Hidden Camera Video: बाथरूम में छुपे कैमरा से वीडियो बनाने के अपराध बढ़े, जानें क्या है कानून
बाथरूम में किसी महिला की गुप्त फोटोग्राफी या फिल्म बनाने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती कॉलेज में छात्राओं के सामने ऐसा ही वाकया पेश आया।
9 अक्टूबर को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक समाचार को देख कर दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस को यह आदेश दिया है कि इस मामले में त्वरित करवाई करते हुए सुनिश्चित करें कि छात्राओं की गरिमा को क्षति पहुंचाने वाली तस्वीरें या फिल्म सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसार या दुरुपयोग ना हो।

मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव नरूला की खंडपीठ ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कॉलेजों या विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित विभिन्न उत्सवों में विशेष रूप से महिला प्रतिभागियों के संबंध में "सुरक्षा उल्लंघनों" के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया है।
गुप्त फिल्मांकन की यह घटना 06 अक्टूबर को हुई थी। सीसीटीवी फुटेज से साफ पता चलता है कि आईआईटी दिल्ली के हाउसकीपिंग स्टाफ ने यह घृणित काम किया था। दिल्ली हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस प्रकरण ने पीड़ितों को व्याकुल कर दिया है, और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके प्रसार सहित वीडियो के दुरुपयोग के बारे में स्वाभाविक रूप से चिंताएं बढ़ा दी हैं।
अदालत ने अपने पहले के आदेश का भी हवाला दिया जिसमें यह कहा गया था कि कॉलेज उत्सवों के दौरान सुरक्षा उपायों को मजबूत करने के लिए विश्वविद्यालय और पुलिस के बीच सक्रिय सहयोग की आवश्यकता है। पीठ ने यह भी कहा कि उपरोक्त प्रकरण के मद्देनजर, यह न्यायालय दिल्ली-एनसीआर में कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित समारोहों में, विशेष रूप से महिला उपस्थितियों के संबंध में, सुरक्षा उल्लंघनों के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेना उचित समझता है।
दिल्ली पुलिस के वकील ने अदालत को सूचित किया कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 354 सी के तहत मामला दर्ज किया गया है और आरोपी वर्तमान में न्यायिक हिरासत में है। अदालत ने विश्वविद्यालयों को अपने परिसर में आयोजित कॉलेज उत्सवों के दौरान सुरक्षा उपायों के लिए अपनी मौजूदा नीति पर एक रिपोर्ट देने का भी निर्देश दिया।
क्या है धारा 354
हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराध एक सामाजिक बुराई है। हर दिन किसी महिला के खिलाफ अपराध की कोई न कोई खबर आती ही है। बलात्कार, हमला, गंभीर चोट, एसिड हमला, आपराधिक बल का उपयोग करके उसका शील भंग अथवा लज्जा भंग करना आदि तमाम अपराध हैं जिनको 1860 के भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत दर्ज किया जा सकता है।
दरअसल आईपीसी की धारा 354, किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने एवं उसकी लज्जा भंग करने से संबंधित है। आईपीसी के तहत 'शील' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। इसे मरियम-वेबस्टर डिक्शनरी द्वारा पोशाक, आचरण या भाषण में शालीनता के रूप में परिभाषित किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) मामले में कहा है कि किसी महिला की गरिमा से संबंधित अपराध को मामूली नहीं माना जा सकता है। राजा पांडुरंग बनाम महाराष्ट्र राज्य (2004) में, न्यायालय ने माना कि धारा 354 किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए आपराधिक बल के हमले से संबंधित है। इस धारा को अधिनियमित करने का विधायी उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा है। इस धारा के तहत किसी पुरुष की गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई प्रावधान नहीं है। धारा 354 के अंतर्गत 354A से 354E तक अलग अलग प्रकार से महिलाओं को पहुंचाने जाने वाली ठेस एवं उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है।
धारा 354 के तहत सजा का प्रावधान
धारा 354 के तहत कम से कम एक साल और अधिकतम पांच साल तक की कैद की सजा हो सकती है। सजा के रूप में साधारण कारावास या कठोर कारावास दोनों हो सकता है। दोषी व्यक्ति को जेल काटने के साथ साथ जुर्माना भी देना पड़ सकता है।
यह एक गैर-शमनयोग्य अपराध है। इसका मतलब यह है कि कारावास अनिवार्य है, और दोषी केवल जुर्माना अदा करके बच नहीं सकता। जुर्माने की राशि न्यायाधीश के विवेक पर छोड़ दी गई है। निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा समिति के सुझाव के बाद कानून में संशोधन किया गया था और अधिकतम सजा को बढ़ा कर पांच साल कर दिया गया था।












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