SAIL: Bhilai Steel Plant को मिली संजीवनी, रावघाट माइंस की राह हुई आसान, भिलाई पहुंचा लौह अयस्क
बीएसपी ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र नारायणपुर के रावघाट माइंस प्रोजेक्ट का पहला चरण पूरा कर लिया है। अब रावघाट माइंस से भिलाई इस्पात संयंत्र को लौह अयस्क (Iron Ore) की आपूर्ति हो सकेगी।
दुर्ग, 11 सितम्बर। छत्तीसगढ़ में स्थित सेल की ध्वज वाहक इकाई भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए आज का दिन बेहद खास है। क्योंकि आज संयंत्र को पुनः संजीवनी मिल गई है। बीएसपी ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र नारायणपुर के रावघाट माइंस प्रोजेक्ट का पहला चरण पूरा कर लिया है। अब रावघाट माइंस से भिलाई इस्पात संयंत्र को लौह अयस्क (Iron Ore) की आपूर्ति हो सकेगी। आयरन ओर की कमी के कारण लगातार उत्पादन में पिछड़ रहा बीएसपी फिर से अपनी क्षमता बढ़ा सकेगा।

लौह अयस्क परिवहन का सफल रहा ट्रायल
दरअसल कांकेर जिले के रावघाट खदान के अंजरेल क्षेत्र में दिसम्बर 2021 से भिलाई इस्पात संयंत्र ने लौह अयस्क उत्खनन का कार्य शुरू किया है। लेकिन इस लौह अयस्क को भिलाई तक लाने के लिए रेल लाइन का निर्माण किया गया है। इस परियोजना के तहत अंजरेल से उत्खनन किए गए लौह अयस्क( Iron Ore) के प्रथम रैक का तकनीक ट्रायल लेते हुए अंतागढ़ से भिलाई इस्पात संयंत्र लाया गया। भिलाई इस्पात संयंत्र परिसर में 11 सितम्बर सुबह संयंत्र के प्रभारी निदेशक अनिर्बान दासगुप्ता ने अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में इस रैक का स्वागत किया।

3 लाख टन अयस्क का होगा खनन
भिलाई इस्पात संयंत्र ने नक्सल प्रभावित नरायणपुर जिले के रावघाट क्षेत्र से 3 लाख टन प्रतिवर्ष लौह अयस्क के उत्खनन की अनुमति प्राप्त की है। आपको बता दें कि रावघाट में लौह अयस्क का संचित भंडार लगभग 732 मिलियन टन है। BSP की पहली खेप के रूप में 10 सितम्बर को अंतागढ़ से 21 वैगन लौह अयस्क भिलाई के लिए रवाना किया गया। अंजरेल से अंतागढ़ रेलवे स्टेशन तक 50 किलोमीटर सड़क मार्ग से और अंतागढ़ रेलवे स्टेशन से भिलाई इस्पात संयंत्र तक 150 किलोमीटर की यात्रा करके यह पहला रैक 11 सितम्बर को भिलाई पहुंचा है।

लौह अयस्क में 62 प्रतिशत आयरन की मात्रा
बीएसपी अधिकरियों के अनुसार अंजरेल से प्राप्त लौह अयस्क में 62 प्रतिशत तक आयरन (Fe) की मात्रा है। इस लौह अयस्क से भिलाई इस्पात संयंत्र की इस्पात उत्पादन की लागत में कमी आयेगी। जबकि राजहरा माइंस में लौह अयस्क समाप्ति की कगार पर है। अभी राजहरा के दुकली मांइस को शुरू किया गया है। दल्ली राजहरा के विकल्प के तौर पर लगभग 15 साल पहले राव घाट माइंस की खोज की गई। जहां लगभग 60 सालों तक चलने वाले आयरन की मात्रा पाई गई ।

1955 से राजहरा माइंस से हो रही सप्लाई
सन 1955 में SAIL-Bhilai Steel Plant के स्थापना से ही इसके लिए लौह अयस्क आपूर्ति करने राजहरा माइंस की शुरुआत की गई थी।जिससे लगातार 67 सालों से राजहरा माइंस से आयरन ओर की आपूर्ति संयंत्र में कमी रही है। लेकिन अब यहां अच्छी क्वालिटी के आयरन ओर की मात्रा लगभग समाप्त हो चुकी है। अब यहां सिर्फ यहां 5 सालों तक आपूर्ति करने लायक आयरन ओर बचा है। इस बीच दल्ली राजहरा में ही दुलकी ब्लॉक की माइनिंग शुरू की गई है।

कमजोर पड़ रहा राजहरा माइंस
भिलाई इस्पात संयंत्र में उत्पादन की क्षमता को बढ़ाए जाने के कारण लौह अयस्क की आपूर्ति में दल्ली राजहरा माइन्स कमजोर हो चुका है। यहां के लौह अयस्क में अब सिलिका की मात्रा अधिक पाई जा रही है। जिसके लिए यहां सिलिका फिल्टर करने का संयंत्र भी लगाया गया है। यहां बचे कम अयस्क की मात्रा वाले फाइन्स का इस्तेमाल फिर से किया जा रहा है। अच्छे आयरन ओर की आपूर्ति फिलहाल झारखंड के सिंहभूम मेगाहता बुरु और किरीबुरु से की जा रही है। लेकिन इसका परिवहन खर्च अधिक है।

रावघाट रेलवे स्टेशन से किया जा रहा परिवहन
कांकेर जिले के रावघाट क्षेत्र से लौह अयस्क उत्खनन कर भिलाई तक लाने के लिए दल्ली राजहरा से नारायणपुर तक और नारायणपुर से जगदलपुर तक की रेललाइन परियोजना की शुरुआत सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र और भारतीय रेलवे के माध्यम से की गई है। इस परियोजना के तहत दल्ली राजहरा से अंतागढ़ तक की 60 किलोमीटर लंबी रेललाइन का कार्य पूर्ण हो चुका है। जिससे वर्तमान में सप्लाई की जा रही है। और इसके आगे का कार्य तेज गति से जारी है। अंतागढ़ में लौह अयस्क के परिवहन को ध्यान में रखते हुए स्टेशन के नजदीक एक वे ब्रिज और स्टाक यार्ड का निर्माण भी किया गया है।

हमे गर्व है कि छत्तीसगढ़ के लोहे से बना रहा रेल
इस अवसर पर संयंत्र के निदेशक प्रभारी अनिर्बान दासगुप्ता ने कहा कि यह गर्व की बात है कि छत्तीसगढ़ की धरती से लौह अयस्क ब्लास्ट फर्नेस, स्टील मेल्टिंग शॉप तक पहुंचता है और विश्व स्तरीय उत्पादों जैसे हमारा रेल में परिवर्तित हो जाता है। उन्होंने कहा कि हम रावघाट में रामकृष्ण मिशन, बीएसएफ और डीएवी स्कूल से मिल कर कार्य कर
रहें है। मुझे विश्वास है कि दल्ली-राजहरा रावघाट खनन क्षेत्र लौह अयस्क के लिए लाभकारी क्षेत्र के रूप में कार्य करेगा। रावघाट से लंबे समय से प्रतीक्षित अयस्क का खनन अब साकार हो रहा है।
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