मिस्त्री और टाटा: दोस्ती से लेकर दुश्मनी तक की कहानी

सायरस को टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से हटाए जाने को भी टाटा परिवार का एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, जिससे मिस्त्री परिवार पर टाटा ग्रुप से बाहर जाने का दबाव डाला जा सके।

मुंबई। इन दिनों भले ही सायरस मिस्त्री और रतन टाटा के बीच जंग छिड़ी हुई है, लेकिन एक समय था जब मिस्त्री परिवार और टाटा परिवार बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे। 1936 में टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस में शापूरजी मिस्त्री ने स्टेक लिया था।

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बताया जाता है कि मिस्त्री के परिवार की टाटा संस में हिस्सेदारी और बोर्ड के सदस्यों में उनकी उपस्थिति टाटा परिवार को अच्छा नहीं लगता था। सायरस को टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से हटाए जाने को भी टाटा परिवार का एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, जिससे मिस्त्री परिवार पर टाटा ग्रुप से बाहर जाने का दबाव डाला जा सके।

इस समय टाटा संस में मिस्त्री परिवार की 18.5 फीसदी हिस्सेदारी है। टाटा संस करीब 100 अनलिस्टेड कंपनी और 30 लिस्टेड कंपनियों की होल्डिंग कंपनी है। सिर्फ लिस्टेड कंपनियों की कुल वैल्यू ही 8.3 लाख करोड़ रुपए है।

शापूरजी ने टाटा संस के शेयर प्रख्यात फाइनेंसर एफई दिनशॉ के वारिस से 1936 में लिए थे। इससे 7 साल पहले सायरस मिस्त्री के पिता का जन्म हुआ था। आपको बता दें कि दिनशॉ ने 1926 में टाटा की पावर यूनिट के लिए 1 करोड़ रुपए का उधार दिया था, लेकिन बाद में टाटा संस यह पैसे नहीं लौटा सका और फिर 12.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी से उधार लिए पैसों का समझौता किया गया।

बाद में शापूरजी ने जेआरडी टाटा के सिबलिंग (भाई-बहन) से कुछ और शेयर खरीद लिया, जिसके बादा टाटा संस में मिस्त्री परिवार की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 18.5 फीसदी हो गई।

जिस समय शापूरजी मिस्त्री ने टाटा संस की हिस्सेदारी ली, उस समय टाटा ग्रुप के चेयरमैन नौरोजी सक्लातवाला थे, जो 1932 से लेकर 1938 तक टाटा संस के चेयरमैन थे। नौरोजी के बाद उनकी जगह ली जेआरडी टाटा ने और वह इस बात से काफी नाराज थे कि टाटा परिवार में कोई गैर परिवार का व्यक्ति (शापूरजी) क्यों आ गया और नौरोजी ने ऐसा होने क्यों दिया।

मिस्त्री परिवार के पास टाटा संस की इस हिस्सेदारी के चलते उन्हें टाटा संस के बोर्ड में भी एक स्थान मिल गया। 1975 में शापूरजी की मौत के बाद सायरस मिस्त्री के पिता पलोंजी ने शापूरजी का स्थान लिया। पलोंजी के टाटा परिवार के साथ काफी अच्छे रिश्ते भी थे। साथ ही उन्होंने कभी टाटा संस के किसी काम में टांग नहीं अड़ाई।

2005 में पलोंजी हट गए और उनके बेटे सायरस मिस्त्री ने टाटा संस के बोर्ड में उनकी जगह ले ली। नवंबर 2011 में सायरस मिस्त्री को टाटा संस का चेयरमैन बना दिया गया, जो कंपनी का नेतृत्व करने वाले पहले ऐसे शख्स थे, जो टाटा परिवार से नहीं थे। 24 अक्टूबर को सायरस मिस्त्री को टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से हटा दिया गया।

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