Samrat Prithviraj : कौन थी रानी संयोगिता, जिसका रोल निभाया है पूर्व मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर ने?
नई दिल्ली, 02 जून। इन दिनों बॉलीवुड के मिस्टर खिलाड़ी अक्षय कुमार अपनी फिल्म 'सम्राट पृथ्वीराज' को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म में उनके साथ पूर्व मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर ने काम किया है। फिल्म में शूरवीर और पराक्रमी राजा पृथ्वीराज चौहान का रोल अक्षय कुमार ने निभाया है तो वहीं मानुषी छिल्लर रानी संयोगिता के किरदार में हैं। खास बात ये है कि मानुषी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक करेक्टर के जरिए बॉलीवुड में कदम रखने जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर रानी संयोगिता थी कौन?
चलिए विस्तार से जानते हैं उनके बारे में...
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'पृथ्वीराज रासो'
राजा पृथ्वीराज चौहान के बारे में तो कई किताबों में लिखा गया है लेकिन जिस तरह से उन्हें 'पृथ्वीराज रासो' में वर्णित किया गया है, वो अपने आप में अद्भूत है। यह एक महाकाव्य है, जिसे कि राजा पृथ्वीराज चौहान के ही दरबारी कवि चंद बरदाई ने ही लिखी थी। इस किताब में पृथ्वीराज चौहान की वीरता, उनका संयोगिता के प्रति प्रेम और मुहम्मद गोरी को 17 बार हराने की यशगाथा का बहुत ही सुंदर चित्रण है।

पृथ्वीराज चौहान की वीरता की तूती बोलती थी
आपको बता दें कि 12 वीं सदी के उत्तरार्ध में पृथ्वीराज चौहान की वीरता की तूती बोलती थी। चंदबरदाई और पृथ्वीराज बचपन के साथी थे इसलिए एक-दूसरे के बारे में हर चीज बखूबी जानते थे। मात्र 13 साल की उम्र में अजमेर के राजगढ़ की गद्दी संभालने वाले पृथ्वीराज चौहान छह भाषाओं के जानकार भी थे। उनकी वीरता के चर्चे दूर-दूर तक मशहूर थे लेकिन उन चर्चाओं को कन्नौज के राजा जयचंद पसंद नहीं करते थे और इसी जयचंद की बेटी संयोगिता थी, जो कि अत्यंत सुंदर थीं।

सम्राट पृथ्वीराज भी राजकुमारी पर मोहित हो गए
बरदाई ने उन्हें एक वीरांगना के रूप में उल्लेखित किया है। एक बार किसी चित्रकार ने उन्हें पृथ्वीराज की तस्वीर दिखाई , जिसे देखने के बाद संयोगिता मन ही मन पृथ्वीराज को पसंद करने लगी थीं। जब यह बात चित्रकार को पता लगी तो उसने संयोगिता की तस्वीर को पृथ्वीराज के पास भेजा, जिसे देखते ही सम्राट पृथ्वीराज भी राजकुमारी पर मोहित हो गए। इसी दौरान जयचंद ने अपनी बेटी का स्वयंवर रचाने का ऐलान कर दिया लेकिन इस स्वंयवर के साथ ही उसने राजसूय यज्ञ का भी आयोजन किया था।

पृथ्वीराज चौहान पर बनवाई मूर्ति
उसने आस-पास के सभी राजाओं को स्वयंवर का निमंत्रण भेजा, जो कि पृथ्वीराज को भी मिला लेकिन सम्राट के सांमतों को स्वयंवर के साथ राजसूय यज्ञ की बात सही नहीं लगी और उन्होंने चौहान से वहां नहीं जाने के लिए कहा। पृथ्वीराज ने यही उचित समझा और उन्होंने निमंत्रण अस्वीकार कर दिया। ये बात जयचंद को पसंद नहीं आई और उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया इसलिए उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की एक मूर्ति बनाई और उसे द्वारपाल की जगह खड़ा कर दिया।

संयोगिता के सामने वरमाला के लिए सिर झुका दिया
जब संयोगिता को ये बात पता चली तो वो भी मन ही मन अपने पिता की इस बात से काफी दुखी हुईं लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को पाने के लिए वो किया, जिसकी कल्पना उनके पिता ने कभी नहीं की थी।
जयचंद का काफी चुभी बात
वो जब वरमाला लेकर स्वयंवर के लिए आईं तो वो द्वार पर लगी पृथ्वीराज की मूर्ति को वरमाला पहनाने के लिए मुड़ी लेकिन इतने में पृथ्वीराज वहां आ गए और उन्होंने संयोगिता के सामने वरमाला के लिए सिर झुका दिया और संयोगिता ने वरमाला डालकर उन्हें अपना पति बना लिया। ये बात जयचंद को काफी चुभी। इस स्वयंवर के बाद पृथ्वीराज अपनी पत्नी संयोगिता को लेकर दिल्ली आ गए।

जयचंद ने मिलाया मुहम्मद गोरी से हाथ
बदला लेने के लिए जयचंद ने अफगानी सुल्तान मुहम्मद शहाबुद्दीन से हाथ मिला लिया,जिसे चौहान ने युद्ध में 17 बार हराया था। लेकिन जयचंद की मदद और कपट से 18वीं बार गोरी ने चौहान को हरा दिया और इसके बाद उसने चौहान और चंदबरदाई दोनों को बंदी बना लिया और सजा के तौर पर उसने पृथ्वीराज की आखों को गर्म सलाखों से फोड़वा दिया।

'... ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान'
लेकिन पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चलाते थे, ये बात चंदबरदाई को पता थी। गोरी को इस बारे में पता चला तो उसने मजे लेने के लिए बरदाई और पृथ्वीराज को आजमाना चाहा लेकिन जैसे ही चंदबरदाई ने दोहा पढ़ा- 'चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान' वैसे ही चौहान का तीर गोरी से सीने में जाकर लगा और वो मर गया।

प्रेम कहानी का अंत
लेकिन इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई दोनों ने एक-दूसरे को मार दिया। अपने पति की मौत की खबर सुनने के बाद संयोगिता ने भी खुद को खत्म कर दिया था और इस तरह से एक प्रेम कहानी का अंत हो गया।












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