Airlines in Crisis: दुनियाभर में एयरलाइंस क्यों हो रही हैं फेल?
Airlines in Crisis: 13 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइसजेट के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अजय सिंह को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने क्रेडिट सुईस को पेमेंट देने में डिफॉल्ट किया और कोर्ट का अनुपालन नहीं किया तो उनको तिहाड़ जेल भेज दिया जाएगा। इसके बाद 15 सितंबर को स्पाइसजेट ने क्रेडिट सुईस को 15 लाख डॉलर का पेमेंट कर दिया है। यह एक उदाहरण नहीं है, जहां कोई एयरलाइंस कंपनी अपनी देनदारियों को चुकाने में विफल हो रही है। दुनिया भर की एयरलाइनों के फेल होने और डूबने के दर्जनों उदाहरण है।
भारत में डूब चुकी हैं कई एयरलाइंस
आर्थिक संकट में फंसकर दिवालिया होने की लिस्ट में भारत की कई एयरलाइन कंपनियों के नाम हैं। अभी मई, 2023 में ही गो फर्स्ट एयरलाइंस दिवालिया हो गई थी। इससे पहले भारत में ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस, अर्चना एयरवेज, सहारा एयरवेज, एनईपीसी एयरलाइंस, मोदीलुफ्त, दमानिया एयरवेज, जेट एयरवेज, किंगफिशर एयरलाइंस, डेक्कन एविएशन, एयर पेगासस, इंडस एयर, वायुदूत एयरलाइन और पैरामाउंट एयरवेज भी ऐसी एयरलाइंस रही हैं जो आर्थिक संकट में फंस कर या तो बंद हो गईं या फिर बिक गईं।

पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइंस कंपनी पीआईए भी डूबने की कगार पर
पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइंस 'पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस' (पीआईए) डूबने की कगार पर है। उसके पास तो फ्यूल भरवाने के लिए भी पैसा नहीं है। सऊदी अरब और यूएई ने इसीलिए पाकिस्तानी विमान को अपने यहां से उड़ने नहीं दिया था। पाकिस्तान के अखबार जियो न्यूज के मुताबिक पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइंस के एक आला अफसर ने चेतावनी दी है कि यदि एयरलाइंस को इमरजेंसी फंड नहीं दिया तो कभी भी सरकारी एयरलाइंस की उड़ानें निलंबित हो सकती हैं।
आखिर क्यों डूब रही हैं एयरलाइंस?
भारत समेत दुनियाभर में एयरलाइंस कंपनियों को सामान्य कुप्रबंधन के अलावा कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसका असर सीधा लाभप्रदता (प्रोफिटैबिलिटी) पर पड़ता है। उन चुनौतियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं।
ईंधन की कीमत:
किसी भी विमानन कम्पनी में परिचालन लागत का एक बड़ा हिस्सा एयर टरबाइन ईंधन (एटीएफ) है। इसमें आमतौर पर कंपनी के कुल खर्च की आधी लागत आ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में एटीएफ की कीमत में लगभग 60 से 70 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। एटीएफ की कीमतों में उतार-चढ़ाव एयरलाइन व्यवसाय को बर्बाद कर सकता है। जब बकाया बढ़ जाता है, तो तेल कंपनियां एयरलाइंस को कैश-एंड-कैरी मोड पर रख देती हैं, यानी नकद देने पर ही जहाज में ईंधन भरवाने की सुविधा मिलती है। जिससे घाटे में चल रही कंपनियों की स्थिति और खराब हो जाती है।
भारत में एटीएफ पर भारी कर (टैक्स) लगता है। राज्य एटीएफ पर मूल्य वर्धित कर (वैट) लगाते हैं जो 30 प्रतिशत तक है। विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पिछले साल वैट कम करने के लिए 22 मुख्यमंत्रियों को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखा था, जिसमें तर्क दिया गया था कि कम दर राज्यों के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि इसका मतलब है कि राज्यों में अधिक संख्या में उड़ानें आएंगी और अधिक मात्रा में ईंधन भरना होगा। कई राज्यों ने वैट कम किया भी है।
