Azaad movie review: एक्टिंग में अजय, अमन और राशा को 'आजाद' ने छोड़ा पीछे, फिल्म की कहानी देखी आती है नींद
डायरेक्टर: अभिषेक कपूर
स्टार कास्ट: अमन देवगन, राशा थडानी, अजय देवगन, डायना पैंटी और मोहित मलिक
अवधि: 2 घंटे 27 मिनट
रेटिंग्स: 1.5 स्टार्स
ये कहानी उस वक्त की है जब हमारे देश पर अंग्रेजों का शासन था। ये करीब 1920 की कहानी है। जहां गोविंद (अमन देवगन) गांव का एक लड़का है, जिसे घोड़े पसंद हैं। गोविंद को एक दिन आजाद दिखता है। आजाद, विक्रम सिंह (अजय देवगन) का घोड़ा है, जो अलहदा है। कहानी आगे बढ़ती है और आजाद के चक्कर में गोविंद, विक्रम संग जुड़ जाता है। लेकिन फिर कुछ ऐसा होता है कि आजाद की जिम्मेदारी गोविंद को मिलती है। फिर दोनों का बॉन्ड बनता है। फिल्म में राशा थडानी के कैरेक्टर का नाम जानकी देवी है, जो जमींदार की बेटी है। जानकी बहुत देसी लड़की है, जिसके दिल में सभी के लिए इज्जत और प्यार है। गोविंद और जानकी भी करीब आ जाते हैं, हालांकि इनका अंदाज नोंक-झोंक भरा रहता है। कहानी के आखिर में एक मोड़ ऐसा आता है कि जब पूरे गांव के साथ कल क्या होगा इसका फैसला गोविंद की हार जीत पर टिका होता है। फिर क्या होता है... ।

बात एक्टिंग की करें तो फिल्म में अमन देवगन और राशा थडानी के काम को देखकर कहना मुश्किल लगता है कि ये इनकी डेब्यू फिल्म है। अमन एक गांव वाले लड़के के हिसाब से परफेक्ट दिखे हैं और काम भी अच्छा किया है। वहीं, राशा एक फिलर के तौर पर लगी हैं। लेकिन उनका डांस काफी अच्छा है। अभिनय की भी अच्छी कोशिश है। वहीं, अजय देवगन इस बार भी अपने अंदाज में दिखे हैं। कोई भी परिवर्तन नहीं दिखा। इसके लिए अलावा डायना पैंटी और पीयूष मिश्रा भी कैरेक्टर संग जस्टिस करते हैं। वहीं मोहित मलिक निगेटिव शेड में खूब जच रहे हैं। उनका काम भी काबिल-ए-तारीफ है।
टेक्नीकल खांचे में भी फिल्म अपने आपको अच्छा दिखाने की कोशिश करती है। फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी कमजोर है। जो थोड़ा बोर करता है। इसे और कसावट के साथ लिखना चाहिए था। सिनेमैटोग्राफी खूबसूरत है जो बीहड़ को अच्छे से दिखाती है। कई सीन्स क्यों हैं फिल्म में, ये भी कहना मुश्किल होता है। फिल्म की एडिटिंग भी ठीक है। फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है. फिल्म में वीएफक्स भी है, जो खटकता है। कुल मिलाकर अभिषेक कपूर के डायरेक्शन में इस बार वो बात नहीं दिखी। अभिषेक जिसके लिए जाने जाते हैं वो अंदाज पूरी तरह से गायब दिखा।
करीब ढाई घंटे की ये फिल्म आपको बीच फिल्म से उठकर जाने के लिए उकसा देती है। पूरी कहानी आपको नींद में धकेलने की कोशिश करती है। खै़र मेरी बात यहीं तक आप भी देखें और अपनी राय बनाएं।












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