भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापन अनुमान से कहीं ज्यादाः रिपोर्ट
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर। भारत में जिस तरह मौसमी बदलाव के कारण आपदाएं आ रही हैं, उसके कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन बढ़ने का अनुमान है. इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायर्नमेंट एंड डिवेलपमेंट (IIED) के शोधकर्ताओं ने पाया है कि देश के सबसे गरीब लोग इस कारण अपने घरबार छोड़कर दूसरी जगहों पर जाने को मजबूर हैं.

शोधकर्ताओं ने तीन राज्यों के एक हजार घरों का सर्वेक्षण किया. सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे प्रकृतिक आपदा के तुरंत बाद विस्थापित हुए. भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है.
सोमवार को जारी की गई अध्ययन की रिपोर्ट कहती है कि सूखे या बाढ़ के कारण फसलों की बर्बादी और चक्रवातों के कारण मछली पकड़ने में आने वाली बाधाएं मौसमी विस्थापन की सबसे बड़ी वजह रहीं. रिपोर्ट कहती है कि देश के बहुत से गरीब लोग जैसे कि छोटे किसान मौसमी आपदाओं के कारण होने वाली बर्बादी को वहन करने में नाकाम रहे हैं.
नहीं सह पा रहे हैं गरीब
शोधकर्ता कहते हैं कि देश में समुद्र जलस्तर का बढ़ना, तापमान का बढ़ना और चक्रवातों जैसी आपदाओं की वृत्ति बढ़ेगी. रिपोर्ट की सह लेखिका ऋतु भारद्वाज ने बताया, "मौसम के कारण होने वाले विस्थापन का आकार हैरतअंगेज है. हम यह नहीं सोच सकते कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. सूखा, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और बाढ़ ने पहले से ही संघर्ष कर रहे लोगों पर और अधिक दबाव डाला है और वे जीवनयापन के कारण घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं."
जर्मनवॉच नामक संस्था सालाना ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स जारी करती है जिसमें जलवायु के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों की सूची दी जाती है. 2021 की इस सूची में भारत टॉप 10 में है.
2020 में भारत में कई भयानक कुदरती आपदाएं आईँ. टिड्डी दल का अब तक का सबसे बड़ा हमला, तीन चक्रवातीय तूफान, एक बार गर्मी की लहर, कई राज्यों में आई बाढ ने सैकड़ों जानें लीं और हजारों को बेघर कर दिया.
भारद्वाज कहती हैं, "समुदाय झेलने और आसानी से उबर पाने में सक्षम नहीं हैं. उन्हें जो नुकसान होता है, वह बहुत ज्यादा है और वे इसलिए घर छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं क्योंकि वे निराश हो चुके होते हैं."
ग्लासगो जाएंगे मोदी
भारत ने अब तक यह नहीं बताया है कि वह शून्य कार्बन उत्सर्जन करना चाहता है या नहीं और यदि करेगा तो कैसे करेगा. दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक और सबसे ज्यादा कोयला उपभोग करने वाला देश चीन कह चुका है कि 2060 तक कार्बन शून्य हो जाएगा. चीन में कोयले की मांग भी तेजी से घटी है इसलिए भारत पर कोयला उपभोग का बड़ा हिस्सा निर्भर करेगा.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर से शुरू हो रहे ग्लासगो सम्मेलन में हिस्सा लेने जा रहे हैं. लेकिन ग्लासगो में अपने रुख को लेकर भारत ने अब तक कोई फैसला नहीं किया है. पर्यावरण मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि आने वाले हफ्ते में इस बारे में कोई फैसला हो सकता है. पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत उत्सर्जन घटाने में अपना काम कर रहा है. उन्होंने कहा, "भारत के एनडीसी (जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए योजनाएं) काफी महत्वाकांक्षी हैं. हम अपने हिस्से से ज्यादा काम कर रहे हैं. हमारे लक्ष्य दूसरे बड़े प्रदूषकों से कहीं ज्यादा बड़े हैं."
ऑस्ट्रेलिया ने जारी किया लक्ष्य
कोयले के भरपूर भंडार रखने वाले ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि वह 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह खत्म कर देना चाहता है. वहां के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने मंगलवार सुबह मीडिया से बातचीत में कहा कि देश के लोग एक ऐसी नीति चाहते हैं जो जलवायु परिवर्तन पर उचित कदम उठाए और साथ ही उनकी नौकरियों की भी रक्षा करे.
अब तक जलवायु परिवर्तन को लेकर ढिलाई बरतने की आलोचना झेलने वाले ऑस्ट्रेलिया के लिए यह नीति में एक तरह का परिवर्तन है. हालांकि प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने 2030 तक उत्सर्जन कम करने के लिए कड़े प्रबंध करने पर कोई वादा नहीं किया.
पहले ऑस्ट्रेलिया ने वादा किया था कि 2030 तक वह अपने कार्बन उत्सर्जन के 2005 के स्तर में 26-28 प्रतिशत तक हासिल कर लेगा. मंगलवार को मॉरिसन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया यह लक्ष्य हासिल करेगा.
स्कॉट मॉरिसन ने कहा, "हम चाहते हैं कि खनन जैसे हमारे भारी उद्योग खुले रहें और उनकी प्रतिद्वन्द्विता बनी रहे ताकि जब तक दुनिया में मांग है, तब तक उनकी जरूरत बनी रहे."
स्कॉट मॉरिसन ने एक पर्यावरण योजना जारी की है, जिसे उन्होंने ग्लासगो में ऑस्ट्रेलिया का पक्ष बताया है. उन्होंने कहा कि वह इस योजना को लेकर ग्लासगो जाएंगे.
वीके/ (रॉयटर्स, एपी)
Source: DW
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