Jivardhan Chauhan Raigarh: बीजेपी ने चायवाले को बनाया महापौर प्रत्याशी,कहा-यूं ही नहीं हैं पार्टी विथ डिफरेंस
Raigarh BJP Jeevardhan Chauhan: छत्तीसगढ़ के नगर निकाय चुनावों में रायगढ़ महापौर पद के लिए भाजपा ने जीवर्धन चौहान को अपना प्रत्याशी घोषित कर एक बड़ा सियासी दांव खेला है। जीवर्धन चौहान पहले एक साधारण चायवाले थे, लेकिन अब महापौर पद की दौड़ में हैं। इस कदम के साथ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को सम्मान देती है और उन्हें ऊंचे पदों तक पहुंचा सकती है।
जीवर्धन चौहान का नाम भाजपा की ओर से महापौर प्रत्याशी के रूप में घोषित होने के बाद राजनीतिक हलचल का कारण बन गया है। माना जा रहा है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री बनने के सफर से भी जुड़ा हुआ है। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि "अगर एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, तो रायगढ़ के विकास की जिम्मेदारी भी एक चायवाले को सौंपी जा सकती है।"

भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर जताई ख़ुशी
जीवर्धन चौहान ने चाय बेचते बेचते भाजपा के लिए ढाई दशकों तक निष्ठापूर्वक कार्य किया है। इस फैसले के बाद भाजपा के प्रदेश वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने सोशल मीडिया पर जीवर्धन चौहान का चाय बनाते हुए एक वीडियो शेयर किया, जिसे देखकर यह फैसला चर्चा का विषय बन गया। इस वीडियो के साथ ओपी चौधरी ने लिखा, "चाय बेचने वाले, 29 साल से पार्टी के कार्यकर्ता श्री जीवर्धन चौहान को रायगढ़ महापौर प्रत्याशी बनाया।"
वहीं भाजपा नेता और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सलाहकार पंकज झा ने एक्स पर लिखा कि ये रायगढ़ के भावी महापौर श्री जीवर्धन चौहान हैं। भाजपा ने इन्हें 11 फरवरी को होने वाले निकाय चुनाव में रायगढ़ से महापौर का प्रत्याशी बनाया है। भाजपा को यूं ही लोग पार्टी विथ डिफरेंस थोड़े कहते हैं?
जीवर्धन चौहान बताया जीवन का सबसे बड़ा सम्मान
इधर जीवर्धन चौहान इस घोषणा के बाद भावुक हो गए और उन्होंने मीडिया से कहा, "यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है। पार्टी ने मुझ जैसे साधारण कार्यकर्ता पर जो भरोसा जताया है, मैं उसे कभी टूटने नहीं दूंगा। रायगढ़ के हर वर्ग के लिए समर्पित होकर काम करूंगा।"
हालांकि, भाजपा के इस निर्णय से कुछ अन्य नेताओं को झटका भी लगा है, जिन्होंने महापौर बनने का सपना देखा था। रायगढ़ की राजनीतिक गलियों में इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ लोग इसे राजनीति में बदलाव का प्रतीक मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे भाजपा की भावनात्मक राजनीति का हिस्सा बता रहे हैं।












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