एटीएफ को जीएसटी के तहत लाने की भी मांग हो रही है ताकि कीमत में एकरूपता और अधिक स्थिरता हो। चूंकि भारत अपनी तेल जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग 85 प्रतिशत आयात पर निर्भर है, इसलिए एटीएफ की कीमतों में कटौती करने और एयरलाइन व्यवसाय में स्थिरता लाने का एकमात्र तरीका टैक्स को कम करना है।
डॉलर का मूल्य बढ़ना:
डॉलर की कीमतों में बढ़ोतरी से एयरलाइन की लागत भी बढ़ जाती है। ईंधन, लीज का भुगतान, रखरखाव और ओवरहाल लागत, विमान पार्ट्स खरीद इत्यादि के भुगतान को डॉलर के रूप में किया जाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये का अवमूल्यन होता है, तो इससे परिचालन की दैनिक लागत बढ़ जाती है। वहीं लाभ और नकदी संतुलन कम हो जाता है। एयरलाइंस कंपनियों को टिकटों को अधिक महंगा करना पड़ता है, जिससे हवाई यात्रा की मांग प्रभावित होती है।
मांग में उतार-चढ़ाव:
विमानों में सीटों की मांग में उतार- चढ़ाव पूरी दुनिया में एयरलाइन बिजनेस के लिए एक बड़ी चुनौती है। मांग में उतार-चढ़ाव एयरलाइन व्यवसाय को नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि खाली होने वाली हर सीट घाटे में तब्दील हो जाती है। जब मांग कम होती है, तब भी एयरलाइंस को सभी कर्मचारियों को वेतन देना पड़ता है। एयरलाइन कर्मचारियों, विशेषकर पायलटों को ऊंचा वेतन दिया जाता है। एयरलाइन कर्मचारियों को इच्छानुसार काम पर नहीं रखा जा सकता है और न ही निकाला जा सकता है क्योंकि पायलटों की तरह कई कर्मचारी तकनीकी कर्मचारी होते हैं जो जरूरत पड़ने पर आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं।
विमानों की लागत:
विमानों की निश्चित लागत अधिक होती है। इन्हें वर्षों पहले ही ऑर्डर करना पड़ता है क्योंकि इन्हें बनाने में बहुत समय लगता है। विमानों के लिए ऑर्डर देते समय किसी एयरलाइन को भविष्य की मांग का अच्छा अंदाजा होना चाहिए। जब वर्षों बाद विमानों की डिलीवरी होती है, तो एयरलाइन को भुगतान करना होता है। भले ही मांग कम हो और वह अपने सभी विमानों का उपयोग करने में सक्षम न हो। जमीन पर खड़े होने पर भी विमानों की लागत बहुत अधिक होती है क्योंकि उन्हें नियमित रखरखाव की आवश्यकता होती है और अक्सर इसके लिए उन्हें विदेश भेजा जाता है। मांग बढ़ने पर यदि किसी एयरलाइन के पास पर्याप्त विमान नहीं हैं, तो उसे उन्हें ऊंची कीमत पर लीज पर लेना पड़ता है।
हवाई अड्डों की फीस:
हवाई अड्डे की विभिन्न फीस की लागत भी अधिक होती है, खासकर कम लागत वाली एयरलाइनों के लिए, क्योंकि भारत में घरेलू एयरलाइनों के लिए अलग से सस्ते हवाई अड्डे नहीं हैं। अक्सर, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें एक ही हवाई अड्डे से संचालित होती हैं।
कम प्रॉफिट, ज्यादा रिस्क वाला बिजनेस
एयरलाइन चलाना आसानी से लाभ कमाने वाला बिजनेस नहीं है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के अनुसार ऊंचे हवाई किराए के बावजूद, एयरलाइन उद्योग को अप्रैल 2022-मार्च 2023 की अवधि में 110-130 अरब रुपये का शुद्ध घाटा होने का अनुमान है। विमानन बिजनेस ग्लैमरस लग सकता है लेकिन यह व्यवसाय है काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण। क्योंकि इसमें लागत अक्सर बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। विमानन उद्योग में कड़ी प्रतिद्वंदिता के कारण किराये को बढ़ाना मुश्किल हो जाता है। वहीं ग्राहक हमेशा कम किराया चाहते हैं। जबकि किराया बढ़ाने से बिक्री घट सकती है और ग्राहकों को बेहतर सेवाओं और सुविधाओं के लिए अतिरिक्त भुगतान करने के लिए राजी करना आसान नहीं होता है।
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