क्या छत्तीसगढ़ में कमजोर पड़ रहा है नक्सली आतंक ? राज्य और केंद्र सरकार के दावे जुदा
बस्तर संभाग के सभी जिलों में नक्सली आतंक का साया हरदिन मंडराता रहता है। राज्य की सियासत का केंद्र बिंदु रहे माओवाद को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मुखर रहे हैं।
रायपुर, 16 जुलाई। बीते दो दशकों से अभी अधिक समय से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की जड़े बेहद अंदर तक मजबूत हैं। इस बीच राज्य की सत्ता पर काबिज होने वाली हर सरकार को नक्सल समस्या से निपटने के लिए अच्छी खासी मशक्क्त करनी पड़ी है,लेकिन आज भी नक्सलवाद पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है। राज्य के बस्तर संभाग के सभी जिलों में नक्सली आतंक का साया हरदिन मंडराता रहता है। राज्य की सियासत का केंद्र बिंदु रहे माओवाद को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मुखर रहे हैं। इन दिनों केंद्र की एनडीए सरकार और छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार के आंकड़े परस्पर तौर पर नक्सली समस्या को लेकर किये जा रहे आंकलन पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

केंद्र का दावा देश से सिमट रहे नक्सली
बीते कुछ सालों की बात करें तो देश में वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी हिंसा की घटनाओं में 77 फीसदी तक की कमी आई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक है कि साल 2009 में सम्पूर्ण देश में सबसे अधिक वामपंथी उग्रवाद की हिंसक घटनाएं रिकॉर्ड की गई थीं , जो कि 2258 थीं। किन्तु साल 2021 तक ये घटनाएं महज 509 रह गईं हैं।
वहीं मृत्यु के आंकड़े में भी कमी आई है, जिसमें सिविलियन और सुरक्षाबल दोनों शामिल हैं। साल 2010 में सबसे अधिक 1005 लोगों की मौत हुई थी , जिसे परिणामी मृत्यु कहा जाता है, जबकि साल 2021 में ये घटकर 147 हो गई है। सरकार की रिपोर्ट यह दावा करती है कि बीते दो सालों में वामपंथी उग्रवाद की हिंसक वारदातों और परिणामी मौत में 24 और 27 फीसदी की कमी आई है।

लेकिन छत्तीसगढ़ में हालत बिगड़े !
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक केवल छत्तीसगढ़ ही ऐसा प्रदेश है, जहां बीते तीन सालों यानि 2019 से 2021 की बात करें, तो नक्सली घटनाएं भी अधिक हुई है और मौत के आंकड़े में भी वृद्धि हुई हैं। इन तीन सालों में नक्सलियों ने 833 वारदातों को कारित किया है, जिसमें 289 मृत्यु दर्ज हुई है यह बीते तीन सालों में पूरे देश में सबसे अधिक है।

छत्तीसगढ़ सरकार के दावे केंद्र से बिलकुल जुदा
इधर छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार की विश्वास, विकास और सुरक्षा की नीति के चलते प्रदेश के नक्सल प्रभावित बस्तर अंचल में नक्सल गतिविधियां काफी हद तक सिमट गई हैं। गुजरे साढ़े तीन सालों से प्रदेश में नक्सली घटनाओं की संख्या में काफी कमी आई है।
छत्तीसगढ़ सरकार की प्रेस विज्ञप्ति साल 2008 से लेकर 2018 तक के आंकड़ों को यदि देखा जाए तो इस दौरान प्रदेश में नक्सलियों की तरफ से हर साल 500 से लेकर 600 हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जाता था, जो कि बीते साढ़े तीन सालों में घटकर औसतन रूप से 250 तक सिमट गया है। साल 2022 में अब तक केवल 134 नक्सल घटनाएं हुई हैं, जो कि 2018 से पूर्व घटित घटनाओं से लगभग 4 गुना कम है।

शुरू हुए नक्सल इलाकों में बंद पड़े स्कूल, माओवादी संगठन में भर्ती हुई कम ?
छत्तीसगढ़ सरकार की जनहितैषी नीतियों और विकास कार्यों का ही यह परिणाम है कि बस्तर संभाग के 589 गांवों के पौने 6 लाख ग्रामीण, नक्सलियों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, जिसमें सर्वाधिक 121 गांव सुकमा जिले के हैं। दंतेवाड़ा जिले 118 गांव, बीजापुर जिले के 115 गांव, बस्तर के 63 गांव, कांकेर के 92 गांव, नारायणपुर के 48 गांव, कोण्डागांव के 32 गांव नक्सल प्रभाव से मुक्त हुए हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि नक्सल आतंक की वजह बस्तर संभाग में सालों से बंद 363 स्कूलों में से 257 स्कूल छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों के चलते फिर से बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए शुरू हो गए हैं, जिसमें से 158 स्कूल बीजापुर जिले के, 57 स्कूल सुकमा और दो कांकेर जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, बस्तर फाइटर्स और जिला पुलिस बल में भर्ती का अधिक अवसर मिलने से माओवादियों संगठनों की भर्ती में कमी आयी है। छत्तीसगढ़ सरकार का आधिकारिक कथन है कि बस्तर संभाग में माओवादी संगठन की गतिविधि दक्षिण बीजापुर, दक्षिण सुकमा, इन्द्रावती नेशनल पार्क का इलाका, अबूझमाड़ एवं कोयलीबेड़ा इलाके के केवल अंदरूनी हिस्से तक सिमट रह गई है।
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