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Nishaanchi Movie Review: अनुराग कश्यप की 'निशानची' का एकदम सच्चा रिव्यू पढ़ो, मां कसम मारक मजा मिलेगा

Nishaanchi Movie Review in Hindi: अनुराग कश्यप की फिल्म निशानची रिलीज हो गई। इस फिल्म की लिखाई 2016 में शुरू हुई और बनने में करीब 9 साल लग गए। शूटिंग 60 दिनों में पूरी हुई ,लेकिन पोस्ट प्रोडक्शन में समय लगा। ये सारी बातें खुद अनुराग ने oneindia hindi को दिए इंटरव्यू में बताया। फिल्म की हाइप भी तगड़ी थी। लोग इसे गैंग्स ऑफ वासेपुर से तुलना कर रहे हैं। खैर इसे देखने हम भी चले गए। सोचा चलो देखते हैं अनुराग ने इस बार कैसा अपना करिश्मा दिखाया है। अगर 'अनुरागपगलु' इसे पढ़ रहे हैं, तो पहले से माफी।

Nishaanchi Movie Review in Hindi

कहानी बबलू निशानची की
फिल्म खुलती है कानपुर शहर से। साल 2006 और तीन लोग एक बैंक को लूटने की फिराक में हैं। जिसमें दो लड़के बबलू और डबलू हैं, रिश्ते में दोनों भाई भी हैं। उनके साथ एक लड़की है रिंकू। बैंक की लुटाई का काम शुरू होता है, लेकिन पूरा नहीं हो पाता। पुलिस आ जाती है। डबलू भाग निकलता है और बबलू वहीं धरा जाते हैं। पुलिस पकड़ती है और जेल पहुंच जाते हैं। ये दूसरी बार है जब बबलू जेल जा रहे हैं।

बबलू की एक रंजिश है अंबिका प्रसाद नाम के आदमी से। वो पहले इसके लिए काम करता था। जेल अंबिका बबलू की कुटाई करवा देता है। कैदी इतनी मार मारते हैं, जिसमें बबलू की हालत अधमरी हो जाती है। अंबिका उसकी मां को खबर पहुंचाता है। इसके बाद कहानी पूरी फ्लैशबैक में जाती है। जहां पता चलता है कि बचपन में बबलू जेल क्यों गया था? उसका अंबिका प्रसाद से क्या रिश्ता है? उसका रिंकू से इश्क कैसे शुरू होता है? कैसे उसे बड़ा बदमाश बनने की चाहत रहती है। ये सब अनुराग की तीन घंटें में चार मिनट कम वाली फिल्म निशानची में देखने को मिलेगा।

डेब्यू में ऐश्वर्य का तगड़ा काम
फिल्म में ऐश्वर्य ठाकरे हैं, जो अपना डेब्यू कर रहे हैं। उनका काम फिल्म में बहुत अच्छा है। एक सीन है जहां वो अंबिका से रिंकू के बारे में कहते हैं। दोनों के बीच जो बातचीत होत है, उसमें ऐश्वर्य ने अपनी एक्टिंग के रंग दिखाए हैं। पहली फिल्म के लिए उन्होंने जितनी मेहनत की है। सब फिल्म के हर सीन में दिखती है। वेदिका पिंटो का काम भी अच्छा है। वो एक निडर और बेखौफ लड़की के रोल में हैं। जिसे बखूबी निभाया है। मोनिका पवार ने मां का रोल किया है, जिसमें उन्होंने बेहतरीन और सधा हुआ काम किया है। दुर्गेश कुमार, मोहम्मद जीशान अय्युब, कुमुद मिश्रा और विनीत कुमार सिंह ने अपने-अपने किरदार में जान झोंकी है।

अनुराग की लिखाई, उबासी ले आई
फिल्म की कहानी अनुराग कश्यप ने रंजन चंदेल और प्रसून मिश्रा के साथ मिलकर लिखी है। फिल्म 177 मिनट की है। जो बहुत लंबी लिखी गई है। फिल्म फर्स्ट हाफ से ही बहुत खिंची हुई लगती है। सेकेंड हाफ में फिल्म पूरी तरह से प्रिडिक्टबल हो जाती है। जिसमें आप खुद ही समझ जाते हो कि आखिर अंत में क्या होगा। जब क्लाइमैक्स की बात आई तो लगा इसमें कुछ अनुराग कश्यप स्टाइल में झामफाड़ देखने को मिलेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है। बतौर दर्शक क्लाइमैक्स में खुद को ठगा हुआ और निराश पाते हो।

अनुराग ने फिल्म पूरी कनपुरिया स्टाइल में बनाई है। जो पूरा फील वही देती है, लेकिन कहानी लचर है। जिस वजह से मजा किरकिरा हो जाता है। फिल्म में खूब गाने हैं, लेकिन कुछ का होना समझ में नहीं आता है। बतौर डायरेक्टर अनुराग ने जो दुनिया दिखाने की कोशिश की है, उसमें वो सफल होते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन से लेकर सिलवेस्टर फोनसेका की सिनेमैटोग्राफी भी कमाल है। फिल्म को आरती बजाज ने एडिट किया है। वो लीजेंडरी एडिटर रही हैं, लेकिन इस बार लगता है उनके हाथ भी बंधे हुए थे। क्योंकि वो कई जगह अपनी कैंची चला सकती थीं, लेकिन शायद डायरेक्टर ने परमिशन नहीं दी।

कुल जमा निशानची पर बात
फिल्म अगर आप गैंग ऑफ वासेपुर जैसा मसाला सोच कर जाएंगे तो थोड़ा निराश होंगे। लेकिन आप अनुरागपगलु हैं, जो फिल्म तगड़ी लगेगी। फिल्म में पूरी खामी सिर्फ और सिर्फ कहानी और उसके स्क्रीनप्ले में है। निशानची पर मेरी बात यहीं तक आप भी फिल्म देखें और अपनी राय बताएं। ये रिव्यू कैसा लगा, आप कमेंट बॉक्स में हमें बता सकते हैं।

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