छपरा पर राजद में रार, समधी या समधन में से एक हो सकता है उम्मीदवार
पटना: वक्त सबसे बड़ा मुंसिफ है। वह अपने फैसले में कौन सी इबारत लिखेगा, कोई नहीं जानता। लोकसभा चुनाव के लिए राजद नेता तेजस्वी यादव बहुत पहले से एनडीए के खिलाफ मजबूत मोर्चाबंदी में जुटे थे। लेकिन अब अचानक उनकी किलेबंदी में कई दरारें उभर आयी हैं। लालू यादव के जेल में रहने से हालात पर काबू पाने वाला कोई नहीं है। घर का झगड़ा अब चुनावी तैयारियों पर असर दिखाने लगा है। नरेन्द्र मोदी और नीतीश को धूल चटाने की बात करने वाले तेजस्वी कश्मकश में फंस गये हैं। राजद के स्टार चुनाव प्रचारकों में बड़ी बहन मीसा भारती का नाम नहीं होने से तेजस्वी सवालों के घेरे में हैं। अब छपरा लोकसभा सीट की उम्मीदवारी को लेकर राजद भ्रम के भंवर में घिर गया है।

क्या लालू की बड़ी बेटी मीसा की अनदेखी हुई ?
राजद ने 40 स्टार प्रचारकों की भारीभरकम टीम तैयार की है, लेकिन इसमें मीसा भारती का नाम गायब है। डॉक्टर मीसा भारती लालू यादव की बड़ी बेटी हैं और राज्यसभा सांसद भी हैं। वे लालू परिवार में सबसे अधिक पढ़ी लिखी हैं। एमबीबीएस की टॉपर हैं। बातों को बड़े सलीके से जनता के सामने रखती हैं। एक स्टार प्रचार की तमाम खुबियां उनमें हैं। फिर भी उन्हें 40 प्रचारकों की टीम में जगह देना मुनासिब नहीं समझा गया । इस मसले पर पार्टी में कोई मुंह नहीं खोल रहा। राजद में कोई बोले या नहीं बोले लेकिन सियासी हलके में सवाल उठने शुरू हो गये हैं। वैसे तो लालू ने पहले ही तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रखा है। लालू का यह फैसला ही घर में कलह का कारण बन गया है। लालू के बड़े पुत्र तेज प्रताप अपनी उपेक्षा पर नाखुशी जाहिर करते रहे हैं। मीसा भारती ने भी एक बार दोनों भाइयों के झगड़े की बात कबूल की थी। वैसे मीसा का पाटलिपुत्र लोकसभा सीट पर फिर चुनाव लड़ना तय है लेकिन राजनीति में कब बाजी पलट जाए, कहा नहीं जा सकता।

पाटलिपुत्र सीट पर एक विधायक की भी नजर
तेजस्वी के करीबी विधायक भाई वीरेन्द्र की भी इस सीट पर नजर है। वे मनेर के विधायक हैं। 2014 में इसी पाटलिपुत्र सीट को लेकर लालू को बड़ा झटका लगा था। लालू के हनुमान समझे जाने वाले रामकृपाल ने उनका साथ छोड़ दिय़ा था। कहा जाता है कि मीसा भारती की जिद के कारण लालू को ये सीट रामकृपाल की बजाय उन्हें देनी पड़ी थी। रूष्ट रामकृपाल भाजपा में आ गये। मीसा भारती हार गयीं। चर्चा के मुताबिक मीसा ने फिर राज्यसभा में जाने की जिद की। लालू फिर झुके और उन्हें राज्यसभा में भेजना पड़ा। क्या अब राजद में मीसा को पहले की तरह तरजीह नहीं मिल रही ?

छपरा लालू की पसंदीदा सीट
छपरा लोकसभा सीट लालू प्रसाद की सबसे पसंदीदा सीट रही है। 1977 में 29 साल के लालू पहली बार इसी सीट से सांसद बने थे। इसके बाद वे सियासत की सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ते गये। 2004 में लालू ने छपरा और मधेपुरा, दो सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ा था। दोनों पर जीते। लेकिन मधेपुरा सीट से उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। 1999 की हार से उनका मधेपुरा से मोहभंग हो गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में लालू चुनाव लड़ने के काबिल नहीं रहे थे । उन्होंने पत्नी राबड़ी देवी को छपरा से चुनाव मैदान में उतारा। भाजपा के राजीव प्रताप रूड़ी ने राबड़ी देवी को हरा दिया था।

छपरा सीट पर राबड़ी होंगी या चंद्रिका ?
2019 में राबड़ी देवी ने व्यक्तिगत कारणों से उम्मीदवार बनना नामंजूर कर दिया। तब इस बात की चर्चा होने लगी कि इस बार तेज प्रताप के ससुर चंद्रिका राय को यहां से मैदान में उतारा जाएगा। लालू के बड़े पुत्र तेजप्रताप ने अपनी पत्नी ऐश्वर्य राय से तलाक लेने के लिए अदालत में अर्जी दाखिल कर रखी है। उस पर सुनवाई चल रही है। तेजप्रताप तलाक के लिए अडिग हैं। तेज ने आरोप लगाया था कि ऐश्वर्य अपने पिता चंद्रिका राय के लिए छपरा सीट दिये जाने का दबाव बना रही थीं। उनकी घरवालों से इस कदर नाराजगी है कि वे मां राबड़ी देवी के आवास से अलग दूसरे बंगले में रहते हैं। विधायक की हैसियत से अलग बंगले के लिए उन्होंने नीतीश कुमार से गुजारिश भी की थी। इस बीच राजद को आंतरिक श्रोतों से पता चला कि चंद्रिका राय के छपरा से चुनाव लड़ने पर भीतरघात भी हो सकता है। इसके बाद राबड़ी देवी को मनाने की कोशिश शुरू हुई। राबड़ी देवी पर चुनाव लड़ने का भारी दबाव है।

राबड़ी देवी पर उम्मीदवार बनने का दबाव
अब कहा जा रहा है कि राबड़ी देवी बेमन ही सही, चुनाव लड़ने के बारे में सोचने लगी हैं। अगर छपरा सीट पर राबड़ी की जगह किसी दूसरे नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है तो उससे चंद्रिका समर्थकों में प्रतिक्रिया हो सकती है। चंद्रिका राय पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय के पुत्र हैं। दारोगा प्रसाद राय तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। लालू ने खुद दारोगा राय की सरपरस्ती में राजनीति शुरू की थी। दारोगा प्रसाद राय छपरा इलाके के दिग्गज नेता थे। आज भी इस इलाके में उनका बहुत सम्मान है। चंद्रिका राय अभी विधायक हैं। लालू, चंद्रिका राय समर्थकों को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकते। राबड़ी देवी के खड़ा होने पर यह तर्क दिया जा सकता है पिछले चुनाव की तरह उन्हें फिर मौका दिया गया है। इस लिए अगर चंद्रिका राय को किनारे लगाना है तो राबड़ी देवी को सामने लाना जरूरी है। लेकिन ये फैसला बहुत आसान भी नहीं है।












Click it and Unblock the Notifications