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Chhattisgarh: बस्तर क्यों बना नक्सलियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना?, फोर्स के लिए क्या है चुनौती?

Chhattisgarh Naxalite: देश के एक हिस्से में पिछले 72 घंटों से चल रहे सबसे बड़े नक्सल अभियान में लगभग 3 हजार माओवादियों के फंसे होने की आशंका है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमा पर चल रहे इस ऑपरेशन से डर कर नक्सलियों ने एक बार फिर से शांति वार्ता के लिए कहा है।

सीआरपीएफ और तीन राज्यों की फोर्स के साथ लगभग 5 हजार जवानों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर-तेलांगना बॉर्डर पर चारो तरफ से घेराबंदी करके माओवादियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की जा रही है। मीडिया रिपोर्टस में ये ऑपरेशन ऑल ऑउट गृहमंत्री अमित शाह के 2026 तक नक्सलवाद को खत्म करने के संकल्प के रुप में देखा जा रहा है।

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सबसे बड़ा सवाल ये है कि छत्तीसगढ़ में ही नक्सली क्यों हैं? आखिर बस्तर कैसे बन गया लाल सलाम का गढ़? आईए इस आर्टिकल में इस पूरे मुद्दे को विस्तार से जानते हैं....

Chhattisgarh Naxalite: बस्तर कैसे बना नक्सलियों का गढ़?

  • क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति

करीब 39 हजार वर्ग किलोमीटर घने जंगलों में फैला और प्राकृतिक सुंदरता से भरा बस्तर एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है जो नक्सलियों के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 305 किमी दूर ये जिला कभी केरल राज्य से भी बड़ा हुआ करता था हालांकि जब नक्सली गतिविधियां बढ़ने लगी और प्रशासनिक समस्या सामने आई तो 1999 में इससे दो अलग जिले बने जिसे आज कांकेर और दंतेवाड़ा के नाम से जानते हैं।

राज्य की स्थिति पर पकड़े रखने वाले एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बस्तर के आधे से अधिक क्षेत्र में माओवादियों की मजबूत पकड़ है। अगर इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को समझा जाए तो यहां पर घने जंगलों के साथ-साथ खड़ी पहाड़ियां हैं जो इन लड़ाकों के रहने के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। इसके साथ ही कई राज्यों की सीमाएं मिलती हैं जो इनके भागने में मदद करती हैं।

इन लड़ाकों में स्थानीय आदिवासियों की उपस्थिति अधिक है जो इन इलाकों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं इससे नक्सलियों को इससे फायदा मिलता है। वो इन पहाड़ियों की चोटी या घने जंगलों में बंकर बना कर रहते हैं लेकिन यहां तक पुलिस या सेना की पहुंच आसान नहीं है।

  • आदिवासीयों की बहुलता, नक्सलियों के लिए वरदान

बस्तर में आदिवासियों की अधिक संख्या इन माओवादियों के लिए वरदान साबित होती है यही कारण है कि बस्तर इन माओवादियों के लिए सुविधाजनक एरिया है। विशेषज्ञों की मानें तो इन संगठनों में सबसे ज्यादा आदिवासी लड़ाके हैं जो पारंपरिक युद्ध प्रणाली के साथ-साथ पारंपरिक हथियार चलाने में भी महारथ रखते हैं।

आदिवासी गोरिल्ला युद्ध नीति में पारंगत होते हैं जो सैन्य जवानों पर भारी पड़ती है ये लोग जवानों के साथ लड़ने के लिए इन्हीं रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं। छत्तीसगढ़ में अब तक हुए नक्सली हमलों की पूरी स्ट्रैटजी को देखा जाए तो समझ आता है कि ये गोरिल्ला युद्ध को ही अपना हथियार बनाते हैं और एक ग्रुप में रहकर अटैक करते हैं।बस्तर घने जंगलों से भरा हुआ क्षेत्र है जहां पर घनी झाड़ियां हैं इनमें छुपकर हमला करना आसान है।

  • सरकार के प्रति स्थानिय लोगों की उदासिनता

दरअसल, माओवादी संगठनों के बड़े नेता आदिवासियों को अपने पाले में लाने के लिए भ्रष्टाचार और उनकी इस स्थिति के लिए सरकार और नेताओं को जिम्मेदार बताते हैं और उनका माइंडसेट बदलते हैं। इसके बाद उनको संगठन के दस्ते में शामिल किया जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वो (माओवादी) लोग हमें न्याय देते हैं जो हमें सरकार से नहीं मिलता है। हमारी जरूरतों को ध्यान में रखते हैं और मदद भी करते हैं। इन छोटी-छोटी चीजों को ध्यान में रख कर नक्सलवादियों ने गांव वालों को अपना विश्वासपात्र बना लिया है जिससे इनको रहने, छुपने या राशन पानी सभी तरह से फायद मिलता है।

Chhattisgarh Naxalite: सेंट्रल फोर्सेज की चुनौती

CRPF और कई केंद्रीय बल बस्तर के उन दुर्गम रास्तों से परिचित नहीं है। यहां की खड़ी पहाड़ियां और घने जंगल को जितनी अच्छी तरह से ये नक्सलवादी जानते हैं सैन्य जवानों को नहीं पता है ये इनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

इसके साथ ही केंद्रीय और स्थानीय पुलिस बल के बीच एक बातचीत की गैप नजर आती है। लोकल पुलिस क्षेत्र के भौगोलिक स्थिति और सड़कों से परिचित है लेकिन इनके बीच तालमेल की कमी है।

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