डॉलर के मुकाबले आखिर क्यों गिर रहा है रुपया, जानिए कैसे तय होता है इसका दाम
नई दिल्ली, 23 जुलाई। दुनियाभर में जिस तरह से महंगाई और मंदी की मार देखने को मिल रही है। दुनिया के कई देशों में आर्थिक संकट देखने को मिल रहा है। जिस तरह से रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई महीनों से युद्ध चल रहा है उसकी वजह से हालात काफी मुश्किल हो गए हैं, सप्लाई चेन में भी बाधा साफ तौर पर देखने को मिल रही है। वहीं कोरोना के चलते अभी भी कई देश आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। चीन सहित कई देश में अभी भी कोरोना को लेकर हालात सामान्य नहीं हुए हैं। ऐसे में इन तमाम वैश्विक घटनाक्रम का असर ना सिर्फ अन्य देशों में बल्कि भारत पर भी देखने को मिल रहा है। ऐसा पहली बार है जब डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपया 80 रुपए के आंकड़े तक पहुंच गया।
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रुपए का दाम
ऐसे में जिस तरह से रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर है उसको लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इन तमाम सवालों के जवाब हम इस लेख के जरिए देने की कोशिश करेंगे। सबसे पहला और अहम सवाल यह उठता है कि आखिर रुपए के रेट कैसे तय होते हैं, आखिर कौन है जो रुपए के दाम को तय करता है। इस सवाल की बात करें तो हमेशा से रुपए और डॉलर के बीच पहाड़ जैसा अंतर नहीं था। 1947 की बात करें तो उस वक्त एक डॉलर की कीमत 3.3 रुपए थी। 1985 में यह बढ़कर 12.38 के अंक तक पहुंच गया। 1995 में यह 32.42 पर पहुंच गया। वहीं 2011 में यह काफी हद तक बढ़कर 55.39 अंक पहुंच गया। लेकिन अब यह 79-80 रुपए के बीच ट्रेड कर रहा है।

कौन तय करता है दाम
हर किसी के दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर रुपए की कीमत को तय कौन करता है। इस सवाल का सीधा और आसान जवाब है कि रुपए के दाम को कोई नहीं तय करता है। बल्कि यह बाजार के उतार-चढ़ाव, देश का विदेशी मुद्रा भंडार, देश की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है आसान भाषा में बात करें तो रुपए की कीमत इसकी खरीद-फरोख्त पर निर्भर करती है। यानि रुपए की मांग जितनी अधिक होगी इसके दाम डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत उतने ही अधिक होंगे, जबकि अगर रुपए की मांग कम होगी तो डॉलर की तुलना में इसकी कीमत घटेगी।

कुछ इस तरह से तय होते हैं दाम
इसे आसान भाषा में समझे तो जब आप किसी दूसरे देश में घूमने के लिए जाते हैं तो आप रुपए देकर वहां की स्थानीय करेंसी को खरीदते हैं। ठीक ऐसे ही अगर भारत के उद्योग को दूसरे देश के कोई खरीद करनी है तो उसे यह खरीद रुपए में नहीं बल्कि डॉलर में करनी होती है। लिहाजा कंपनी-उद्योग को रुपए देकर डॉलर खरीदने पड़ते हैं। अगर भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है तो उसे भुगतान रूबल में करना होता है। जी हां पहले भारत को रूपए के बदले रूबल लेना होगा और इस रूबल से भारत कच्चा तेल खरीद सकता है। इसी तर्ज पर जब कोई विदेशी कंपनी भारत आती है या फिर वह अपना बिजनेस भारत में शुरू करती है तो उसे भी अपनी स्थानीय मुद्रा देकर रुपया खरीदना होता है। यही नहीं अगर कोई विदेशी कंपनी भारत में बिजनेस सेट करती है या फिर कर्मचारियों को नौकरी देती है तो उसे भुगतान रुपए में करना होता है।

