13 वीं शताब्दी में कलचुरी राजाओं द्वारा निर्मित देवबलौदा शिव मंदिर, जानिए आज भी क्यों है अधूरा
छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में कबीरधाम जिले के भोरमदेव शिव मंदिर के बाद राजधानी रायपुर और दुर्ग के बीच भिलाई-तीन, चरोदा रेल्वेलाइन के किनारे देवबलौदा गांव में 13 वीं शताब्दी का ऐतिहासिक शिव मंदिर कई रहस्यों को साथ लिए है
दुर्ग, 18 जुलाई। सावन को रिमझिम बारिश और भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव सावन माह में बड़े ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए भगवान शिव की पूजा-अर्चना को लेकर जिले के शिवालयों में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। यहां माह भर सुबह-शाम भगवान भोलेनाथ के जयकारे शिवालयों में गूंजते हैं। छत्तीसगढ़ में कई भगवान शिव के प्राचीन व अद्भुत शिवालय मौजूद है। जो अपने आप में पौराणिक व प्राचीन काल के इतिहास को समेटे हैं। आज हम आपको ऐसे ही 13 वी शताब्दी में बने एक प्राचीन छ: मासी शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहें है जो छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में बना है।

नागर शैली में बना है नवरंग मंडप
छत्तीसगढ़ में कई ऐसे जगह है, जहां प्राचीन काल में बनाए गए मंदिरों से उनके काल की स्थापत्य कला को जाना जा सकता है, यहां ऐसे कई देवी देवताओं के मंदिर हैं जिनमें शासक राजाओं द्वारा स्थापित किए गए शिव मंदिर भी शामिल है। छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में कबीरधाम जिले के भोरमदेव शिव मंदिर के बाद राजधानी रायपुर और दुर्ग के बीच भिलाई-तीन, चरोदा रेल्वेलाइन के किनारे बसे देवबलौदा गांव में 13 शताब्दी का ऐतिहासिक शिव मंदिर कई रहस्यों को साथ लिए हुए है। यह शिव मंदिर आश्चर्य और रहस्य से भरा है। यहां नवरंग मंडप नागर शैली में बना देवबलौदा का प्राचीन शिव मंदिर अपने आप में खास है। इस मंडप में 10 स्तम्भ हैं जिनमे शैव द्वारपाल के रूप में विभिन्न आकृतियां उकेरी गई है। इस मंडप का छत भी पत्थरों से बना है।

कलचुरी कालीन स्थापत्य कला के मिलतें हैं सबूत
राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार जिले के देवबलौदा में स्थित इस शिव मंदिर का निर्माण कलचुरी राजाओं ने 13 वीं शताब्दी में कराया। मंदिर की बनावट काफी भव्य है। मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी भी उत्कृष्ट व आश्चर्यजनक है। मंदिर की दीवारों पर पशु, पक्षी, पेड़ पौधे व रामायण के किरदारों के साथ-साथ नित्य संगीत को भी पत्थरों पर उकेरा गया है। मंदिर के बरामदे को बड़े-बड़े पत्थरों के माध्यम से बनाया गया है। वही गर्भ गृह में जाने के लिए 6 फिट नीचे सीड़ियों के माध्यम से नीचे उतरना पड़ता है।

शिवजी के साथ अन्य देवी देवताओं की हैं मूर्तियां
मंदिर के गर्भ गृह में प्राचीन शिवलिंग आज भी विराजमान है, जिसकी पूजा पाठ प्रतिदिन विधि विधान से की जाती है। मंदिर के अंदर भगवान शंकर के साथ-साथ जगन्नाथ माता पार्वती समेत कई देवी-देवताओं के मूर्तियां बनी हुई है,,, वही मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान गणेश की दो भव्य प्रतिमा भी रखी गई है। मंदिर के ठीक सामने भगवान शंकर की सवारी नंदी की प्रतिमा विराजमान है,जिसे पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। इसके साथ ही मंदिर के सामने पीपल पेड़ के नीचे खुदाई से मिले कई खंडित प्रतिमाओं को संरक्षित कर रखा गया है। इन मूर्तियों से कलचुरी कालीन स्थापत्य कला की पहचान की जा सकती है। कल्चुरी कालीन मूर्तिकला व धार्मिक मान्यताओं व स्थापत्य कला की जीवंत गाथा के रूप में आज भी यह प्रतिमाएं लोगों को उस काल की जानकारी दे रही है।

