नई दिल्ली सीट पर संदीप दीक्षित ने ऐसे लिया मां की हार का बदला! 12 साल बाद केजरीवाल को भी ले डूबे
Delhi Chunav Result 2025: दिल्ली चुनाव के रिजल्ट जितना भाजपा के लिए खुश करने वाले हैं, उतने ही अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी को परेशान करने वाले हैं। 27 साल बाद बीजेपी का सूखा खत्म हो गया और दो तिहाई बहुमत (48 सीट) के साथ सरकार बनाने जा रही है। इस बीच हैरान करने वाली खबर ये थी कि आप संयोजक अरविंद केजरीवाल खुद अपनी सीट नई दिल्ली से हार गए, उनको भाजपा के प्रवेश सिंह ने पटकनी दी, लेकिन केजरीवाल की हार एक तरह से कांग्रेस प्रत्याशी संदीप दीक्षित का बदला भी माना जा सकता है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 का सबसे सनसनीखेज नतीजा नई दिल्ली सीट से आया, जहां पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी के प्रवेश वर्मा ने इस सीट पर जीत दर्ज की, लेकिन इस हार में कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने अहम भूमिका निभाई। दिलचस्प बात यह है कि संदीप दीक्षित को मिले वोटों की संख्या लगभग उतनी ही थी, जितने वोटों से केजरीवाल हारे।

केजरीवाल की हार और 2013 की यादें
यह चुनाव संदीप दीक्षित के लिए सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक 'फैमिली बैटल' थी। 2013 में इसी सीट से अरविंद केजरीवाल ने संदीप दीक्षित की मां, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भारी अंतर से हराया था। 12 साल बाद ऐसा लग रहा है कि राजनीति का पहिया घूम चुका है और इस बार संदीप दीक्षित की मौजूदगी ने केजरीवाल की हार तय कर दी।
| टॉप थ्री उम्मीदवार | कुल वोट | मार्जिन | |
|---|---|---|---|
| 1 | प्रवेश वर्मा (BJP) | 30088 | 4089 |
| 2 | अरविंद केजरीवाल (AAP) | 25999 | -4089 |
| 3 | संदीप दीक्षित (CONG) | 4568 | -25520 |
इस नतीजे से यह कहा जा सकता है कि अगर संदीप दीक्षित इस चुनाव में नहीं होते, तो समीकरण कुछ और हो सकते थे।
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2013 से 2025: बदला पूरा हुआ?
2013 में जब अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल राजनीति में आए, तब उन्होंने शीला दीक्षित को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा और नई दिल्ली सीट से उन्हें हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया। शीला दीक्षित तीन बार यहां से जीत चुकी थीं, लेकिन केजरीवाल ने उन्हें 25,000 से अधिक वोटों से पराजित कर दिया।
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अब 2025 में वही कहानी दोहराई गई, लेकिन इस बार हारने वाले अरविंद केजरीवाल थे। राजनीति में वक्त के साथ समीकरण बदलते हैं और इस बार समीकरण केजरीवाल के खिलाफ रहा। संदीप दीक्षित के मैदान में होने से यह चुनाव सिर्फ एक आम मुकाबला नहीं रहा, बल्कि यह एक पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का नया अध्याय बन गया।
दिल्ली में बीजेपी की जीत और नई दिल्ली सीट पर हुए इस उलटफेर ने यह साफ कर दिया कि राजनीति में कोई भी अजेय नहीं होता।












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