क्या पप्पू से नफरत में सेल्फ गोल कर गए तेजस्वी?
Pappu Yadav: बिहार में पहले चरण का चुनाव हो चुका है और दूसरे चरण का चुनाव दो दिन बाद 26 अप्रैल को होना है। इसी दिन पूर्णिया में भी वोट डाले जाएंगे और उसी दिन पप्पू यादव बिहार में लालू यादव के खिलाफ किसी बड़ी मुहिम का ऐलान भी कर सकते हैं, क्योंकि अब उनके और लालू परिवार के बीच निजी वैमनस्य सभी सीमाओं को पार चुका है।
22 अप्रैल को आरजेडी के सबसे बड़े नेता और लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने सार्वजनिक रूप से पप्पू को एनडीए से भी बड़ा राजनीतिक दुश्मन घोषित कर दिया। उन्होंने मंच से यह आह्वान कर दिया कि यदि आरजेडी उम्मीदवार को वोट नहीं देते तो एनडीए उम्मीदवार को दे दीजिए। राजनीतिक हलकों में इस बयान को तेजस्वी का इंडिया गठबंधन के खिलाफ ही सेल्फ गोल माना जा रहा है। अब यह उम्मीद की जा रही है कि 26 को अपने चुनाव से खाली हो जाने के बाद पप्पू यादव सिर्फ आरजेडी की जड़ें खोदने में लग जाएंगे।

कांग्रेस से भी निराश पप्पू
हालांकि पप्पू यादव अब भी यह दावा करते हैं कि वह कांग्रेस और उसके नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के सिपाही हैं और आखिरी सांस तक वैचारिक रूप से कांग्रेस के साथ ही रहेंगे, लेकिन अभी तक उन्हें पार्टी से कोई सहयोग नहीं मिलने के बाद भी क्या वह लालू परिवार के नेतृत्व में बिहार में लड़ रहे इंडिया गठबंधन के लिए लोगों से वोट मांगेगे? इसके आसार अब बहुत कम हैं।
पूर्णिया के कारण ही बिहार में भी पश्चिम बंगाल और केरल की तरह इंडिया ब्लॉक के घटक एक-दूसरे से लड़ते देखे जा सकते हैं। 1990 के दशक में तीन बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधायक का चुनाव जीत कर राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाले पप्पू यादव लालू परिवार के खिलाफ अब खुल कर आ गए हैं। वह एक साक्षात्कार में खुद कहते हैं - "मैं अपनी पहचान और विचारधारा से समझौता नहीं कर सकता। पूर्णिया मेरी 'कर्मभूमि' है। और मैं अपनी आखिरी सांस तक इसे कभी नहीं छोड़ूंगा।"
दरअसल पप्पू यादव को अपने राजनीतिक करियर में पहली बार इतना अपमानित होना पड़ा है। वह पहले लालू प्रसाद यादव के पास ही पूर्णिया की सीट मांगने गए थे। लेकिन उन्हें वहां से टका सा जवाब मिल गया। फिर उनकी उम्मीद राहुल और प्रियंका से थी। वहाँ भी निराश होना पड़ा।
राहुल गांधी ने बिहार में आकर भी पूर्णिया के मामले में तेजस्वी का साथ दिया। पप्पू यादव से ना मिले, ना बात की। अब पप्पू यादव भी किसी की परवाह नहीं करना चाहते। वह अब खुलेआम कहते हैं कि राजद नेतृत्व ने उनके साथ दुश्मन जैसा व्यवहार किया है। "बिहार की राजनीति में ये लोग मेरे राजनीतिक करियर को खत्म करने की साजिश रच रहे हैं, लेकिन अब पूर्णिया के लोगों ने चुनाव में करारा जवाब देने का मन बना लिया है।"
पप्पू यादव अकेले भी भारी
स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी पप्पू यादव के दावे को कमजोर नहीं माना जा रहा है। बिहार के इस सीमांचल क्षेत्र में पप्पू यादव के पास जातिगत वोट भी हैं और मुस्लिम भी उनका समर्थन कर रहे हैं। विपक्षी गठबंधन की तरफ से पूर्णिया में राजद से सुश्री बीमा भारती मैदान हैं। एनडीए की तरफ से यहाँ जदयू उम्मीदवार मैदान में है।
