MCD Elections 2022: पूर्वांचली वोटर इस बार किसके साथ ? 75 से 80 वार्ड में तय करेंगे हार या जीत

एमसीडी चुनाव में पूर्वांचल के वोटर जिस भी पार्टी का समर्थन करेंगे, उसकी जीत आसान होने की उम्मीद है। पूर्वांचली वोटर लगभग एक-तिहाई वार्ड में प्रभावी भूमिका में हैं। सभी पार्टियों ने इन्हें टिकट भी दिए हैं।

MCD Elections 2022 news: दिल्ली नगर निगम चुनाव में मतदान के लिए अब गिनती के दिन रह गए हैं। इस बार के चुनाव में नया ये है कि भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है और जाहिर है कि उसे एंटी-इंकम्बेंसी का भी सामना करना पड़ रहा होगा। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी है, जो अबकी बार हर हाल में एमसीडी को भी अपने कब्जे में लेना चाहती है। एमसीडी की सत्ता तय करने में पिछले कई चुनावों की तरह इस बार भी पूर्वांचल के वोटरों का बहुत बड़ा रोल रहने वाला है। क्योंकि, लगभग एक-तिहाई वार्ड में वही जीतेगा, जिसे पूर्वांचल के वोटरों का मोटा समर्थन हासिल होगा।

कौन हैं पूर्वांचली मतदाता ?

कौन हैं पूर्वांचली मतदाता ?

दिल्ली की करीब 2 करोड़ आबादी में पूर्वी यूपी, बिहार और झारखंड के लोगों की आबादी करीब 70-75 लाख मानी जाती है। इन्हें ही पूर्वांचली कहा जाने लगा है। यह ऐसी हिंदी भाषी जनसंख्या है, जो आमतौर पर टूटी-फूट हिंदी बोलती है और उसमें क्षेत्र का प्रभाव यानि भोजपुरी, मैथिली या मगही स्पष्ट रूप से महसूस होता है। यह आबादी राजनीतिक रूप से बहुत ही जागरूक है और हर चुनाव में अपने राजनीतिक हित के मुताबिक ही वोटिंग करता रहा है। यही वजह है कि इस बार हो रहे दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस सभी पूर्वांचलियों पर ना सिर्फ मतदान के लिए डोरे डाल रहे हैं, बल्कि अच्छी-खासी संख्या में इसी आबादी में से लोगों को टिकट भी दिए हैं।

पूर्वांचली दिल्ली में क्यों हैं महत्वपूर्ण ?

पूर्वांचली दिल्ली में क्यों हैं महत्वपूर्ण ?

दिल्ली चुनाव में पूर्वांचली वोट का महत्त्व ऐसे समझ सकते हैं कि राजधानी के कुल 1.46 करोड़ वोटरों में अनुमानित तौर पर एक-तिहाई उन्हीं इलाकों से हैं। चुनावी जानकारों के मुताबिक एमसीडी के 250 वार्ड में से कम से कम 75 से 80 वार्ड में उम्मीदवारों की किस्मत पूर्वांचल इलाकों के वोटर ही तय करने वाले हैं। अगर विधानसभा चुनावों की बात करें तो दिल्ली की 70 सीटों में 25 से ज्यादा सीटों पर इनकी भूमिका अब प्रभावी हो जाती है। यानि कोई भी पार्टी इतनी बड़ी आबादी को नजरअंदाज करके दिल्ली की चुनावी राजनीति में फिट नहीं बैठ सकती। मोटे अनुमानों के मुताबिक राजधानी की हर सीट पर पूर्वांचल के वोटरों की संख्या कम से कम 10,000 है। हालांकि, कुछ चुनावी विश्लेषक पूर्वांचल के वोटरों को एक वोट बैंक समझने की गलती कर देते हैं, लेकिन यह जमीनी सच्चाई कतई नहीं है।

कांग्रेस को पूर्वांचली वोटरों के वापसी का भरोसा

कांग्रेस को पूर्वांचली वोटरों के वापसी का भरोसा

दिल्ली की सत्ता पर शीला दीक्षित के जमाने में कांग्रेस ने 15 वर्षों तक कब्जा रखा था तो उसमें दिल्ली के वोटरों के इस तबके की भूमिका भी बड़ी मानी जा सकती है। मौजूदा एमसीडी चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर से पूर्वांचल के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। इसी मंसूबे के तहत पार्टी ने यमुना किनारे छठ घाटों को बेहतर करने का वादा भी किया है। जब शीला दीक्षित सीएम थीं तो उन्होंने दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी की स्थापना की थी। इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने करीब 50 ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जिनका बैकग्राउंड पूर्वांचल का है।