मंदिर को लेकर कई कहानियां हैं प्रचलित
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत अटेंडेंट गंगाधर नागदेवे बताते हैं कि मंदिर के बारे में मान्यता यह भी है कि जब शिल्पकार मंदिर को बना रहा था तब वह इतना लीन हो चुका था कि उसे अपने कपड़े तक की होश नहीं थी। दिन रात काम करते-करते वह नग्न अवस्था में पहुंच चुका था। उस शिल्पकार के लिए एक दिन पत्नी की जगह बहन भोजन लेकर आई। जब शिल्पी ने अपनी बहन को सामने देखा तो दोनों ही शर्मिंदा हो गए। शिल्पी ने खुद को छुपाने मंदिर के ऊपर से ही कुंड में छलांग लगा दी। बहन ने देखा कि भाई कुंड में कूद गया तो इस गम में उसने भी बगल के तालाब में कूद कर प्राण त्याग दिए। आज भी कुंड और तालाब दोनों मौजूद है, और तालाब का नाम भी करसा तालाब पड़ गया क्योंकि जब वह अपने भाई के लिए भोजन लेकर आई थी, तो भोजन के साथ सिर पर पानी का कलश भी था। तालाब के बीचो बीच कलशनुमा पत्थर आज भी मौजूद है।

छः मासी रात में बने शिव मंदिर है अधूरा
मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। उस दौरान छह महीने तक लगातार रात ही थी। इसलिए इसे 6 मासी मंदिर के रूप में जाना जाता है । छ:मासी मंदिर की कहानी यह भी है। छह मासी रात बीत जाने के बाद दिन हो गया। जिसके कारण इसके ऊपर गुंबद के निर्माण को अधूरा छोड़ दिया गया,,, राजा ने इस मंदिर को छह मासी रात में पूर्ण करने की जिम्मेदारी शिल्पकार को दी थी। मंदिर के अंदर करीब तीन फीट नीचे गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग और मंदिर के बाहर बने कुंड को लेकर प्रचलित लोक कथाओं के बीच यह मंदिर अपने आप में खास है। बताया जाता है कि मंदिर को बनाने वाला शिल्पी इसे अधूरा छोड़कर ही चला गया था, इसलिए इसका गुंबद ही नहीं बन पाया। दूसरे कुंए के अंदर एक गुप्त सुरंग है। जो सीधे आरंग में निकलता है। इसी गुप्त सुरंग से शिल्पकार मन्दिर अधूरा छोड़ आरंग पहुंच गया था। आरंग पहुंचने के बाद श्राप वश शिल्पकार पत्थर का हो गया जो आज भी आरंग में देखा जा सकता है।

कुंड में स्थित गुप्त सुरंग पहुंचती है आरंग
मंदिर के किनारे कुंड के बारे में लोगों का कहना है कि इस कुंड के अंदर एक गुप्त सुरंग है, जो सीधे आरंग के मंदिर के पास निकलती है। यहां मौजूद कुंड के भीतर दो कुएं हैं। जिसमें से एक कुंए का सम्बंध सीधे पाताल लोक से है। जिसके कारण यहां का पानी कभी नहीं सूखता। वह शिल्पी जब इस कुंड में कूदा तब उसे वह सुरंग मिली और उसके सहारे वह सीधे आरंग पहुंच गया। बताया जाता है कि आरंग में पहुंचकर वह पत्थर का हो गया और आज भी वह पत्थर की प्रतिमा वहां मौजूद है। इस कुंड में 23 सीढिय़ा है और उसके बाद दो कुएं है। इसमें से एक पाताल तोड़ कुआं है जिससे लगातार पानी निकलता है।

हर साल महाशिवरात्रि में लगता है मेला
शिव भक्ति से ओतप्रोत इस गांव में हर साल महाशिवरात्रि में एक भव्य मेले का आयोजन होता है। जिसमें दूर दूर से लोग मेले का आनंद लेने पहुंचते हैं। वहीं हर साल शिवरात्रि व सावन माह में यहां भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने जनसैलाब उमड़ता है। इस मंदिर के प्रति भक्तों की श्रद्धा देख यहां हर साल देवबलोदा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। जिसमें कला संस्कृति और सेवा से जुड़े लोगों को सम्मानित किया जाता है।मन्दिर प्रांगण बोल बम के नारे के साथ मंदिर परिसर गूंज उठता है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। जिसका समय समय पर जीर्णोद्धार कराया जाता है। वही इस मंदिर कि चारों तरफ गार्डन का निर्माण कराया गया है। जिसमें लोग विश्राम करते हैं।
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