आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पत्नी क्या गुजारा भत्ता की हकदार है? दिल्ली हाईकोर्ट का आया बड़ा फैसला
Delhi High Court: दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक केस की सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ठ कहा है कि यदि कोई पति या पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र है, तो उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत दिया गया है।
न्यायमूर्ति अनिल क्षत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने भारतीय रेलवे यातायात सेवा की ग्रुप 'ए' अधिकारी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। खंडपीठ ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता सामाजिक न्याय का एक उपाय है, न कि दो सक्षम व्यक्तियों की वित्तीय स्थिति को बराबर करने या उन्हें समृद्ध करने का माध्यम।

कमाऊ पत्नी भी गुजारे-भत्ते को लेकर कोलकाता HC ने सुनाया था ये फैसला?
बता दें सितंबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि बेरोजगार पूर्व पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते, भले ही पत्नी नौकरी करती हो। न्यायमूर्ति अजय कुमार मुखोपाध्याय की पीठ ने एक ऐसे मामले में यह निर्णय सुनाया जहां महिला 12,000 रुपये मासिक वेतन पर कार्यरत है, जबकि उसका पूर्व पति बेरोजगार है।
दिल्ली HC बोला-आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पत्नी नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता
वहीं अब दिल्ली हाई कोर्ट ने इस केस में फैसला सुनाया है कि हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए) की धारा 25 अदालतों को स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण तय करते समय आय, कमाई की क्षमता, संपत्ति और पक्षों के आचरण सहित अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करने का अधिकार देती है।
न्यायालय ने कहा, "हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए) की धारा 25 के तहत न्यायिक विवेक का प्रयोग तब गुजारा भत्ता देने के लिए नहीं किया जा सकता जब आवेदक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हो। इस तरह के विवेक का प्रयोग रिकॉर्ड के आधार पर उचित और न्यायोचित तरीके से किया जाना चाहिए।"
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक महिला द्वारा दायर याचिका से संबंधित है, जिसने अपने वकील पति से तलाक के बाद स्थायी गुजारा भत्ता और मुआवजे की मांग की थी। 2010 में शादी के बाद, यह जोड़ा सिर्फ एक साल साथ रहा था। अगस्त 2023 में एक परिवार अदालत ने क्रूरता के आधार पर इस शादी को रद्द कर दिया था।
पति ने पत्नी पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता का आरोप लगाया था, जिसमें अपमानजनक भाषा, आपत्तिजनक संदेश, वैवाहिक अधिकारों से इनकार और पेशेवर व सामाजिक क्षेत्रों में अपमान शामिल था। पत्नी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए पति पर क्रूरता का आरोप लगाया था।
परिवार अदालत ने शादी रद्द करते हुए यह भी दर्ज किया कि पत्नी ने तलाक के लिए 50 लाख रुपये की वित्तीय निपटान की मांग की थी, जैसा कि उसके हलफनामे में कहा गया था और जिरह के दौरान भी दोहराया गया था। महिला ने अपने पति के प्रति क्रूरता के परिवार अदालत के निष्कर्ष को भी चुनौती दी थी, जिसके आधार पर उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने यह देखते हुए कि महिला "तलाक के प्रति विशेष रूप से प्रतिकूल नहीं दिख रही थी, बल्कि वित्तीय सुरक्षा की आवश्यकता को उजागर करना चाह रही थी," ने कहा कि जब कोई पति या पत्नी, विवाह विच्छेद का विरोध करते हुए, साथ ही एक बड़ी राशि के भुगतान पर सहमति जताता है, तो ऐसे आचरण से पता चलता है कि यह विरोध स्नेह, सुलह या वैवाहिक बंधन को बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि मौद्रिक विचारों पर आधारित है।












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