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भारत में अब भी कायम हैं दहेज प्रथा के वीभत्स परिणाम

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 07 जून। कालू, कमलेश और ममता मीणा और उनके बच्चों की लाशें कुछ ही दिन पहले एक कुएं में मिलीं. मरने से पहले छोड़ा गया उनका एक संदेश भी मिला, जिसमें उन्होंने अपने ससुराल वालों को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया.

तीनों के रिश्तेदारों ने बताया कि उनके ससुराल वालों ने दहेज में और पैसों की मांग की थी जिसे उनके पिता पूरा नहीं कर पाए थे. इस वजह से तीनों के पति और ससुराल के बाकी सदस्य उनके साथ निरंतर हिंसा करते थे.

(पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने कहा घर बनाने के लिए पैसे मांगना भी दहेज)

पिछले महीने जयपुर के पास स्थित उनके मायके के पास ही तीनों की लाश मिली. साथ ही कालू के चार साल के बेटे और एक नवजात शिशु की भी लाश मिली. कमलेश और ममता गर्भवती थीं.

"यह रोज मरने से बेहतर है"

बहनों के एक रिश्तेदार ने बताया कि तीनों के गायब होने के बाद उनमें से एक का व्हाट्सएप पर एक संदेश मिला जिसमें लिखा था, "हम मरना नहीं चाहते लेकिन मौत उनकी प्रताड़ना से बेहतर है." आगे लिखा था, "हमारे ससुराल वाले हमारी मौत के जिम्मेदार हैं. हम एक साथ जान दे रहे हैं क्योंकि यह रोज मरने से बेहतर है."

दहेज को गैर कानूनी घोषित हुए 60 सालों से भी ज्यादा हो गए

जयपुर में एक वरिष्ठ पुलिस अफसर ने एएफपी को बताया कि पुलिस की जांच चल रही है और इस समय इसे आत्महत्या का मामले ही माना जा रहा है. बहनों के पिता सरदार मीणा ने बताया कि उनकी बेटियों का जीवन नर्क जैसा बन गया था.

(पढ़ें: भारत में दहेज प्रथा पर छिड़ी नई बहस)

उनके पतियों ने उन्हें आगे पढ़ने से मना कर दिया था और उन्हें निरंतर और पैसों के लिए परेशान करते रहते थे. उन्होंने एएफपी को बताया, "हमने पहले ही उन्हें इतनी सारी चीजें दे दी थीं, वो सारा सामान आप उनके घर में देख सकते हैं." इसमें पलंग, टेलीविजन सेट और फ्रिज शामिल हैं.

उन्होंने आगे कहा, "मैं छह बेटियों का बाप हूं, मेरे देने की एक सीमा है. मैंने उन्हें पढ़ाया था और वह भी कर पाना मुश्किल था." सरदार एक किसान हैं और उनकी आय ज्यादा नहीं है.

एक अपराध को सामाजिक स्वीकृति

पुलिस ने तीनों पतियों, उनकी मां और एक ननद को दहेज के लिए उत्पीड़न और पत्नी के उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है. एएफपी ने परिवार के पुरुषों से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कोशिश सफल नहीं हो पाई.

हर घंटे 30 से 40 महिलाओं के साथ घरों के अंदर हिंसा होती है

भारत में दहेज को गैर कानूनी घोषित हुए 60 सालों से भी ज्यादा हो गए. दहेज के लिए परेशान करना या पैसे मांगना अपराध है. लेकिन इसके बावजूद यह प्रथा चली आ रही है. इसके लिए महिलाओं को आर्थिक बोझ समझना और उन्हें बहु के रूप में स्वीकारने के लिए हर्जाना मांगने जैसी सामाजिक धारणाएं जिम्मेदार हैं.

(देखें: घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएं)

देश भर में स्थानीय मीडिया में वैवाहिक संपत्ति झगड़े और उन झगड़ों की वजह से हत्या की खबरें अक्सर आती रहती हैं. पिछले साल केरल में एक आदमी ने अपनी शादी में उसके ससुराल की तरफ से मिली नई गाड़ी और पांच लाख रुपए हथियाने के लिए अपनी पत्नी को जहरीले सांपों से कटवा कर मरवा दिया. व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा हुई.

देश में तलाक के इर्द गिर्द भी व्यापक शर्मिंदगी जैसी भावना है जिसकी वहज से विवाहित महिलाएं अत्याचारपूर्ण स्थितियों से निकल जाने के बारे में सोच नहीं पातीं. देश में सौ शादियों पर एक तलाक होता है.

स्थिति से निकल भी नहीं पातीं

मीणा बहनों के लिए भी ससुराल से निकल जाने का विकल्प कभी रहा ही नहीं, बावजूद इसके कि उनके परिवार वाले उनके साथ हो रही हिंसा के बारे में जानते थे.

विवाहित महिलाएं अत्याचारपूर्ण स्थितियों से निकल जाने के बारे में सोच नहीं पातीं

सरदार ने बताया, "हमने सोचा कि एक बार उनकी शादी हो गई तो उन्हें अपने परिवार की इज्जत बनाए रखने के लिए अपने ससुराल में ही रहना चाहिए. अगर हम उनकी फिर से कहीं और शादी करा देते और वहां हालात और खराब हो जाते, तब हम क्या करते. हमारी नाक कट जाती."

(पढ़ें: दहेज के लिए मकान नहीं तो कैसे हो शादी)

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2020 में करीब 7,000 हत्याएं दहेज की वजह से हुईं. यानी करीब 19 महिलाएं हर रोज मारी गईं. इसके अलावा 1,700 से ज्यादा महिलाओं ने "दहेज से जुड़े" कारणों की वजह से आत्महत्या कर ली.

यह कैसा समाज

जानकारों का कहना है कि असली आंकड़े इनसे कहीं ज्यादा हैं. पीयूसीएल संस्था के साथ काम करनी वाली ऐक्टिविस्ट कविता श्रीवास्तव ने एएफपी को बताया, "हर घंटे 30 से 40 महिलाओं के साथ घरों के अंदर हिंसा होती है...और ये सिर्फ दर्ज मामले हैं, तो असल मामले इनसे ज्यादा ही होंगे."

श्रीवास्तव कहती हैं कि मूल समस्या यह है कि भारत में घरेलू हिंसा को व्यापक रूप से सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है जिसकी वजह से महिलाएं खुद को दमनकारी और हिंसक रिश्तों में फंसा हुआ महसूस करती हैं.

(देखें: 2021 में घरेलू हिंसा के मामले बढ़े)

वो कहती हैं, "अगर एक महिला को भी यह लगने पर आत्महत्या करनी पड़े कि उसक वैवावहिक जीवन नष्ट हो गया है, तो मुझे लगता है भारत में स्टेट इन महिलाओं के लिए असफल हो गया है."

सीके/एए (एएफपी)

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Source: DW

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