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सिगरेट छोड़ना क्यों है मुश्किल- दुनिया जहान

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रोज अमेरिकी राज्य टेक्सस के एक छोटे से शहर में बड़ी हुईं. वो जब सिर्फ़ 13 साल की थीं, तभी से स्मोकिंग करने लगीं.

रोज बताती हैं कि उनकी मां बेहद सख्ती के साथ कहती थीं कि वो धूम्रपान न करें. लेकिन लत थी कि छूटती नहीं. वो अपने पिता की सिगरेट चोरी कर लेतीं और स्कूल में लंच के लिए मिलने वाले पैसे भी इसी पर खर्च कर देतीं.

अगले 45 साल तक हर दिन वो करीब दो पैकेट सिगरेट फूंकती रहीं. फिर एक दिन उन्हें पैरों में दिक्कत महसूस हुई. डॉक्टर ने बताया कि ये धूम्रपान से जुड़ी समस्या है और अगर स्मोकिंग बंद न की तो उन्हें अपना पैर गंवाना पड़ सकता है.

उन्होंने सिगरेट छोड़ दी लेकिन तभी डॉक्टरों ने पाया कि उन्हें फेफड़े का कैंसर है. उन्हें कीमोथैरेपी लेनी पड़ी. फिर सर्जरी हुई. उसके बाद उनके दिमाग में दो ट्यूमर का पता चला.

https://www.youtube.com/watch?v=nO5xvrHVpc8

कई लोगों को लगता है कि उन्हें कैंसर नहीं हो सकता. कैंसर से जूझती रोज की ऐसे लोगों को सलाह थी कि वो उनकी तरफ देखें.

फिर एक दिन रोज की मौत हो गई. तब उनकी उम्र थी साठ साल.

स्मोकिंग करने वाले भी ऐसी कई भयावह कहानियां सुनते हैं. उन्हें स्मोकिंग के तमाम ख़तरों की जानकारी भी होती है. सरकारें और संगठन धूम्रपान रोकने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाते हैं लेकिन इसके बावजूद दुनिया भर में करीब एक अरब लोग धूम्रपान करते हैं.

हर साल करीब 60 लाख लोग धूम्रपान से जुड़ी बीमारियों के कारण जान गंवा देते हैं. अनुमान है कि साल 2030 तक धूम्रपान की वजह से सालाना 80 लाख लोगों की मौत हो सकती है. फिर भी लोग स्मोकिंग छोड़ नहीं पाते.

लेकिन क्यों? आखिर लोग सिगरेट छोड़ क्यों नहीं पाते, इस सवाल का जवाब पाने के लिए बीबीसी ने चार एक्सपर्ट से बात की.

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धूम्रपान की लत

हेल्थ साइकोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर रॉबर्ट वेस्ट बताते हैं, " मैं धूम्रपान का सख्त विरोधी था फिर एक दिन मैंने स्मोकिंग शुरू कर दी."

प्रोफ़ेसर रॉबर्ट ने एक किताब लिखी है 'द स्मोक फ्री फॉर्मूला'. वो बताते हैं कि अपनी एक गर्लफ्रेंड के कहने पर उन्होंने धूम्रपान से तौबा कर ली.

गर्लफ्रैंड के साथ रिश्ता 30 साल बाद टूट गया लेकिन ये समझने की कोशिश बंद नहीं हुई कि आखिर लोग धूम्रपान क्यों करते हैं?

उनके मुताबिक़ इसका जवाब तंबाकू की पत्ती में मौजूद निकोटिन में है. सिगरेट जलाते ही ये रसायन बाहर आ जाता है.

प्रोफ़ेसर रॉबर्ट बताते हैं, "जब आप सिगरेट का धुंआ अंदर ले जाते हैं तब निकोटिन बड़ी तेज़ी के साथ फेफड़े के किनारों में समा जाता है और कुछ ही सेकेंड में सीधे दिमाग तक पहुंच जाता है. वहां इसका संपर्क नर्व सेल यानी तंत्रिका की कोशिका से होता है और इसके असर से डोपमीन नाम का रसायन बाहर आता है."

और ये दिमाग को संकेत देता है कि कुछ अच्छा करने की वजह से आपको 'रिवार्ड' मिलने वाला है. रॉबर्ट कहते हैं कि आपको भले ही इसका अंदाज़ा न हो लेकिन दिमाग आपसे ये दोबारा करने को कहता है.

वो कहते हैं कि इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जिस जगह आपने पहली बार सिगरेट जलाई हो मसलन अपने ऑफ़िस के बाहर, पान की दुकान पर या फिर किसी बार में और अगर आप दोबारा वहां पहुंचते हैं तो दिमाग को लगता है कि उसे वही 'ख़ास चीज' मिलने वाली है.

