स्वतंत्रता सेनानी पं. राम प्रसाद बिस्मिल के जीवन से जुड़ी रोचक बातें
History of Ram Prasad Bismil: जब-जब काकोरी कांड की बात आती है, तब-तब स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल का नाम तुरंत जहन में आ जाता है। इसके अलावा 1918 के मैनपुरी कांड में भी बिस्मिल ने बड़ी भूमिका निभाई। बिस्मिल वो नाम है, जिसने महज 30 साल की उम्र में देश के लिये इतना कुछ कर दिया कि आज 119 साल बाद भी उन्हें याद किया जाता है। चलिये बात करते हैं बिस्मिल के जीवन के उन पहलुओं को जो इतिहास बने और उन्हें भी जो बहुत कम लोग जानते हैं।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है....
राम प्रसाद 'बिस्मिल' एक बेहतरीन लेखक भी थे। और उनका गीत सरफरोशी की तमन्ना... आज भी जब लोग सुनते हैं, तो शरीर में एक अजब सी ऊर्जा दौड़ जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस गीत को तो हर कोई गुनगुनाता है, लेकिन इसके इतिहास से बहुत कम लोग ही वाकिफ हैं।
सरफरोशी की तमन्ना... का इतिहास
एक दिन स्वतंत्रता सेनानी अशफाक उल्ला खां आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये। अशफाक उस वक्त शायराना मूड में थे और अचानक जिगर मुरादाबादी की चंद लाइनें गुनगुनाने लगे। लाइनें थीं-
"कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है।
जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।"
बिस्मिल सुन कर मुस्कुरा दिये। अशफाक को अटपटा लगा और कहा, "क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?" बिस्मिल ने जबाब दिया- "नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूं मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बडा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।"
उस वक्त अशफाक को कुछ अच्छा नहीं लगा और चुनौती भरे अंदाज में कहा, "तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।" बिना कुछ बोले राम प्रसाद बिस्मिल' ने कहा-
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजु-कातिल में है?"
यह सुनते ही अशफाक भावविभोर हो गये और बिस्मिल को गले लगा लिया। फिर बोले - "राम भाई! मान गये; आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।"
बिस्मिल का जीवन
- बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था।
- उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था।
- अंग्रेजी स्कूल से पढ़ाई की लेकिन हिन्दी अपने पिता से सीखी।
- बिस्मिल उर्दू पढ़ने के लिये मौलवी के पास जाते थे।
- बिस्मिल हर रोज आर्य समाज मंदिर जाया करते थे।
- दिल्ली से भागे तो पुलिस को लगा बिस्मिल मर गये।
फांसी की खबर ने जगायी क्रांति की आग
जब हर दयाल के साथी भाई परमानंद को फांसी दी गई, तो उसकी दास्तां पढ़कर स्वामी सोमदेव को गुस्सा आ गया। बिस्मिल को भी बड़ा आघात पहुंचा और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के कुकर्मों को एक कविता में पिरो दिया। कविता थी, "मेरा जन्म"। उन्होंने अपनी कविता सोमदेव को भी सुनायी और वहीं से वे सोमदेव के अच्छे मित्र बन गये। पढ़ाई पूरी करने के बाद बिस्मिल लखनऊ आ गये। यहीं से उनकी जंग का सफर शुरू हुआ।
यूपी के युवाओं में भरी क्रांति की ऊर्जा
बिस्मिल ने एक क्रांतिकारी संगठन बनाया, जिसका नाम था मात्रिवेदी और औरैया के पंडित गेंडालाल दीक्षित से संपर्क किया। दीक्षित और सोमदेव के साथ मिलकर एक योजना बनायी। दीक्षित कुछ डकैतों को जानते थे। बिस्मिल उन डकैतों का इस्तेमाल अंग्रेजों के खिलाफ जंग में करना चाहते थे। इसी के समानांतर बिस्मिल ने एक शिवाजी समिति बनायी, जिसमें इटावा, मैनपुरी, आगरा और शाहजहांपुर के युवाओं को जोड़ा। देखते ही देखते दोनों संगठन मजबूत हो गये।
28 जनवरी 1918 को बिस्मिल ने एक पैफलेट बांटी, जिसमें लिखा था, "देशवासियों के नाम एक संदेश। उसमें एक कविता थी मैनपुरी की प्रतिज्ञा" अपने संगठन को मजबूत करने के लिये बिस्मिल के संगठन ने 1918 में तीन बार लूटपाट की। ये लूटपाट पुस्तक बिक्रेता के रूप में कीं। जब पुलिस ने पकड़ा तो किताबें छोड़कर बिस्मिल फरार हो गये।
जब पुलिस को लगा मर गये बिस्मिल
जब बिस्मिल अपने साथियों के साथ दिल्ली और आगरा गये, तो पुलिस से मुठभेड़ हुई। दोनों तरफ से गोलियां चलीं। बिस्मिल यमुना नदी में कूद पड़े और पानी के अंदर से तैरते हुए दूर निकल गये। पुलिस को लगा कि बिस्मिल मुठभेड़ में मारे गये। उस वक्त दीक्षित को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन दीक्षित पुलिस की हिरासत से भागने में कामयाब हुए।
बाद में पुलिस को पता चला कि बिस्मिल जिंदा हैं, तो 1 नवंबर 1919 को मैनपुरी के मजिस्ट्रेट बीएस क्रिस ने दोनों के खिलाफ गैरजमानती वॉरंट जारी कर दिया।
1919 से लेकर 1920 तक बिस्मिल अंडरग्राउंड हो गये और वेश बदलकर उत्तर प्रदेश के तामाम गांवों में विचरण करते रहे। इस बीच उन्होंने कई किताबें लिखीं, जो अलग-अलग नामों से प्रकाशित हुईं।
महात्मा गांधी की विचारधारा के विपरीत थी बिस्मिल की सोच
1920 में जब मैनपुरी से सभी अपराधी छूट गये, तब बिस्मिल ने एक नया संगठन बनाया। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन। 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस में भी वे शामिल हुए। उसके बाद जब वे उत्तर प्रदेश लौटे तो एक के बाद एक सभाएं कीं। लोग बिस्मिल से बहुत ज्यादा प्रभावित हो गये। फरवरी 1922 में जब चौरी-चौरा में अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे किसानों को मौत के घाट उतार दिया, तब बिस्मिल को बड़ा आघात पहुंचा। हालांकि गुस्साये लोगों ने 22 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया था।
अहिंसा की बात करने वाले महात्मा गांधी का विरोध करने के लिये बिस्मिल गया गये। यही वो मौका थाा, जब इंडियन नेशनल कांग्रेस के चितरंजन दास ने इस्तीफा दे दिया। उसी वक्त कांग्रेस दो भागों में टूट गई। एक तरफ मोती लाल नेहरू और दूसरी तरफ चितरंजन दास। तभी युवा इकाई बिस्मिल के नेतृत्व में बनी।
काकोरी कांड में कहां हुई चूक
बिस्मिल ने अपने साथियों के साथ मिलकर 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया। 10 लोगों ने शाहजहांपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन को लखनऊ के पहले काकोरी में रोका और सरकारी खजाने को लूट लिया। इस कांड को अंजाम देने के लिये जर्मन पिस्तौलों का इस्तेमाल किया।
राम प्रसाद बिस्मिल के साथी अशफाख उल्ला खां ने अपनी पिस्तौल मनमथ नाथ गुप्ता को दे दी और खुद कैश को ट्रेन से उतारने में जुट गये। नई पिस्तौल को देख रहे मनमथ की उंगली से ट्रिगर दब गया और सामने अहमद अली नाम का यात्री आ गया। गोली लगने से अहमद की मौत हो गई। असल में अहमद अपनी पत्नी को देखने के लिये लेडीज़ कम्पार्टमेंट की ओर जा रहा था।
इस कांड में 40 गिरफ्तारियां हुईं। पुलिस ने उन्हें भी पकड़ा, जो इसमें शामिल नहीं थे। गोविंद बल्लभ पंत, चंद्र भानु गुप्त और कृपा शंकर हजेला ने क्रांतिकारियों का केस लड़ा, लेकिन हार गये। मामला 16 सितंबर 1927 को चार लोगों को फांसी की सजा सुनायी गई। अंतिम सुनवाई के लिये लंदन की प्रिविसी काउंसिल भेजा गया, जहां से वापस भेज दिया गया।
करीब 18 महीनों के बाद 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई। उसी दिन अशफाख उल्लाह खां को फैजाबाद जेल में और रौशन सिंह को इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई। बिस्मिल के एक और साथी राजेंद्र नाथ लहिरी को दो दिन के बाद गोंडा जेल में फांसी दे दी गई।
बिस्मिल से जुड़ी रोचक बातें पढ़ें स्लाइडर में।

