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संतो के कार्य मे बाधा न आये, इसलिए द्वार पर डंडा लेकर बैठे हैं स्वंयसेवक, चित्रकूट में क्या-क्या बोले भागवत?

RSS Mohan Bhagwat: चित्रकूट में चल रहे पंडित रामकिंकर उपाध्याय जन्म शताब्दी समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संतों के कार्यों में कोई बाधा न आए, इसलिए द्वार पर डंडा लेकर बैठने का काम हमारे संघ का है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन राव भागवत चित्रकूट के दौरे पर हैं। मंगलवार को चित्रकूट पहुंचे मोहन भागवत ने यहां आयुर्वेद की पंचकर्म पद्धति से उपचार कराया। बुधवार वे मानस विशेषज्ञ पंडित रामकिंकर उपाध्याय जन्म शताब्दी समारोह में भी शामिल हुए। यहां उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं और मौजूद संतों को संबोधित किया।

RSS Mohan Bhagwat

अपने संबोधन के दौरान भागवत ने कहा हमारे देश में धर्म और अधर्म की लड़ाई चल रही है। अब इसे सुधारने का समय आ गया है। इसके लिए हमें ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य निभाना होगा और धर्म के पक्ष में खड़ा होना होगा, लेकिन यह आचरण के रूप में दिखाई देना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि एकतरफा स्वार्थ का दैत्य भारत को दबाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सत्य कभी दबता नहीं है। सत्य समय आने पर सिर चढ़कर बोलता है। यही कारण है कि हमारी अस्तित्व की शक्ति कभी समाप्त नहीं होती। कार्यक्रम में मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू, मैथिलीशरण महाराज और चिदानंद महाराज भी मंचासीन रहे।

संघ प्रमुख ने सनातन धर्म को लेकर भी बातें की। कहा, इसे जन-जन के आचरण में लाना है। भारत, हिन्दू और सनातन धर्म में कोई भेद नहीं है। यह एकाकार हैं। सनातन धर्म दुनिया को प्रदान करना हिन्दू समाज और भारत का कर्तव्य है। अयोध्या पर कहा कि अयोध्या सबकी है। अगर यह मंदिर सनातन धर्म का है तो यह सभी सनातनियों का है। सभी सनातनियों को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी चाहिए।

भागवत ने गीता का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां श्रीकृष्ण और अर्जुन होते हैं, वहां धर्म की स्थापना होती है। उन्होंने कहा कि भारत को बड़ा बनाने और दुनिया को राहत देने के लिए राम की आवश्यकता है। विश्व को युद्ध विहीन करने के लिए हर मन में अयोध्या लानी होगी। यूनान, मिश्र, रोमा मिट गए, लेकिन हस्ती हमारी है कि मिटती नहीं। ऐसा इसलिए हो रहा कि क्योंकि इस हस्ती के मन में प्रगट कर सकने वाले महापुरुषों की परंपरा सतत है। संघ प्रमुख ने कहा महाभारत यह बताती है कि दुनिया कैसी है और रामायण यह बताती है कि उस दुनिया में हमें कैसे रहना है। रंग, रूप और पूजा पद्धति में अंतर के बाद भी हम एक हैं। हमारा राष्ट्र विश्व को धर्म देने के लिए बना है।

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