Sunil Gavaskar: दुनिया के सबसे तेज गेंदबाजों के सामने भी गावस्कर ने नहीं पहना कभी हेलमेट, जानें उनके रिकॉर्ड्स
Sunil Gavaskar: सुनील गावस्कर भारत के पहले बल्लेबाज थे जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 10 हजार रनों के आंकड़े को छुआ था। वर्तमान युग के क्रिकेटरों में महान दिग्गजों में गिने जाने वाले सुनील गावस्कर ने बल्लेबाजी से संबंधित कई कीर्तिमान स्थापित किये। आज क्रिकेट के इस दिग्गज का जन्मदिन है। गावस्कर को सनी और लिटिल मास्टर के नाम से भी जाना जाता है। वह दाएं हाथ के बल्लेबाज रहे हैं और दाएं हाथ से मध्यम गति की गेंदबाजी भी कर सकते थे।
10 जुलाई 1949 को मुंबई में जन्में सुनील का पूरा नाम सुनील मनोहर गावस्कर है। इनके पिता का नाम मनोहर गावस्कर और माता का नाम मीनल गावस्कर है। 1966 में ही उन्होंने रणजी के मैचों में अपना डेब्यू किया। इसके बाद 1971 में उनका चयन वेस्टइंडीज दौरे के लिए हुआ। गावस्कर अपनी हर पारी में और रनों में अपना एक नया इतिहास रचते थे।

टेस्ट क्रिकेट में सबसे पहले 10 हजार रन का आंकड़ा पार करने वाले गावस्कर बिना हेलमेट ही खूंखार तेज गेंदबाजों का सामना किया करते थे। कप्तान के रूप में सुनील गावस्कर ने टीम को अनुशासित रखा। तेज गेंदबाजी और आक्रामकता के कारण खतरनाक माने जाने वाली टीमों जिनमें ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज शामिल थीं, उनके खिलाफ भारतीय टीम के खौफ को निकालने में वह काफी हद तक सफल रहे थे।
क्रिकेटर नहीं बन पाते गावस्कर
महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर जिन्हें सनी भी कहा जाता है, वह क्रिकेटर नहीं बन पाते। अपनी आत्मकथा 'सनी डेज' में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। दरअसल, गावस्कर के जन्म के बाद उनके चाचा अस्पताल में उन्हें देखने आए थे। गावस्कर ने अपनी किताब में लिखा कि चाचा ने उनके कान में छेद देखा था। अगले दिन जब वह दोबारा आए तो जो बच्चा मेरी मां के साथ था उसके कान में छेद नहीं था। चाचा ने भांप लिया कि कुछ गड़बड़ हुई है। अस्पताल में हंगामा हो गया। कान में छेद वाले बच्चे की तलाश शुरू हो गई। पता चला कि मैं एक मछुआरिन के बगल में सो रहा था। गावस्कर लिखते हैं कि बच्चों को नहलाते वक्त बच्चे बदल गये थे। जिसके कारण यह सब हुआ था। गावस्कर ने अपनी किताब में लिखा कि मैं हमेशा ये सोचता हूं कि अगर मेरे अंकल मुझे नहीं पहचान पाते, तो क्या होता। शायद मैं एक मछुआरे के रूप में बड़ा होता और पश्चिमी तट के पास कहीं मछलियां पकड़ रहा होता।
इंग्लैंड का स्टेडियम गावस्कर के नाम
यह बात 2022 की है। इंग्लैंड में एक स्टेडियम के नाम को बदलकर सुनील गावस्कर के नाम पर किया गया। यह पहली बार हुआ था जब इंग्लैंड में किसी क्रिकेट स्टेडियम का नाम किसी भारतीय क्रिकेटर के नाम पर रखा गया था। वहां पर भारतीय मूल के सांसद रहे कीथ वाज ने ही इसकी पहल की थी। वहीं इस बारे में गावस्कर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि मैं बहुत ही खुश और सम्मानित महसूस कर रहा हूं कि लीसेस्टर में एक मैदान का नाम मेरे नाम पर रखा जा रहा है। वहीं कीथ ने कहा था कि हम बेहद ही सम्मानित और रोमांचित महसूस कर रहे हैं कि सुनील ने अपने नाम पर ग्राउंड का नाम रखने की अनुमति दे दी है। वह केवल लिटिल मास्टर नहीं बल्कि इस खेल के ग्रेट मास्टर भी हैं।
पाकिस्तान के एक क्रिकेटर पर भविष्यवाणी
यह किस्सा 2012 का है। 2012 के एशिया कप के एक मैच के दौरान सुनील गावस्कर और रमीज राजा कमेंट्री कर रहे थे। उस समय राजा ने इमरान खान का जिक्र किया कि कैसे सुनील गावस्कर इमरान की स्विंग गेंदों की लाइन से खुद को आसानी से हटा लेते थे। उस पर इमरान खान हर दस मिनट में कहते थे कि देखो ये कैसे खेलता है। राजा ने ये डायलॉग इमरान खान की ही आवाज में मिमिक्री कर के कहा था। इस पर सनी ने कहा था कि रेम्बो सावधानी से रहो। आप टीवी पर जिसकी मिमिक्री कर रहे हैं, वह पाकिस्तान का अगला प्रधानमंत्री हो सकता है। और ठीक वैसा ही हुआ। 18 अगस्त 2018 को इमरान खान पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए।
गावस्कर की उपलब्धियां
सुनील गावस्कर को 1975 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इसके बाद 1980 में भारत सरकार द्वारा पदम भूषण प्रदान किया गया। वहीं 1980 में आईसीसी द्वारा उन्हें विजडन अवार्ड से सम्मानित किया गया था। सुनील गावस्कर ने 125 टेस्ट मैचों में 10122 रन बनाए थे। वह टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन बनाने वाले सबसे पहले क्रिकेटर थे। गावस्कर ने भारत की तरफ से सबसे पहले 100 कैचों का कीर्तिमान भी बनाया था। 1987 में गावस्कर ने क्रिकेट जगत से सन्यास ले लिया। गावस्कर तो 1986 में ही सन्यास लेने जा रहे थे पर पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान के कहने पर उन्होंने अपना वह फैसला टाल दिया था। गावस्कर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 1986 में वह इंग्लैंड में खान के साथ लंच कर रहे थे तो उन्होने इमरान को अपने रिटारमेंट प्लान के बारे में बताया था। इसके बाद इमरान ने उनसे कहा था कि अगले साल यानी 1987 में पाकिस्तान क्रिकेट टीम भारत का दौरा करने के लिए आ रही है तो वह सन्यास न लें। जिसके चलते गावस्कर ने संन्यास लेने का अपना निर्णय कुछ समय के लिए टाल दिया था।












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