तो मुलायम के लिए अहम है 'अमर' प्रेम, इसलिए पूरी की गई उनकी जिद?

लखनऊ। बीते महज दो दिन पहले खुद को अमर सिंह का बेहद करीबी बताने वाले एक महोदय इस बात की चर्चा कर रहे थे कि अमर सिंह जया प्रदा की राजनीतिक हैसियत को लेकर काफी परेशान हैं। सिंह से वादा तो किया गया लेकिन उसे पूरा नहीं किया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जया प्रदा जी से फोन पर बात हो रही थी तो जया ने उन्हें फोन पर बताया कि वे उपाध्यक्ष पद चाहती नहीं है, और अखिलेश देना नहीं चाहते।

मतलब कुछ समझ नहीं आई बात। या कह लिया जाए कि बात को गोलमोल करके कुछ यूं जाहिर किया जा रहा था कि भई पल्ले ही न पड़े। दरअसल जानकारी के मुताबिक खुद को अमर सिंह का करीबी बताने वाले शख्स अमर के द्वारा बनाई गई पार्टी राष्ट्रीय लोकमंच के प्यादे रहे हैं।

बहरहाल ये तो रही करीबी की बात। जो कि पूरी तरह से गलत साबित हुई। लेकिन अमर सिंह द्वारा इस्तीफे की खबर से सपा को प्रभाव जरूर पड़ा है। और आनन-फानन में एक्शन लेते हुए जयाप्रदा को उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद का वरिष्ठ उपाध्यक्ष के साथ-साथ कैबिनेट मिनिस्टर की सुविधाएं दी गई हैं।

महत्व न मिलने की बात पर नाराज थे अमर

गौरतलब है कि सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार के बीच मचे बवाल के बीच अमर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा देने की धमकी दे डाली। और समाजवादी पार्टी की मुश्किलों में और इजाफा होता नजर आया। अमर सिंह ने कहा कि उन्हें समाजवादी पार्टी में महत्व नहीं मिल रहा है। सिंह ने यहां तक कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनसे बात नहीं करते। फोन करने पर मुख्यमंत्री कार्यालय से सूचना दी जाती थी कि आपका संदेश नोट करा दिया गया है।

....कि कद अभी घटा नहीं !

अमर सिंह की सपा में अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पार्टी में अमर सिंह की वापसी का कथित तौर पर विरोध करने वाले सपा के कद्दावर नेता रामगोपाल यादव के करीबियों को नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके इतर नगर विकास मंत्री आजम खान जो कि अमर सिंह के सबसे बड़े विरोधी के रूप में जाने जाते हैं, उनकी आपत्ति के बावजूद अमर सिंह को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया। शायद इसी वजह से अमर स्वयं को समाजवादी पार्टी के बजाए मुलायमवादी बताते हैं।

क्या इस पर भी मिलेगी अमर को हरी झंडी

बीते दिनों अमर ने सपा पर आरोप मढ़ते हुए अमर ने ये भी कहा कि उन्हें राज्यसभा में मूक-बधिर बना दिया गया है। सदन में जीएसटी पर बहस में नरेश अग्रवाल और सुरेंद्र नागर जैसे बोलते रहे। मेरे, रेवतीरमण सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा जैस नेताओं को पीछे चुपचाप बैठना पड़ा।

जयाप्रदा मसले पर तो सपा ने की आल इज वेल की नत्थी

बहरहाल देखना यह है कि जयाप्रदा मसले पर तो सपा ने आल इज वेल की मुहर नत्थी कर दी है लेकिन विचारों अभिव्यक्ति की बात अमर कर रहे हैं क्या वह भी पार्टी उन्हें देगी। जबकि अमर के बयानों के प्रयोगों से समाजवादी पार्टी अच्छी तरह से वाकिफ है।

समाजवादी पार्टी किसी को नाराज करने के मूड में नहीं

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो समाजवादी पार्टी किसी को नाराज करने के मूड में नहीं है। और अमर को तो बिलकुल भी नहीं। माना जा रहा है कि अमर दिल्ली में रहकर जिस तरह से उद्योगपतियों, पूंजीपतियों को सपा के पक्ष में साधने का आर्थिक काम करते थे, उनके जाने के बाद से दिल्ली में वह स्थान रिक्त ही पड़ा रहा।

चुनावों के समय अक्सर सपा को अमर सिंह याद आये

चुनावों के समय अक्सर सपा को उनकी याद आती रही। लोकसभा चुनावों में सपा की खराब हालत की एक वजह उनका आर्थिक रूप से कमजोर होना भी था। जिसे समाजवादी पार्टी फिर से 2017 के विधानसभा चुनावों में नहीं दोहराना चाहती।

अमर किस लिहाज से सपा के लिए फायदेमंद साबित होते हैं?

हालांकि देखना दिलचस्प होगा कि अमर किस लिहाज से सपा के लिए फायदेमंद साबित होते हैं। क्या जिस तरह की अपेक्षाएं की जा रही हैं, उस अमर खरे उतरेंगे। या फिर इनके इतर परिणाम होगा।

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