Senior Citizen's Cases: उम्र के आखिरी पड़ाव में भी न्याय का इंतजार, कोर्ट में बुजुर्गों के 27 लाख मामले लंबित
Senior Citizen's Cases: भारत के न्यायालयों में 27 लाख से अधिक ऐसे मामले लंबित हैं, जो बुजुगों ने दायर कर रखे हैं। बुजुर्ग उम्र के ऐसे पड़ाव से गुजर रहे हैं, जहां कभी भी उनकी मृत्यु हो सकती है। ऐसे में उनको तुरंत न्याय दिलाने की जरूरत है, क्योंकि उन्हें खाने पीने रहने और स्वास्थ्य से संबंधित मामलों से जूझना पड़ रहा है।
ये सारे मामले गुजारा भत्ता, पेंशन, किराएदार से मकान खाली कराने व संपत्ति के विवाद इत्यादि से जुड़े हुए हैं। इनमें से करीब सात लाख ऐसे मामले है, जिनमें बच्चों द्वारा मां-बाप को प्रताड़ित किया जा रहा है। ऐसे में वे अपना शेष जीवन शांति और संतोष से बीता सकें इसके लिए उन्हें न्यायालय की शरण में जाने के लिए विवश होना पड़ा है।

पिछले पांच वर्षों से ज्यादा का समय हो गया है, जब इस प्रकार के मामले दायर किए गए। लाखों मामले ऐसे भी दर्ज है, जो न्यायालयों में लंबे समय से लंबित है। इनमें अधिकांश मामले सिविल कोर्ट से संबंधित है। जिसमें बहू-बेटे प्रॉपर्टी हड़पना चाहते हैं। गरीब परिवारों के बजाय मिडिल क्लास फैमिली में इस तरह के केस अधिक देखे जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी काम नहीं आया, सात लाख मामले और बढ़े, सर्वाधिक यूपी में
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुगों को जल्द न्याय दिलाने के लिए उच्च न्यायालयों और सभी निचली अदालतों को जल्दी सुनवाई करने के आदेश दिए थे। इसके बाद भी मुकदमों का त्वरित गति से निराकरण नहीं हो पा रहा है। इसके उलट पिछले वर्षों में सात लाख मामले और बढ़ गए हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2023 तक उत्तर प्रदेश में 486128, महाराष्ट्र में 399684, कर्नाटक में 263118, बिहार में 248570, पश्चिम बंगाल में 151169, तमिलनाडु में 150125, केरल में 127201 राजस्थान में 108174, मध्य प्रदेश में 99879 और हरियाणा में 93068 मामले न्यायालयों में लंबित है। न्यायालयों से धीमी गति से प्रकरणों का निपटारा हो रहा है। साथ ही नए प्रकरण भी तेजी के साथ बढ़ते जा रहे हैं।
सरकार और न्यायालय को आगे आना होगा, ताकि बुजुर्गों को समय पर मिले राहत
वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर जल्द से जल्द उन्हें न्याय दिलाने के लिए जिला अदालतों और हाईकोर्ट में बुजुगों के मामले की जल्द सुनवाई करनी होगी। विशेष रूप से गुजारा भत्ता, पेंशन, किराएदार से मकान खाली कराने, बच्चों द्वारा प्रताड़ित किए जाने या देखरेख नहीं किए जाने के मामले में निश्चित समय सीमा पर निपटाने की व्यवस्था नहीं की जाती है।
ऐसी स्थिति में भारत में बुजुगों का जीवन काफी कठिन और नारकीय होता जा रहा है। बुजुर्गों का शरीर साथ नहीं देता और वे भागदौड़ नहीं कर सकते हैं। उनके पास आय का भी कोई अन्य जरिया नहीं होता। दूसरों पर आश्रित होते हैं, ऐसी स्थिति में सरकार और न्यायालय यदि बुजुगों को संवेदनशीलता के आधार पर उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं करेंगी तो यह सभ्य समाज की निशानी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट कई बार इस मामले में जिला अदालतों और हाईकोर्ट को निर्देश दे चुका है कि बुजुगों के मामले जल्द सुनवाई कर निपटाए जाए, लेकिन इसका कोई हल निकल नहीं पा रहा है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक निश्चित समय सीमा में उम्र को ध्यान में रखते हुए फैसला करने के निर्देश देने होंगे। साथ ही सरकारों को भी न्यायालयों की संख्या बढ़ाने के अलावा अन्य मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान देना होगा, ताकि उम्र के आखिरी पड़ाव में भी बुजुर्गों को न्याय के लिए इंतजार नहीं करना पड़े।
कानून देता है बुजुर्गों को विशेष अधिकार
कानून में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा व सम्मान के लिए अलग से प्रावधान हैं। यदि उनके साथ बुरा बर्ताव होता है तो वे पुलिस को इसकी शिकायत कर सकते हैं। सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के तहत कोई भी वरिष्ठ नागरिक जिसकी उम्र 60 या उससे ज्यादा है, जो अपनी आय या अपनी संपत्ति से होने वाली आय से अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है, वे अपने बच्चों या रिश्तेदारों से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
यदि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार होता है तो तीन महीने की कैद के साथ जुर्माना भी हो सकता है। साथ ही वे बालिग संतान को घर छोड़ने के लिए बाध्य कर सकते हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों के साथ अन्य स्थानों पर सीनियर सिटीजन के लिए अलग से लाईन का प्रावधान है। उन्हें ज्यादा वक्त तक इंतजार न करना पड़े, इसके लिए अलग से लाइन की व्यवस्था होती है। ऐसी ही व्यवस्था न्याय प्रणाली में भी करनी होगी, ताकि वे अपना शेष जीवन सुख और शांति से बसर कर सके।












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