Barmer Seat: पाक बॉर्डर से लगी बाड़मेर जैसलमेर सीट पर निर्दलीय रविंद्र भाटी पर सबकी नजर, जानें सीट का इतिहास
Barmer Jaisalmer Seat: पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान और तेल के भंडार के लिए प्रसिद्ध बाड़मेर और जैसलमेर जिले अपने आप में अनूठे हैं। जैसलमेर जहां क्षेत्रफल में राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है और पर्यटन के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, वहीं बाड़मेर काला सोना उगल रहा है। यहां से राजस्थान को सर्वाधिक राजस्व मिल रहा है।
इन दोनों विशाल जिलों (पोकरण विधानसभा छोड़कर) को मिलाकर एक लोकसभा सीट बनाई गई है। इस सीमावर्ती क्षेत्र ने अनेक सैनिक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, और राष्ट्रीय स्तर के नेता भी दिए है। जिनमें सबसे ऊपर नाम आता है जसवंत सिंह जसोल का।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश, वित्त और रक्षा मंत्रालय संभाल चुके जसोल इसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जसोल गांव के मूल निवासी थे। लेकिन अनोखी बात यह है कि वे कभी भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाए। हालांकि उनके पुत्र मानवेंद्र सिंह जसोल इस क्षेत्र से एक बार सांसद और एक बार विधायक रह चुके हैं।
भाजपा के कद्दावर नेता रहे भैरोंसिंह शेखावत भी इस लोकसभा सीट से चुनाव हार चुके हैं। लेकिन यहां से चार बार सांसद बनने का रिकॉर्ड कर्नल सोनाराम चौधरी के नाम है। चौधरी ने तीन बार कांग्रेस और एक बार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता।
संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का वर्चस्व रहा, भाजपा को आजादी के 52 साल बाद मिली जीत, भैरोंसिंह भी हारें
1952 में बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र में जोधपुर का शेरगढ़ विधानसभा क्षेत्र व जालौर जिला भी शामिल था। इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी भवानीसिंह ने कांग्रेस के पूनमचंद विश्नोई को शिकस्त दी। इसके बाद 1957 में निर्दलीय रघुनाथ सिंह बहादुर, 1962 में रामराज्य परिषद के बैनर तले तनसिंह चुनाव जीते। 1967 व 1971 में कांग्रेस से अमृत नाहटा विजयी रहे।
1971 में पांचवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नाहटा ने जनसंघ के वरिष्ठ नेता भैरोसिंह शेखावत को 50 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर एक बार फिर तनसिंह विजयी रहे। 1980 व 1984 में कांग्रेस से वृद्धिचंद जैन, 1989 में जनता दल के टिकट पर कल्याण सिंह कालवी चुनाव जीते और पहली बार केंद्र सरकार में ऊर्जा मंत्री बने।
इसके बाद 1991 में रामनिवास मिर्धा और 1996, 1998 व 1999 में कर्नल सोनाराम चौधरी कांग्रेस से लगातार तीन बार सांसद बने। वहीं आजादी के 52 साल बाद 2004 में भारतीय जनता पार्टी ने अपना खाता खोला। यहां से जसवंत सिंह जसोल के पुत्र मानवेंद्र सिंह चुनाव जीते।
लेकिन 2009 में कांग्रेस के हरीश चौधरी ने भाजपा के मानवेन्द्र सिंह जसोल को हरा दिया। 2014 में सोनाराम ने कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता। 2019 में भाजपा के कैलाश चौधरी ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस प्रत्याशी बने मानवेंद्र सिंह को पराजित किया।
2024 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन रहे हैं। शिव विधानसभा से निर्दलीय विधायक और छात्र नेता रहे रविन्द्र सिंह भाटी ने लोकसभा चुनाव में भी ताल ठोक दी है। युवा मतदाताओं में उनकी लोकप्रियता देखते हुए इस बार बाड़मेर जैसलमेर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक सरगर्मियों वाला रहा वर्ष 2014 का चुनाव
भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शुमार और अनेक बार राज्यसभा और लोकसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर चुके जसवंत सिंह जसोल को विचारधारा के मुद्दे पर अलग थलग होना पड़ा। पार्टी में उन्हें अपने वरिष्ठ सहयोगियों की अनदेखी का भी सामना करना पड़ा। जिसके चलते वर्ष 2014 में उन्हें किसी भी सीट से टिकट नहीं दिया गया।
इस पर उन्होंने अपने पैतृक निर्वाचन क्षेत्र बाड़मेर से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। जिस पर जसोल को भाजपा से निष्कासित कर दिया गया। दूसरी ओर कांग्रेस के पूर्व सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी ने भाजपा ज्वाइन कर ली और भाजपा ने उन्हें इस सीट से उम्मीदवार बना दिया। इन चुनावों में मोदी लहर में भाजपा के सोनाराम को 4,88,747, निर्दलीय जसवन्त सिंह को 4,01,286 तथा कांग्रेस उम्मीदवार हरीश चौधरी को 2,20,881 मत मिले।
इस प्रकार अपनी घरेलू सीट से अपना पहला चुनाव और अपने राजनीतिक जीवन का अंतिम चुनाव लड़ने उतरे जसवंत सिंह जसोल हार गए। चुनाव हारने के कुछ दिनों बाद ही जसवंत सिंह अपने घर के बाथरूम में गिर गए। उनके सिर पर गंभीर चोट लगी और वे कोमा में चले गए। 6 साल तक कोमा में रहने के बाद वर्ष 2020 में उनका निधन हो गया।
2019 मोदी लहर में जीते कैलाश चौधरी, 2024 में त्रिकोणीय संघर्ष के आसार
लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पूर्व सांसद मानवेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया। वहीं भाजपा ने बायतु विधानसभा से पूर्व विधायक कैलाश चौधरी को मैदान में उतारा। मोदी लहर के चलते भाजपा एक बार फिर विजय रही। कैलाश चौधरी को 846526 तथा मानवेंद्र को 522718 मत मिले। बाद में कैलाश चौधरी को केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री बनाया गया।
इस बार 2024 में त्रिकोणीय संघर्ष के आसार बन रहे हैं। भाजपा ने एक बार फिर कैलाश चौधरी पर भरोसा जताया है। वहीं कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए उम्मेदाराम बेनीवाल को प्रत्याशी बनाया है। इन दोनों जाट उम्मीदवारों को शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में टक्कर दे रहे हैं।
अपने आक्रामक चुनाव प्रचार और अति सक्रियता से रविंद्र भाटी ने चुनावी मुकाबले को 2014 की तरह एक बार फिर रोचक बना दिया है। देखना यह है कि क्या भाटी उस सीट को जीत पाएंगे, जहां से भैरों सिंह शेखावत और जसवंत सिंह नहीं जीत पाए। हालांकि बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों में से जैसलमेर, पचपदरा, सिवाना, गुड़ामालानी व चौहटन पर भाजपा, शिव व बाड़मेर विधानसभा पर निर्दलीय व बायतु विधानसभा पर कांग्रेस का कब्ज़ा है।












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