आरबीआई की भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए देश के बैंक अपने पास विदेशी मुद्रा को रखते हैं, ताकि वह इसे दूसरी करेंसी से एक्सचेंज कर सके। हालांकि यहां यह ध्यान रखने वाली बात है कि बैंक कितनी विदेशी मुद्रा अपने पास रख सकता है इसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया तय करती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों के आधार पर भी बैंक अपने पास विदेशी मुद्रा रखते हैं, जिसके जरिए वह रुपए लेकर इसे देते हैं। ऐसे में अभी तक आपको यह स्पष्ट हो गया होगा कि जितना ही लोग विदेश घूमने जाते हैं, भारत दूसरे देशों से वस्तुओं का आयात करता है या फिर दूसरे देश में भारतीय वस्तुओं की मांग घटती है तो इसका सीधा असर भारतीय रुपए पर पड़ता है।

विदेशी कर्ज चुकाने का दम
इस पूरे तंत्र में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की भूमिका काफी अहम है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया देश की मौद्रिक नीति को तय करता है और यह सुनिश्चित करता है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहे, विदेश से भारत में निवेश हो। यही नहीं रिजर्व बैंक अपने पास खुद विदेशी मुद्रा भंडार को रखता है, जिससे की भारत अपने कर्ज को जब चाहे पूरी तरह से चुका सके। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विदेशी कंपनियो के उधार को चुकाने के लिए रिजर्व बैंक अपने पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार रखता है ताकि यह भरोसा बना रहे कि भारत इनके कर्ज को चुका सकता है। इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर है।

रुपए को संभालने के लिए जरूरी कदम
जब रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले काफी गिरने लगती है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कई अहम कदम उठाता है, अनपी नीतियों में बदलाव करता है जिससे कि डॉलर की मांग को कम किया जा सके। आरबीआई कुछ डॉलर को अपने मुद्रा कोष से निकालकर बेच सकती है। आयात को मुश्किल करने के लिए नियमों को सख्त किया जा सकता है, जिससे डॉलर की मांग कम होती है। ऐसा होने पर आई फोन और अन्य विदेशी सामानों के दाम बढ़ जाते हैं। भारतीय सामानों को विदेशी ग्राहक अधिक खरीदें इसके लिए कुछ बदलाव किए जा सकते हैं, जिससे डॉलर का भंडार बढ़े। ऐसे ही कई और कदम रिजर्व बैंक डॉलर की मांग को देश में कम करने के लिए उठा सकती है, साथ ही भारत में डॉलर और आए उसे बढ़ावा दे सकती है।

क्यों गिर रहा रुपया
रुपए की गिरती कीमतों की बात करें तो इसकी तीन मुख्य बड़ी वजहे हैं, पहली यह कि लोग बड़ी मात्रा में डॉलर को खरीद रहे हैं, दूसरी यह कि तेल की कीमतों में काफी इजाफा हो रहा है और तीसरी है करेंट अकाउंट डेफिसिट। यानि आयात और निर्यात में अंतर काफी बढ़ रहा है। पिछले साल की बात करें तो कई बड़े-बड़े आईपीओ देश में लॉन्च हुए और कई विदेशी निवेशकों ने इसमे निवेश किया, लेकिन अब जब भारत का बाजार गिर रहा है तो विदेशी निवेशक अपना निवेश लेकर वापस जा रहे हैं।

आरबीआई के सामने मुश्किल चुनौती
रिजर्व बैंक भारतीय रुपए को बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को बेच रहा है, लिक्विडिटी को घटाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी कर रहा है। लेकिन आरबीआई के सामने मुश्किल चुनौती यह है कि वह इन कदमों को लंबे समय तक नहीं बरकरार रख सकती है क्योंकि इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा कम होगी। करेंसी को मैनेज करना एक चुनौतीपर्ण कार्य है, लिहाजा भारतीय रिजर्व बैंक संतुलन बनाए रखने की हर संभव कोशिश में जुटा है।












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