफर हुआ था। तो वहीं पंजाब कैडर के कुसुमजीत सिद्धू का अपने कार्यकाल के दौरान 46 बार तबादला हुआ था। वहीं असम-मेघालय कैडर के विंस्टन मार्क सिम्सन को 36 साल के करियर में 50 बार ट्रांसफर की गाज झेलनी पड़ी थी। वहीं आईएएस प्रदीप कासनी जोकि हरियाणा कैडर से थे, उनका 34 साल की सर्विस में 71 बार ट्रांसफर हुआ था।
केंद्र शासित प्रदेश की सरकार नहीं कर सकती अधिकारियों के तबादले
सबसे पहले दिल्ली सरकार का मामला जान लेते हैं, जो पिछले कई दिनों से इसी मामले में सुर्खियों में रहा। दिल्ली सरकार के पास अधिकारियों को ट्रांसफर करने के अधिकार नहीं थे। यहां संविधान को समझने की जरूरत है। सबसे पहले अनुच्छेद 239एए को समझते हैं, जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट में भी बार बार हुआ। इस अनुच्छेद के तहत दिल्ली की स्थिति अन्य राज्यों या केंद्र शासित क्षेत्र से अलग है। साथ ही अनुच्छेद 239एए में दिल्ली में विधानसभा का प्रावधान किया गया है ताकि स्थानीय आकांक्षाओं की पूर्ति हो सके। इसके पीछे यह उद्देश्य कभी नहीं रहा कि यूटी पर स्थानीय सरकार का नियंत्रण हो और यह केंद्र सरकार के नियंत्रण से बाहर हो। दिल्ली के उपराज्यपाल के पास अन्य राज्यपालों की तुलना में अधिक शक्तियां हैं।
दूसरे राज्यों की तरह दिल्ली के पास पुलिस, कानून-व्यवस्था और भूमि संबंधी अधिकार नहीं हैं। वह इनसे जुड़े कानून नहीं बना सकती है। इमरजेंसी की स्थिति में उपराज्यपाल फैसले ले सकते हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल सरकार के हक में फैसला सुनाया। पर केेंद्र सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर केजरीवाल सरकार को फिर उसी पायदान पर ला दिया जहां वो पहले थी। इसके अनुसार दिल्ली के अफसरों के तबादले का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहेगा, दिल्ली सरकार के पास नहीं। इसका मतलब ये हुआ कि केजरीवाल सरकार चाह कर भी अधिकारियों के तबादले नहीं कर सकती है।












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