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गणतंत्र दिवस पर संजय लीला भंसाली ने दिखाई ‘भारत गाथा’, सिनेमा को बताया भारतीय कहानियों का सशक्त माध्यम

77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्तव्य पथ पर एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने मशहूर फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली के सहयोग से 'भारत गाथा' थीम पर विशेष झांकी प्रस्तुत की। यह पहली बार था जब भारतीय सिनेमा को इतने भव्य और आधिकारिक रूप में राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया गया, जिसने देश की सांस्कृतिक पहचान को एक नई ऊंचाई दी।

Sanjay Leela Bhansali

राष्ट्रीय मंच पर सिनेमा की अनूठी प्रस्तुति
26 जनवरी को परेड का हिस्सा बनी यह झांकी भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुई। किसी फिल्म निर्देशक द्वारा गणतंत्र दिवस जैसे सर्वोच्च राष्ट्रीय समारोह में सिनेमा का प्रतिनिधित्व करना अपने आप में ऐतिहासिक घटना रही। इस झांकी ने यह संदेश दिया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारत की सदियों पुरानी कहानी कहने की परंपरा का आधुनिक विस्तार है।

कथाओं से सिनेमा तक का सफर
'भारत गाथा' थीम के माध्यम से झांकी में भारत की कथा परंपरा की यात्रा को दर्शाया गया। लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों और महाकाव्यों से शुरू होकर रंगमंच, संगीत और फिर सिनेमा तक पहुंची यह परंपरा भारतीय सभ्यता की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है। झांकी ने सिनेमा को ऐसे माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया, जो पीढ़ियों से विचारों, भावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाता आया है।

संजय लीला भंसाली का भावुक बयान
इस अवसर पर संजय लीला भंसाली ने कहा कि 'भारत गाथा' के तहत गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सिनेमा और क्रिएटर कम्युनिटी का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए गर्व का विषय है। उन्होंने इसे भारत की कहानियों की ताकत और उन्हें सिनेमा के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाने की सोच का सम्मान बताया। भंसाली ने यह भी कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें भारतीय सिनेमा को वैश्विक सांस्कृतिक आवाज़ के रूप में देखा जाता है।

भंसाली और सिनेमा की विरासत
संजय लीला भंसाली को आज उन चुनिंदा फिल्म निर्माताओं में गिना जाता है, जो राज कपूर, वी. शांताराम और महबूब खान जैसे दिग्गजों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी फिल्मों में भव्यता, सांस्कृतिक गहराई और भारतीय जड़ों से जुड़ाव स्पष्ट दिखाई देता है। 'भारत गाथा' झांकी के माध्यम से गणतंत्र दिवस परेड ने एक बार फिर साबित किया कि सिनेमा भारत की कहानी कहने की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। यह आधुनिक माध्यम हमारी प्राचीन आत्मा को संजोते हुए पूरी दुनिया तक भारत की आवाज़ पहुंचाने की क्षमता रखता है।

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