पप्पू यादव की पहचान लोकल रॉबिनहुड की तरह है। वह जरूरतमंद लोगों की तुरंत मदद करते हैं। वह किसी के लिए भी हर दम तैयार रहते हैं। बेबाक बोलते हैं और अपने निडर रवैये के लिए पूरे बिहार में जाने जाते हैं। कोविड महामारी के दौरान भी उन्होंने सैकड़ों लोगों को भोजन, परिवहन, दवाएं, ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ पैसे से भी मदद की। उस दौरान उन्होंने मधेपुरा की अपनी संपत्ति भी बेच दी।
उन्हीं दिनों पप्पू यादव ने भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी के खिलाफ एम्बुलेंस घोटाले का मुद्दा उठाया। उन्होंने यह आरोप लगाया था कि रुड़ी ने सांसद निधि से खरीदी गई 30 से अधिक एम्बुलेंस को अपने घर के पीछे पार्क कर दिया था। पप्पू इसके लिए जेल भी गए थे। उन्होंने एम्बुलेंस में शराब ढोने के एक मामले का भी खुलासा करने का दावा किया था।
आरजेडी को पानी पिला सकते हैं पप्पू
पप्पू यादव भले ही अकेले दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी अपील पूरे बिहार में है। यदि वह खुलकर आरजेडी के खिलाफ खड़े होते है तो लालू परिवार के लिए अच्छी खासी परेशानी उत्पन्न कर सकते हैं। क्योंकि वे बिहार में आरजेडी के एमवाई समीकरण में सेंध लगा सकते हैं। पप्पू यादव बिहार में सईद शहाबुद्दीन के परिवार के समर्थन की पहले ही घोषणा कर चुके हैं, जो इस समय लालू परिवार से खूब नाराज है।
पप्पू यादव बिहार के लोकप्रिय यादव नेता भी हैं। यादवों का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ भी जुड़ा हुआ है। पप्पू यादव नवादा में आरजेडी को नुकसान पहुंचा सकते हैं, क्योंकि यहाँ आरजेडी के पुराने नेता और स्थानीय बाहुबली राज बल्लभ यादव के भाई बिनोद यादव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं और यह कहा जा रहा है कि वे लालू यादव से नाराज हैं। राजद के तीन स्थानीय विधायक भी बिनोद यादव का ही समर्थन कर रहे हैं। आरजेडी ने यहाँ से अशोक महतो की पत्नी को टिकट दिया है। लालू यादव की दो बेटियाँ मीसा भारती और रोहिणी आचार्य भी चुनाव मैदान में है। पप्पू यादव की व्यक्तिगत रंजिश का नुकसान उनको भी उठाना पड़ सकता है।
मधेपुरा में पप्पू यादव का खूब असर है। इस सीट से इस बार राजद ने प्रोफेसर कुमार चंद्रदीप को टिकट दिया है जो पटना कॉमर्स कॉलेज में प्रोफेसर हैं, उनको भी पप्पू यादव झटका दे सकते हैं। प्रोफेसर कुमार चंद्रदीप को मधेपुरा की जनता ज्यादा जानती नहीं है। यहाँ से जद (यू) के दिनेश चंद्र यादव बाजी मार सकते हैं। क्योंकि यादव मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग राजद के बजाय जद (यू) को चुन सकता है।
इसी तरह झंझारपुर लोकसभा सीट पर भी लालू यादव को झटका मिल सकता है। मुकेश सहनी के पार्टी सिंबल पर लालू ने सुमन महासेठ को खड़ा किया है और वहाँ से गुलाब यादव निर्दलीय प्रत्याशी हैं। राजद ने इस बार बिहार में यादव समुदाय से 8 लोगों को टिकट दिए हैं, लेकिन एक दर्जन से अधिक यादव नेताओं को दरकिनार भी किया है। अब देखना यह है कि पप्पू यादव के विरोध के बावजूद लालू यादव वर्चस्व स्थापित रख पाते हैं या नहीं।











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