हाइब्रिड गेहूं: क्या खाद्य संकट की कमी का जवाब है

गेहूं की फसल

सिनजेंटा दुनिया की सबसे बड़ी बीज कंपनियों में से एक है और इसका स्वामित्व चीन के पास है. यह कंपनी अगले साल पांच हजार से लेकर सात हजार एकड़ भूमि तक एक नए प्रकार के गेहूं की खेती करेगी, जिसे हाइब्रिड गेहूं कहा जाता है. यह क्षेत्र अमेरिका में गेहूं की खेती के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कुल क्षेत्रफल का एक बहुत छोटा हिस्सा है. इसके अलावा जर्मन कंपनियां बीएएसएफ एसई और बायर एजी भी इस दशक के अंत तक गेहूं की अपनी नई किस्मों को पेश करने की तैयारी कर रही हैं.

कैसे उगाई जाती है हाइब्रिड गेहूं?

कृषि शोधकर्ता सामान्य गेहूं के पौधों की स्वयं को परागित करने की प्राकृतिक क्षमता को समाप्त कर हाइब्रिड गेहूं विकसित करते हैं, जिससे खेत में मादा पौधों का परागण दूसरे प्रकार के नर पौधों द्वारा किया जाता है. इस प्रकार इस कृषि वंश की दो विभिन्न प्रजातियों के मिलन से पैदा नए और अद्वितीय गेहूं बीज को हाइब्रिड कहा जाता है.

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गेहूं की दो विभिन्न किस्मों के मेल से इस प्रकार पैदा बीज न केवल अधिक उपज देते हैं बल्कि उनमें अपने पिछले पौधों की प्रजातियों की तुलना में प्रतिकूल पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता भी अधिक होती है.

किसी भी कृषि प्रजाति की हाइब्रिड किस्म विकसित करने का मुख्य फायदा यह है कि यह दो अलग-अलग पौधों की प्रजातियों की सभी सकारात्मक विशेषताओं को जोड़ती है. हालांकि इस प्रक्रिया का एक प्राकृतिक नुकसान भी है और वह यह है कि जब एक प्रकार के गेहूं में नर और मादा पौधों के बीच परागण की प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से हवाओं की मदद से की जाती है, तो सभी मादा पौधों में परागण होता है. लेकिन अगर वही परागण इंसानी दखल के नतीजतन और अप्राकृतिक तरीके से किया जाता है, तो कई मादा पौधे परागण करने में विफल हो जाते हैं. हालांकि विशेषज्ञ इसका भी समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं.

हाइब्रिड फसलों का इस्तेमाल कहां किया जाता है?

1930 के दशक से ही दुनिया भर के विभिन्न देशों में किसान मकई की हाइब्रिड फसल उगा रहे हैं. इस तरह से इस फसल की उपज भी अधिक होती है और इसमें पौधों को बीमारियों या हानिकारक कीड़ों के हमले से बचाया जा सकता है. इसके अलावा अभी तक सब्जियों की हाइब्रिड किस्मों को उगाने की जो विधि अपनाई जाती रही है, उसमें प्याज, पालक और टमाटर शामिल हैं.

प्रमुख हाइब्रिड गेहूं बीज कंपनियों का कहना है कि उन्होंने ऐसा करने के लिए हाइब्रिड मकई और हाइब्रिड जौ विकसित करने में अपने अनुभव का इस्तेमाल किया है. जिसके परिणामस्वरूप 1930 और 1990 के बीच मक्का का उत्पादन 600 प्रतिशत तक बढ़ गया था.

हाइब्रिड गेहूं को बाजार में लाने में देरी क्यों?

शोधकर्ताओं का कहना है कि हाइब्रिड गेहूं को बाजार में आने में अधिक समय लगा है क्योंकि विकास की प्रक्रिया अधिक महंगी और जटिल है. जबकि गेहूं के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए यह महत्वपूर्ण हो सकता है और इसे "जीएमओ" लेबल से बचाया जा सकता है.

आनुवंशिक रूप से संशोधित मकई और सोया की किस्मों को 1996 में विकसित किया गया था और इनका इस्तेमाल पशु चारा, जैव ईंधन और खाना पकाने के तेल जैसे प्रोडक्ट्स के उत्पादन में किया जाता है. ये किस्में जल्द ही अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना में बड़े पैमाने पर उगाई जाने लगीं.

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उपभोक्ताओं के बीच अलग-अलग चिंताओं के कारण अब तक आनुवंशिक रूप से संशोधित गेहूं की बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती नहीं की गई है. खास तौर से ऐसी चिंताएं थीं कि ऐसे गेहूं की खपत, जो दुनिया भर में सबसे अधिक खपत वाली कृषि वस्तुओं में से एक है, संभावित रूप से सामान्य आबादी में खास एलर्जी और अन्य चिकित्सा समस्याओं का कारण बन सकती है.

उत्तरी डकोटा में हैंकी सीड कंपनी के मालिक डेव हैंके कहते हैं, "आनुवंशिक रूप से संशोधित कृषि उत्पादों के सामान्य उपभोक्ता विरोध के साथ, यह अधिक संभावना है कि उपभोक्ता हाइब्रिड फसलों को सुरक्षित और बेहतर समझेंगे."

अर्जेंटीना की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोसेरेस आनुवंशिक रूप से संशोधित गेहूं के विकास पर काम कर रही है जो सूखे के प्रभावों के लिए विशेष रूप से प्रतिरोधी होगा. कंपनी का दावा है कि जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अधिक गंभीर होते जाएंगे, सामान्य उपभोक्ता आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के व्यावसायिक उत्पादन को अधिक स्वीकार करने लगेंगे.

वहीं दूसरी ओर कई अन्य कंपनियां भी अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के लिए अलग-अलग तरह के हाइब्रिड गेहूं के विकास पर लगातार काम कर रही हैं. जर्मन कंपनी बीएएसएफ का कहना है कि गेहूं की जिस हाइब्रिड किस्म को वह विकसित कर रही है, उसमें फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट नामक पौधे की बीमारी से सफलतापूर्वक निपटने की क्षमता की विशेषता है, यह बीमारी गेहूं की पैदावार को बहुत कम कर देती है.

एए/वीके (रॉयटर्स)

Source: DW

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