बठिंडा में बहुकोणीय मुकाबले में फंसती नजर आ रहीं हरसिमरत कौर बादल

बठिंडा। पंजाब की सबसे चर्चित सीट बनी बठिंडा में बादल परिवार की बहू हरसिमरत कौर काफी ना-नुकुर के बाद एक बार फिर चुनावी मैदान में उतर गई हैं। हालांकि, कयास यह भी थे कि इस बार शायद ही हरसिमरत कौर यहां से चुनाव लड़ें, लेकिन उनके देवर पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल के चुनाव न लड़ने के ऐलान से बीबी को थोड़ी राहत मिली है, लेकिन उनके लिए इस बार का चुनाव आसान नजर नहीं आ रहा है। हालांकि, इस इलाके में अरसे से बादल परिवार का दबदबा रहा है।

बठिंडा में चुनावी मुकाबला हुआ रोचक

बठिंडा में चुनावी मुकाबला हुआ रोचक

चुनावी मैदान में मनप्रीत बादल के हटने के बाद कांग्रेस ने अमरिंद्र सिंह राजा वडिंग को उम्मीदवार बनाया है, जो साथ लगते गिद्दड़बाहा से विधायक हैं। वहीं, आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी प्रो. बलजिन्दर कौर जोकि तलवंडी साबो की विधायक हैं। आप के बागी व पंजाब डेमोक्रेटिक एलाइंस पार्टी के प्रत्याशी सुखपाल सिंह खैहरा के अलावा गुरसेवक सिंह ज्वाहरके चुनाव लड़ रहे हैं। खैहरा भुलत्थ के विधायक रहे हैं। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लिहाजा अब बठिंडा में चुनावी मुकाबला रोचक हो गया है।

बहुकोणीय मुकाबले में फंसती नजर आ रही हरसिमरत कौर

बहुकोणीय मुकाबले में फंसती नजर आ रही हरसिमरत कौर

बादल परिवार की बहू हरसिमरत कौर बादल यहां बहुकोणिय मुकाबले में फंसती नजर आ रही हैं। शिरोमणी अकाली में अब पहले जैसी बात नहीं उसका संगठन बिखर चुका है। लिहाजा उनकी राहें मुश्किल होती जा रही हैं। वहीं, कैप्टन पर भी कांग्रेस में दवाब बढ़ा है, जिससे न चाहते हुए भी उन्हें बठिंडा सीट पर अपनी ताकत लगानी पड़ेगी। यहां मौजूदा चुनावों में बीबी बादल को राजा वाडिंग के अलावा सुखपाल सिंह खैहरा से चुनौती मिल रही है। वहीं, बादलों के साथ सिद्धू परिवार की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। इसी के चलते नवजोत कौर सिद्धू ने बठिंडा में आकर कांग्रेस प्रत्याशी के हक में प्रचार करने का ऐलान किया है।

तीन दशकों से इस सीट पर है शिरोमणी अकाली दल का कब्जा

तीन दशकों से इस सीट पर है शिरोमणी अकाली दल का कब्जा

पिछले तीन दशकों से इस सीट पर शिरोमणी अकाली दल का कब्जा है व 28 सालों से कांग्रेस इस सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी है। 1991 के बाद हुए 6 चुनावों में पांच बार अकाली दल का उम्मीदवार इस सीट से जीत चुका है। सिर्फ 1999 में सीपीआई के भान सिंह भोरा ने यहां से चुनाव जीता था। राजनीतिक माहिरों का कहना है कि अकाली दल का गढ़ बन चुकी बठिंडा सीट को जीतना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। 1969 से अकाली दल का गढ़ बने गिद्दड़बाहा में राजा वडिंग ने कैसे सेंध लगाई इसका इतिहास बहुत रोचक है। राजा वडिंग ने गिद्दड़बाहा विधानसभा हलके से दो बार चुनाव लड़कर जीत हासिल की। श्री मुक्तसर साहिब से यूथ कांग्रेस प्रधान से लेकर यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रधान बने राजा वडिंग की शानदार कारगुजारी रही है। उनको टिकट दिलाने में राहुल गांधी के नजदीकी का हाथ है।

क्या कहता है इतिहास

क्या कहता है इतिहास

यह हलका 1967 में अस्तित्व में आया था, जहां प्रकाश सिंह बादल ने 57 वोटों पर हरचरन सिंह बराड़ से हारकर अपना सियासी जीवन शुरू किया। उसके बाद 1969, 1972, 1977, 1980 व 1985 में पहले प्रकाश सिंह बादल ने लगातार 5 बार जीत हासिल की व बाद में 1995, 1997, 2002 व 2007 में 4 बार मनप्रीत सिंह बादल ने जीत हासिल की, जिस कारण इस क्षेत्र को राजनीतिक माहिरों ने अकाली दल का गढ़ कह दिया था, लेकिन 2012 में कांग्रेस के राजा वडिंग ने पहली बार 33 साल की आयु में इस सीट से मनप्रीत सिंह बादल व अकाली टिकट पर लड़ रहे संत सिंह बराड़ को हराकर जीत हासिल की व 2017 में दूसरी बार जीत का परचम लहराया।

कब किसने मारी बाजी

कब किसने मारी बाजी

1996 में अकाली दल के हरिंदर सिंह खालसा जीते, 1998 में अकाली दल के चतिन सिंह समाओ जीते, 2004 में परमजीत कौर गुलशन जीतीं। वहीं, 2009 में व 2014 केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल जीतीं। पिछले चुनावों में यह सीट हरसिमरत कौर बादल ने मनप्रीत सिंह बादल से 19 हजार वोट के फर्क से जीती थी।

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