Akshardham Temple(Gandhinagar): जानिए स्वामीनारायण प्रभु के अक्षरधाम मंदिर का पूरा इतिहास
गांधी नगर। आज पीएम नरेंद्र मोदी एक बार फिर से गुजरात पहुंचेंगे लेकिन आज वो वहां पर कोई चुनावी जनसभा को संबोधित नहीं करेंगे बल्कि वो अक्षरधाम मंदिर की स्थापना के सिल्वर जुबली प्रोग्राम में शिरकत करने वाले हैं और इस कार्यक्रम में शमिल होने आए लोगों को वो संबोधित करेंगे। पीएमओ के मुताबिक, पीएम इस मंदिर की 25 साल की यात्रा पर तैयार 15 मिनट के 'लाइट एंड साउंड' शो 'अक्षरधाम सनातनम' की शुरुआत भी करेंगे। आपको बता दें कि गांधीनगर का ये मंदिर काफी मानक है और देश-विदेश तक इसकी महिमा का गुणगान होता है। यह भक्ति, वास्तुकला, कलाकार्यों का खूबसूरत उदाहरण हैं। भगवान स्वामीनारायण की मूर्ति इस मंदिर की सैद्धांतिक मूर्ति है। अक्षरधाम की टैगलाइन है-यह वह स्थान है जहां कला चिरयुवा है, संस्कृति असीमित है और मूल्य कालातीत हैं।

इतिहास
23 एकड़ में फैले इस मंदिर में स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक संत प्रमुख स्वामी, जो उत्तर प्रदेश के अयोध्या से गुजरात आए थे, उनकी जीवनी को भव्यता से उकेरा गया है। इसके अलावा में अक्षरधाम मंदिर में कई हाईटेक प्रदर्शनियां हैं जिन्हें देखने के लिए टिकट लगते हैं। बच्चों के खेलने के लिए मंदिर परिसर में कई तरह के गेम्स हैं ।

स्वामीनारायण संप्रदाय
मंदिर परिसर में खाने पीने के लिए कई रेस्टोरेंट भी हैं। यहां पूरी सब्जी, स्वामीनारायण खिचड़ी समेत कई तरह के व्यंजनों का आनंद लिया जा सकता है। स्वामीनारायण संप्रदाय का गुजरात में अच्छा खासा प्रभाव है।

मंदिर को बनने में पूरे 13 साल लगे
यह मंदिर 1992 में बनकर तैयार हुआ है, जिसमें 6000 मीट्रिक टन लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है। इस मंदिर को बनने में पूरे 13 साल लगे हैं। इस मंदिर के 14.8 एकड़ में है हरित उद्यान है तो वहीं मंदिर के अंदर नीलकंठ और सहजानंद हॉल है। मंदिर खुलने का समय सुबह 9.30 से शाम 7.30 तक का है।

कौन थे स्वामीनारायण
घनश्याम पाण्डे या स्वामीनारायण या सहजानन्द स्वामी (2 अप्रैल 1781 - 1 जून 1830), हिंदू धर्म के स्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक थे। स्वामिनारायण संप्रदाय को मानने वाले उन्हे भगवान मानते हैं। भागवत पुराण और स्कंद पुराण स्वामीनारायण के अवतार का संकेत है। कहा जाता है कि भगवान श्री स्वामीनारायण सर्व अवतारों के अवतारी है। अप्रैल 1781 (चैत्र शुक्ल 9, वि.संवत 1837) को श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या के पास स्थित ग्राम छपिया में उनका इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ। रामनवमी होने से सम्पूर्ण क्षेत्र में पर्व का माहौल था। पिता श्री हरिप्रसाद व माता भक्तिदेवी ने उनका नाम घनश्याम रखा। बालक के हाथ में पद्म और पैर से बज्र, ऊर्ध्वरेखा तथा कमल का चिन्ह देखकर ज्योतिषियों ने कह दिया कि यह बालक लाखों लोगों के जीवन को सही दिशा देगा।

स्वामीनारायण सम्प्रदाय वेद के ऊपर स्थापित
पांच वर्ष की अवस्था में बालक को अक्षरज्ञान दिया गया। आठ वर्ष का होने पर उसका जनेऊ संस्कार हुआ। छोटी अवस्था में ही उसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। कुछ समय बाद इन्होंने घर छोड़ दिया और अगले सात साल तक पूरे देश की परिक्रमा की। अब लोग उन्हें नीलकंठवर्णी कहने लगे। इस दौरान उन्होंने गोपालयोगी से अष्टांग योग सीखा। वे उत्तर में हिमालय, दक्षिण में कांची, श्रीरंगपुर, रामेश्वरम् आदि तक गये। इसके बाद पंढरपुर व नासिक होते हुए वे गुजरात आ गये। स्वामीनारायण के पश्चात सम्प्रदाय को अपनाने वालों की संख्या में वृद्धि हुई। स्वामीनारायण सम्प्रदाय वेद के ऊपर स्थापित किया गया है।












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