FCRA: सेवा या एजेंडा? अब तक 21,000 से अधिक एनजीओ पर विदेशी अनुदान लेने की रोक
साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भुवनेश्वर में एक जनसभा के दौरान कहा था कि वह 'एनजीओ की साजिश के शिकार' हैं। एनजीओ वाले उनकी सरकार गिराने की साजिशें रचते हैं। एनजीओ वाले उनसे गुस्सा हैं क्योंकि उनको मिले विदेशी फंड की जानकारी मांग ली गई थी। पिछले कुछ सालों में कई एनजीओ के ऐसे ही कारनामे सामने आए हैं जिनमें उन्होंने विदेशों से धन लेकर देश के हितों के खिलाफ इस्तेमाल किया है।
2 फरवरी, 2024 को सीबीआई ने मानवाधिकार कार्यकर्ता व पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर और उनके एनजीओ सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) के खिलाफ विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के कथित उल्लंघन का मामला दर्ज किया। जांच से पता चला कि हर्ष मंदर ने अपने एनजीओ के एफसीआरए खातों से विदेशी धन की खूब हेराफेरी की है।

पिछले महीने ही दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) और ईसाई मिशनरी संस्था वर्ल्ड विजन इंडिया के एफसीआरए पंजीकरण रद्द कर दिए गए थे। 2023 में गृह मंत्रालय ने एफसीआरए प्रावधानों के कथित उल्लंघन के लिए ऑक्सफैम इंडिया की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। साथ ही सीबीआई ने दिसंबर 2023 में एफसीआरए का उल्लंघन करने के लिए समाचार पोर्टल न्यूजक्लिक के खिलाफ भी जांच की और मामला दर्ज किया ।
एनजीओ सेवा है या एजेंडा?
सवाल है कि आखिर ये 'एनजीओ' सेवा कार्य में लगे हैं या उनका कोई अलग एजेंडा है? क्योंकि, साल 2021 में केंद्र सरकार ने बताया था कि पिछले दस वर्षों (2011-21) में 20,600 एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिए थे। तब सरकार ने कहा कि इन संस्थाओं ने फॉरेन फंडिग से जुड़े नियमों का 'उल्लंघन' किया है।
रद्द किए गए एनजीओ के मुख्यालय उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में शामिल हैं। वहीं 2021 के बाद, जिन बड़े नामों के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए, उनमें सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर), वर्ल्ड विजन इंडिया और राजीव गांधी फाउंडेशन शामिल थे।
मोदी सरकार ने लिए कड़े फैसले
साल 1976 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं तो पहली बार फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेटरी एक्ट आया लेकिन साल 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने पहली बार एक कड़ा संशोधन किया । जिसके तहत पॉलिटिकल नेचर की संस्थाओं की विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी गई। साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तब एनजीओ के विदेशी फंडिंग को लेकर कई फैसले लिए और नए प्रतिबंध भी लगाए।
बेन एंड कंपनी की साल 2019 में आई इंडियन फिलेंथ्रोपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 से 2018 के बीच एनजीओ को मिलने वाले विदेशी फंड में 40 प्रतिशत की कमी आई थी। वहीं जनवरी 2019 में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में सवाल के जवाब में बताया था कि बीते तीन साल में 2872 गैर-सरकारी संस्थाओं पर रोक लगाई गई है, जिसमें ग्रीनपीस और सबरंग ट्रस्ट जैसी बड़ी संस्थाएं शामिल थीं।
इससे पहले दिसंबर, 2017 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने राज्य सभा को बताया था कि भारत में एनजीओ को विदेशी चंदे के रूप में वर्ष 2014-15 में 15,299 करोड़ रुपये, वर्ष 2015-16 में 17,773 करोड़ रुपये और वर्ष 2016-17 में 6,499 करोड़ रुपये मिले थे। ये विदेशी फंड इसलिए कम हो रहे हैं क्योंकि सरकार ने बहुत से एनजीओ का पंजीकरण खत्म किया था।
2020 में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक आया
मोदी सरकार ने एनजीओ के विदेशी फंड को नियंत्रित करने के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020 में लेकर आई। 20 सितंबर 2020 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया था। राज्यसभा ने इसे 22 सितंबर, 2020 को पारित किया और विधेयक को 28 सितंबर को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इस तरह सितंबर, 2020 यह एक नया अधिनियम बन गया।
इसमें जो संशोधन किया गया था, वह व्यक्तियों और संगठनों द्वारा विदेशी योगदान के उपयोग और स्वीकृति को नियंत्रित करता है। यह अधिनियम ऐसी किसी भी गतिविधि के लिए विदेशी योगदान पर प्रतिबंध लगाता है, जो राष्ट्रीय हित के लिए खतरा पैदा करती है।
क्या है FCRA विनियम और उसका उद्देश्य
- एफसीआरए का उद्देश्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्राप्त विदेशी धन को राष्ट्रीय हितों के खिलाफ गतिविधियों में लगाने से रोकने के लिए विनियमित करना है।
- विदेशी फंडिंग प्राप्त करने के लिए एनजीओ को एफसीआरए के तहत पंजीकरण कराना होगा।
- सरकार द्वारा एफसीआरए लाइसेंस रद्द करना अनुपालन सुनिश्चित करने और विदेशी योगदान के दुरुपयोग को रोकने के उसके प्रयासों को दर्शाता है।
- हालांकि, सभी रद्दीकरण उल्लंघनों के कारण नहीं होते हैं, क्योंकि कुछ पंजीकरण को सुव्यवस्थित करने और दोहराव को समाप्त करने के लिए होते हैं।
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