भाजपा को लोकसभा और एमसीडी चुनावों में मिला है साथ

भाजपा को लोकसभा और एमसीडी चुनावों में मिला है साथ

भाजपा सुषमा स्वराज के जमाने में दिल्ली की सत्ता से बाहर हुई थी, उसके बाद उसे वापसी का मौका फिर कभी नहीं मिला। लेकिन, पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में उसने दिल्ली पर पूर्ण कब्जा किया है तो उसमें पूर्वांचल के मतदाताओं का योगदान बहुत बड़ा रहा है। यही हाल एमसीडी चुनावों में भी होता है। पार्टी लगातार तीन-तीन बार एमसीडी चुनाव जीती है तो उसमें पूर्वांचलियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। इसलिए बीजेपी अपने इस वोट बैंक को जोड़े रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पटना में बिताए अपने बचपन की यादें साझा करते हैं तो यह भी बताने से नहीं थकते कि कैसे छठ पूजा के दौरान वह प्रसाद के रूप में ठकुआ मांगा करते थे।

भाजपा ने भी पूर्वांचलियों को दिए हैं करीब 50 टिकट

भाजपा ने भी पूर्वांचलियों को दिए हैं करीब 50 टिकट

राजधानी में बीजेपी के स्टार प्रचारकों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भी हैं तो दिल्ली के स्थानीय सांसद मनोज तिवारी से लेकर गोरखपुर के एमपी रवि किशन और आजमगढ़ के सांसद दिनेश यादव निरहुआ तक उतरे हुए हैं। यह सारी कवायद इसलिए है कि पूर्वांचली वोटरों की मदद से लगातार चौथी बार उसकी एमसीडी में वापसी हो जाए। भाजपा ने भी लगभग 50 ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं, जिनका सीधा नाता पूर्वी यूपी, बिहार या फिर झारखंड जैसे राज्यों से है।

आम आदमी पार्टी इस बार ट्रेंड बदलना चाहती है

आम आदमी पार्टी इस बार ट्रेंड बदलना चाहती है

अभी तक तो यही समझ में आया है कि पूर्वांचल के वोटर मतदान बहुत ही स्मार्ट तरीके से करते हैं। उन्होंने पिछले कई चुनावों से लोकसभा और एमसीडी के लिए बीजेपी को चुना है तो विधानसभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के नाम पर वोट देने में दरियादिली दिखाई है। केजरीवाल इस बार इसी ट्रेंड को बदलने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। वह हर हाल में दिल्ली नगर निगम भारतीय जनता पार्टी से छीनना चाहते हैं। मुफ्त बिजली-पानी के मुद्दे ने विधानसभा चुनावों में उन्हें दिल्ली के बाकी मतदाताओं के साथ ही पूर्वांचल के वोटरों का भी समर्थन दिलाया है।

4 दिसंबर को क्या करेंगे पूर्वांचल के 'स्मार्ट' वोटर

4 दिसंबर को क्या करेंगे पूर्वांचल के 'स्मार्ट' वोटर

आम आदमी पार्टी सरकार ने भी भोजपुरी और मैथिली को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। हाल ही में उसने कांग्रेस के बड़े नेता महाबल मिश्रा को अपने साथ जोड़ा है, जिनका यूपी-बिहार के लोगों पर काफी प्रभाव माना जाता रहा है। आम आदमी पार्टी ने भी करीब 50 ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं, जो पूर्वांचल से हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में छठ घाटों के विकास के भी दावे करती है, तो यमुना में झाग का मुद्दा भी उसके साथ जुड़ा हुआ है। एमसीडी के लिए वोटिंग 4 दिसंबर को होनी है और उसी दिन पूर्वांचल के 'स्मार्ट' वोटर अपना जनादेश देकर पांच साल के लिए दिल्ली की स्थानीय सरकार का भाग्य तय करने वाले हैं।

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