Ajmer-92: 1992 का अजमेर कांड, 100 से ज्यादा लड़कियों का किया गया था यौन शोषण
Ajmer-92: 1992 में अजमेर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति अखबार के रिपोर्टर संतोष गुप्ता की एक खबर ने लोगों को झकझोर कर रख दिया था। खबर में स्कूली छात्राओं को उनके नग्न फोटो क्लिक करके ब्लैकमेल करते हुए उनका यौन शोषण किए जाने का पर्दाफाश किया गया था। 21 अप्रैल 1992 को बड़े लोगों की पुत्रियां 'ब्लैकमेल का शिकार' शीर्षक से प्रकाशित खबर ने शहर में भूचाल ला दिया था। दरअसल, अजमेर में जाल में फंसा कर स्कूल व कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों के न्यूड फोटो खींचकर ब्लैकमेल कर उनका यौन शोषण करने वाला गिरोह लंबे समय से शहर में सक्रिय था। विभिन्न स्कूलों में पढ़ने वाली 100 से भी ज्यादा लड़कियों की आयु 17 से 20 साल के बीच थी।
तीन दशक बाद मामला फिर सुर्खियों में
ब्लैकमेल कांड के तीन दशक के बाद एक बार फिर मामला सुर्खियों में है। जुलाई में इस पूरे कांड पर बनी फिल्म अजमेर-92 रिलीज होने जा रही है। फिल्म को लेकर दावा किया जा रहा है कि यह 1992 में अजमेर में हुए इसी ब्लैकमेल कांड की घटना पर आधारित है। इसे लेकर अब खादिम समुदाय के साथ मुस्लिम समाज की अन्य संस्थाओं ने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया है।

अजमेर दरगाह खादिम परिवार के कई सदस्य थे शामिल
पुलिस प्रशासन ने गोपनीय जांच में पहले ही पता कर लिया था कि गिरोह में अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के खादिम परिवारों के कई युवा शामिल है। इनमें से कुछ युवा कांग्रेस के पदाधिकारी भी थे तो अन्य आर्थिक रूप से संपन्न भी। फारुक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती इस कांड के मुख्य आरोपित थे। तीनों ही यूथ कांग्रेस के लीडर थे। फारूक उस समय इंडियन यूथ कांग्रेस की अजमेर यूनिट का अध्यक्ष था।
व्यापारी के बेटे के साथ कुकर्म, फिर लड़कियों को बनाया शिकार
इस पूरे गिरोह ने सर्वप्रथम एक व्यापारी के बेटे के साथ कुकर्म कर उसकी अश्लील तस्वीर उतारी और फिर उसे अपनी गर्लफ्रेंड को लाने के लिए मजबूर किया। उसकी गर्लफ्रेंड से बलात्कार के बाद उसकी अश्लील तस्वीरें ली और लड़की को अपनी सहेलियों को लाने के लिए कहा गया। फिर यह सिलसिला चल पड़ा। एक के बाद एक लड़की के साथ रेप, न्यूड तस्वीरें लेना, ब्लैकमेल कर उसकी भी बहन या अन्य परिचित सहेलियों को लाने के लिए कहा गया। इस तरीके से 100 से ज्यादा लड़कियों के साथ शर्मनाक कृत्य किया गया था।
स्टूडियो वाला भी लड़कियों का शोषण करने में आगे
1992 में रील वाले कैमरे थे, जिसमें फोटो खींचकर प्रिंट के लिए रील को स्टूडियो में देना पड़ता था। फोटो निकालने के लिए जिस स्टूडियो में दिया गया, वह भी आरोपियों का दोस्त ही था। उसने भी एक्स्ट्रा कॉपी निकाल लड़कियों का शोषण किया।
खुलासे के बाद आत्महत्या करने लगी लड़कियां
इस मामले के खुलासे के बाद यौन शोषण की शिकार लड़कियां मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। मामलों का खुलासा जैसे-जैसे होने लगा शोषण की शिकार लड़कियां खुदकुशी करने लगी। इनमें ज्यादातर स्कूल या कॉलेज जाने वाली थी।
76 स्टोरी छापने वाले पत्रकार का मर्डर
