शहीद-ए-आजम भगत सिंह की Biography : जिसने बांधा 'कफन' का सेहरा

बेंगलुरू। आजादी की बात तब तक अधूरी है, जब तक देश के वीर भगत सिंह का जिक्र ना हो, भारत मां के इस लाल ने मौत को 'महबूबा' और आजादी को 'दुल्हन' माना था, इस वीर ने ही सिर पर 'कफन' का सेहरा बांधकर अपनी मां से कहा था 'मेरा रंग दे बंसती चोला'...।

देश हमेशा इनका कर्जदार रहेगा, आने वाली पीढि़यों को शायद अचरज होगा कि इस तरह का मानव कभी इस धरती पर जन्मा था।

आइए एक नजर डालते देश के इस लाल के जीवन पर...

व्यक्तिगत जीवन: भगत सिंह का जन्म पंजाब के किसान सरदार किशन सिंह के घर हुआ था, इनकी मां का नाम विद्यावती कौर था। वैसे इनकी जन्मतिथि को लेकर थोड़ा विरोधाभास है, कुछ लोग इनकी जन्मतिथि 27 सितंबर बताते हैं तो कुछ लोग 28 सितंबर 1907 कहते हैं। 13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने एक पढ़ने लिखने वाले सिख लड़के की सोच को ही बदल दिया।

स्कूली शिक्षा

स्कूली शिक्षा

लाहौर में स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्होंने यूरोप के अलग अलग देशों में हुई क्रांति के बारे में अध्ययन किया। भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। इसके बाद भगत सिंह पं.चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गये थे। जिसके बाद इस संगठन का नाम हो गया था हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।

 अत्याचार के खिलाफ उठाई आवाज

अत्याचार के खिलाफ उठाई आवाज

ऐसा कहा जाता है कि भगत सिंह जब 12 साल के थे तब देश में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था, बस इस कांड ने उनके छोटे से दिमाग में विद्रोही बिगुल फूंका था। ये बिगुल था अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ, गांधी जी के असहयोग आन्दोलन के रद्द होने के बाद उनका गुस्सा अंग्रेजों के खिलाफ और बढ़ गया। वो गांधी जी का सम्मान जरूर करते थे लेकिन उन्होंने गांधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिये हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना सही समझा।

आजाद, सुखदेव, राजगुरु

आजाद, सुखदेव, राजगुरु

उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया और कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु थे। काकोरी काण्ड में 4 क्रान्तिकारियों को फांसी और 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

लाजपत राय की मौत का बदला

लाजपत राय की मौत का बदला

1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। 17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, एएसपी सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सिर में मारी और उसके बाद भगत सिंह ने 3-4 गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इंतजाम कर दिया और इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।

23 मार्च 1931 को फांसी

23 मार्च 1931 को फांसी

1929 में भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त और राजगुरु के साथ असेंबली में बम धमाके की योजना बनाई। बताया जाता है कि यह बम सिर्फ आजादी की लड़ाई के आगाज की सूचना अंग्रेजों के लिए पहुंचाना था। भगत सिंह और बटुकेश्वर ने एक-एक बम फेंका। धमाके में किसी की मौत नहीं हुई थी। भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी।

मैं नास्तिक क्यों हूं?

मैं नास्तिक क्यों हूं?

जेल में कैद रहने के दौरान भगत सिंह ने डायरी और किताबें भी लिखीं। उन्होंने जेल में अंग्रेजी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूं? जेल में भगत सिंह और उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

विधिवत दाह संस्कार

विधिवत दाह संस्कार

फांसी के बाद कहीं कोई आंदोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहां घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।

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