बिस्मिल के थे तीन नाम
बहुत कम लोग जानते हैं कि राम प्रसाद बिस्मिल तीन नामों से किताबें लिखते थे। राम, अज्ञात और बिस्मिल। बिस्मिल नाम ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।

सत्यार्थ प्रकाश से मिली थी प्रेरणा
बिस्मिल को सबसे ज्यादा प्रेरणा स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित किताब सत्यार्थ प्रकाश से मिली।

भारत में है एक और राजघाट
फांसी के बाद बिस्मिल के शव को राप्ति नदी के किनारे ले जाया गया। वहीं पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। बाद में उस जगह को राजघाट का नाम दिया गया।

बिस्मिल के फैन थे भगत सिंह
भगत सिंह भी राम प्रसाद बिस्मिल को बहुत पसंद करते थे। वे उनकी रचनाओं से बहुत ज्यादा प्रभावित थे।

गोरखपुर जेल में लिखी थी बायोग्राफी
जिस वक्त बिस्मिल को गोरखपुर जेल में बंद किया गया, तब उन्होंने अपनी बायोग्राफी लिखी।

सबसे बड़ी चूक थी बिस्तौल देना
बिस्मिल ने अपनी बायोग्राफी में लिखा चूकवश चली पिस्तौल के कारण मारे गये अहमद की मौत ने उन्हें अंदर से तोड़ कर रख दिया था।

बिस्मिल के नाम पर है रेलवे स्टेशन
बहुत कम लोग जानते हैं कि शाहजहांपुर से करीब 11 किलोमीटर आगे एक रेलवे स्टेशन है जिसका नाम 'पं. राम प्रसाद बिस्मिल रेलवे स्टेशन' है। फोटो इंडिया रेल इन्फो के सौजन्य से।
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