अजमेर में चल रहे सेक्स स्कैंडल का खुलासा 1992 में स्थानीय पत्रकारों ने ही किया था। इसमें से एक मदन सिंह स्थानीय साप्ताहिक अखबार 'लहरों की बरखा' के संपादक थे। इस अखबार ने सेक्स स्कैंडल पर सीरिज छापनी शुरू की थी। इससे कई सफेदपोश बेनकाब हो रहे थे। तब मदन सिंह को धमकियां मिलने लगी। वह सेक्स स्कैंडल पर 76 स्टोरी प्रकाशित कर चुके थे। उनकी पत्नी आशा कंवर के मुताबिक 4 सितंबर 1992 को वह एक और किस्त प्रकाशित कर कुछ बड़े नामों का खुलासा करने वाले थे। लेकिन उसी दिन उन पर हमला हो गया। मदन सिंह स्कूटर में पेट्रोल भरवाने घर से निकले थे। रास्ते में एंबेसेडर कार में सवार लोगों ने उन पर फायरिंग की। वह गंभीर रूप से घायल हो गए और पास के एक नाले में छलांग लगाकर जान बचाई। इसके बाद उन्हें अजमेर के जेएलएन अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन 11 सितंबर को अस्पताल के वार्ड में कुछ लोगों ने घुसकर उन्हें गोली मार दी।
सीएम भैरोसिंह शेखावत ने एक्शन लेने को कहा
1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने शांति और कानून व्यवस्था बिगड़ने नहीं देने और अपराधियों को नहीं छोड़ने के स्पष्ट संकेत देते हुए इस मामले में समुचित एक्शन लेने के निर्देश दिए। बावजूद इसके जिला पुलिस प्रशासन किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सका जिसके चलते आरोपियों को अपने खिलाफ इस्तेमाल होने वाले साक्ष्य मिटाने और अजमेर से भाग जाने का अवसर मिल गया। हालांकि, शेखावत ने 30 मई 1992 को मामला सीआईडी सीबी को सौंप दिया।
31 साल बाद आज भी अपराधी बाहर
1992 में जब इस सनसनीखेज वारदात का खुलासा हुआ तब से पुलिस ने छह चार्जशीट दायर कर 18 जनों को नामजद आरोपी बनाया था। शुरुआत में 17 लड़कियों ने अपने बयान दर्ज करवाए, लेकिन बाद में ज्यादातर गवाही देने से मुकर गयीं। 1998 में अजमेर की सत्र अदालत ने आठ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट ने 2001 में उनमें से चार को बरी कर दिया।
साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने बाकी चारों की सजा घटाकर 10 वर्ष कर दी। इनमें मोइजुल्ला उर्फ पुत्तन, इशरत अली, अनवर चिश्ती और शम्शुद्दीन उर्फ माराडोना शामिल था। 2007 में अजमेर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फारूक चिश्ती को भी दोषी ठहराया जिसे पहले पागल घोषित किया गया था। 2012 में सरेंडर करने वाले सलीम चिश्ती 2018 तक जेल में था। अब जमानत पर रिहा हो गया। 2013 में राजस्थान हाई कोर्ट ने फारूक चिश्ती की आजीवन कारावास की सजा घटा दी। नफीस चिश्ती 2003 तक भागता रहा लेकिन दिल्ली में उसे पकड़ लिया गया। एक आरोपी इकबाल भट्ट 2005 में गिरफ्तार किया जा सका। सुहैल गनी चिश्ती ने 26 वर्ष बाद 15 फरवरी 2018 को अजमेर कोर्ट में सरेंडर किया। नफीस चिश्ती, इकबाल भट्ट, सलीम चिश्ती, सैयद जमीर हुसैन, नसीम उर्फ टार्जन और सुहैल गनी पर पॉक्सो कोर्ट में मुकदमा चल रहा है, लेकिन ये सभी जमानत पर जेल से बाहर हैं। एक आरोपी अलमास महाराज अब तक फरार है। उसके अमेरिका चले जाने की आशंका जताई जा रही थी। सीबीआई ने उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था। वहीं, कई ऐसे भी थे, जिन्हें अब तक पकड़ा ही नहीं जा सका।












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