विशेष बोले- जीएसटी का विरोध देश का दुर्भाग्य है

बेंगलुरु। देश की राजनीतिक गतिविध‍ियों को देखते हुए यह लगभग साफ है कि 1 अप्रैल 2016 तक जीएसटी का लागू होना असम्भव है। यह बात केंद्र के कई अध‍िकारी भी कह रहे हैं। कांग्रेस के विरोध से लेकर जमीनी स्तर तक इसके सामने चुनौतियों तक, इसके कई कारण हो सकते हैं।

जीएसटी रुकेगा या बढ़ेगा, यह राजनीतिक मुद्दा है, लेकिन इससे जुड़े तथ्य आपको जरूर जानने चाहिये, क्योंकि ये आपकी और हमारी लाइफ से सीधे जुड़ा है। जीएसटी से

जुड़े तथ्य इस प्राकर हैं-

  • केंद्र अगर जीएसटी लागू करती है, तो इसे राज्यों में क्रियान्व‍ित करने के लिये 50% से ज्यादा राज्यों को विधानसभाओं में कानून पास करना पड़ेगा।
  • बिहार में एनडीए की करारी हार के बाद विपक्ष इस बिल को राज्य सभा में पास नहीं होने देगा। और उसके लिये वो हर संभव प्रयास करेगा।
  • अगर सबकुछ सुगमता से चला, तो भी 2017 तक जीएसटी पूरी तरह से लागू नहीं हो पायेगा।
  • सेंट्रल एक्साइज और सर्विस टैक्स के नियमों को मिलाकर जीएसटी का नया नियम आयेगा।
  • इसे पास करने के लिये संविधान के किसी भी बिल में परिवर्तन की जरूरत नहीं है, क्योंकि राज्य इसमें शामिल नहीं हैं।

यदि केंद्र सरकार जीएसटी को पास कराने में सफल हो जाती है और एक या दो सालों तक नियमपूर्वक लागू हो गया, तो निश्च‍त रूप से राज्य भी इसे लागू करने के लिये प्रेरित होंगे। यह दुर्भाग्य है कि राजनीतिक दल जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण बिल पर राजनीति कर रहे हैं। अगर केंद्र सरकार जीएसटी के आर्थ‍िक लाभों को जनता और विपक्ष को समझाने में सफल हो जाये तो हो सकता है विरोधी दलों के नेता सरकार के पक्ष में आ जायें, लेकिन दुर्भाग्यवश इसे कोई समझना ही नहीं चाहता है।

सच पूछिए तो पहले केंद्रीय स्तर पर जीएसटी लागू कर देना चाहिये और उसके बाद राज्यों के सामने इसका विकल्प रखना चाहिये।

इस नियम के अंतर्गत मेन्युफेक्चरर और सर्विस प्रोवाइडर दोनों के लिये समान नियम लागू होगा। उत्पाद निर्यात करने वालों को सेवा नहीं मिलने पर त्वरित रीफंड होगा। सभी कुछ सरकार की निगरापनी में होगा इसलिये घपला होने की आशंका न्यूनतम होगी।

कुछ उत्पाद जैसे पैक्ड सॉफ्टवेयर, इस पर अभी सर्विस टैक्स और एक्साइज़ टैक्स दोनों लगता है। इस वजह से इनके दामों में भ‍िन्नता दिखाई देती है। जीएसटी के अंतर्गत आने से एक कर होगा, जो उस पर लगेगा। हां यह जरूर है कि जीएसटी के अंतर्गत उत्पादकों को स्वच्छ भारत सेस देना होगा।

वर्तमान नियमों के अंतर्गत सर्विस प्रोवाइडर और मैन्युफेक्चरर दोनों के साथ अलग-अलग प्रकार का व्यवहार होता है। जीएसटी के अंतर्गत सभी समान रूप से ट्रीट किये जायेंगे।

नोट- इस लेख में इनपुट एडवोकेट एस श‍िवाकुमार के अंग्रेजी में लेख से लिये गये हैं।

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