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भारतीय जनता पार्टी और आप आदमी पार्टी की मुश्किलें!

पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली भारी जीत को मुश्किल से 9 महीने हुए थे कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में उसे करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। वोटिंग होने के बाद ही यह तस्वीर साफ होने लगी थी कि आने वाले समय में आम आदमी पार्टी की ही सरकार बननी लगभग तय है क्योंकि जितने भी एक्जिट पोल्स हुए थे, वह आम आदमी पार्टी के पक्ष में ही जा रहे थे और ठीक वैसा हुआ भी। 10 फरवरी को आए नतीजों में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में भाजपा का सूपड़ा साफ करते हुए 67 सीटें जीत कर नया इतिहास लिख दिया।

Delhi Elections

जीत का पूरा श्रेय अरविंद केजरीवाल की सकरात्मकता और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं की जी तोड़ मेहनत को जाता है। लोकसभा चुनावों के बाद लोग और कुछ विश्लेषक ऐसा मानने लगे थे कि अब आम आदमी पार्टी का वजूद तक नहीं बचेगा और पार्टी धीरे धीरे खत्म हो जाएगी लेकिन अरविंद और उनकी पूरी टीम ने कभी हार नहीं मानी और इन चुनावों में भी डटकर भाजपा का सामना किया और मोदी के विजय रथ पर विराम लगा दिया।

खैर, दिल्ली चुनावों में भाजपा की हार ऐसे ही नहीं हुई है। भाजपा की इस हार के जिम्मेदार उनकी पार्टी के ही धुरंदर नेता हैं। भाजपा के हार के संकेत तभी मिलने लगे थे जब विकास के बजाए ‘घर वापसी' और ‘धर्मांतरण' जैसे मुद्दे पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए प्राथमिकता बन गए थे। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह मुद्दे भाजपा की हार की अहम वजह बने। इसके साथ ही साथ भाजपा के बयानवीरों ने भी भाजपा की लुटिया डुबवाने में काफी मदद की। साध्वी निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ के साथ साथ भाजपा के सहयोगी संगठनों ने अनर्थक बयानों की ऐसी बछौरें कीं कि फिर वे रोके नहीं रूके।

उधर, नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में अरविंद के खिलाफ ऐसे शब्दों और जुमलों का प्रयोग किया जिसको जनता ने सिरे से नकार दिया। उनकी पार्टी ने केजरीवाल के खिलाफ जमकर जहर उगला और उन्हें और यहां तक की उनके परिवार को भी काफी निशाने पर लिया और यही सारी चीजें अरविंद और उनकी पार्टी के पक्ष में काम कर गईं।
वहीं, इस दौरान भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी काफी उहापोह की स्थिति बनी रही।

किरण बेदी फैक्टर

जब किरण बेदी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार की घोषणा हुई तो पार्टी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध भी किया लेकिन पार्टी के असली रणनीतिकार अमित शाह ने अपने फैसले पर अडिग रहते हुए किसी की बात नहीं सुनी लेकिन अपनी रणनीतिओं के लिए मशहूर अमित शाह का दांव इस बार उल्टा पड़ गया और इसका भुगतान उन्हें और उनकी पार्टी को हार के रूप में करना पड़ा।

अगर आने वाले समय में अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में भाजपा को यह गलतियां नहीं दोहरानी है तो इसके लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सबको साथ लेकर चलना होगा और पार्टी के अन्य नेताओं को भी अपने उलंटबासी बयानों से बचना होगा क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब यही जनता पूर्ण रूप से सरकार को सत्ता से बेदखल कर देगी।

आप की चुनौतियां

खैर, इन सबके बीच आम आदमी पार्टी को मिली भारी बहुमत की जीत ने उनके लिए चुनौतियां इस बार और बढ़ा दी हैं और जनता को भी अब उनसे काफी उम्मीदें हैं। इसके साथ ही साथ यहां व्यक्गित राजनीति करने की जगह इस बात की जरूरत है कि केंद्र में बैठी मोदी सरकार और अरविंद की आम आदमी पार्टी मिलकर दिल्ली के लिए काम करें।

इस बाबत नरेंद्र मोदी ने आम आदमी पार्टी को मिली जीत के बाद उन्हें फोन पर बधाई देने के साथ एक अच्छी पहल की। अरविंद केजरीवाल द्वारा किए गए वादों को हकीकत के पर्दे पर उतारना भी उनके लिए आसान नहीं होगा क्योकि 2 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में सिर्फ फ्री वाई-फाई की सुविधा देने और 15 लाख के कैमरे लगवा देने से ही सारी समस्याओं का हल नहीं हो जाएगा। बल्कि जरूरत इस बात की है कि वह लोग जिनके पास रहने के लिए घर नहीं है, जिन लोगों के घर पानी में डूबे हुए हैं अगर ऐसे लोगों की समस्याओं का निवारण केजरीवाल कर देते हैं तो यह उनकी असली जीत होगी।

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