रॉबर्ट कहते हैं कि उन स्थितियों और धूम्रपान की ज़रूरत के बीच एक कड़ी सी बन जाती है और ये आपको खींचती रहती है.

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निकोटिन की लत की पकड़ कितनी मजबूत होती है, रॉबर्ट यही जानना चाहते थे.

उन्होंने एक ऐसे समूह पर अध्ययन किया जिन्हें बेतहाशा धूम्रपान करने की वजह से गले का कैंसर हो गया था. उन सभी की कंठ नली को काटकर निकालना पड़ा था.

रॉबर्ट बताते हैं, " कंठ में जो छेद किए गए थे, वो उनके जरिए ही सांस लेते हैं. ऑपरेशन के बाद उनमें से कई लोग दोबारा धूम्रपान करना चाहते थे. अब वो धुआं अंदर नहीं ले जा सकते. क्योंकि अब उनका मुंह फेफड़े से जुड़ा हुआ नहीं है. ऐसे में कई लोग कंठ में बनाए गए छेद के ज़रिए धूम्रपान करते हैं. ये स्थिति बहुत सुखद नहीं होती. उन्हें दिक्कत भी होती है लेकिन इससे पता लगता है कि धूम्रपान करने वाले निकोटिन की तलब मिटाना चाहते हैं."

रॉबर्ट वेस्ट कहते हैं कि सिगरेट में मौजूद निकोटिन की लत बहुत हद तक हेरोइन, कोकीन या फिर अफीम जैसी किसी दूसरी ड्रग की लत की तरह होती है.

वो कहते हैं कि दिमाग के जिस हिस्से को 'एनिमल पार्ट' कहा जाता है, उसी के जरिए निकोटिन की लत पर काबू पाया जा सकता है. राबर्ट कहते हैं कि सिगरेट की तलब पर काबू पाना किसी जंग की तरह है.

रॉबर्ट बताते हैं, "ड्रग्स एनिमल ब्रेन को उकसाती है और दिमाग का ये हिस्सा कहता है, तलब मिटाओ. दिमाग का दूसरा हिस्सा कहता है, ये बेवकूफी है. मैं ऐसा क्यों कर रहा हूं? लत की गिरफ़्त में जकड़े लोग हर दिन इस संघर्ष से जूझते हैं."

रॉबर्ट बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति को इससे प्रतिरक्षा हासिल नहीं है.

वो बताते हैं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा कई दशक तक धूम्रपान करते रहे. बाद में उन्होंने 'निकोटिन रिप्लसमेंट थेरैपी' ली.

इस लत का इससे कोई मतलब नहीं है कि आप कितने बुद्धिमान हैं. अहम सिर्फ ये है कि आपका दिमाग निकोटिन को लेकर किस तरह की प्रतिक्रिया देता है.

रॉबर्ट कहते हैं कि अनुवांशिक तौर पर भी आपके इस लत की चपेट में आने की संभावना रहती है. जो जीन जो आपको गढ़ते हैं, वो ही आपको निकोटिन की लत की ओर ले जा सकते हैं. लेकिन हर मामले में ऐसा हो ये ज़रूरी नहीं है.

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बाज़ार का वार

बायोकेमिस्ट डॉक्टर जेफ़री वायगैंड बताते हैं, "मैंने जो देखा वो अनैतिक, ग़ैर क़ानूनी और नियम के ख़िलाफ़ था. ये उनकी मार्केटिंग और उत्पाद को लेकर लोगों के बीच किए गए रिसर्च को लेकर कह रहा हूं."

डॉक्टर जेफ़री वायगैंड साल 1994 में 'व्हिसिल ब्लोअर' के तौर पर सामने आए. उन्होंने तंबाकू की बड़ी कंपनियों के झूठ को बेपर्दा किया. हॉलीवुड ने इस कहानी पर एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम है 'इनसाइडर'.

डॉक्टर जेफ़री की कहानी की शुरुआत 1988 में अमेरिकी राज्य केंटकी के लुइविल से हुई. ज़ेफरी को ब्राउन एंड विलियम्सन तंबाकू कंपनी में लाखों डॉलर के वेतन के साथ आला अधिकारी का पद मिला.

वो बायोकेमिस्ट थे और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर चुके थे. उन्हें धूम्रपान के ख़तरों को लेकर कंपनी का रुख भ्रम में डालने वाला लगा और वो इसे लेकर सवाल पूछने लगे.

जेफ़री बताते हैं कि कंपनी के अंदर ये समझ साफ़ थी कि उनका 'प्रोडक्ट' इस्तेमाल करने वालों और उनके इर्द गिर्द बने रहने वालों की जान ले सकता है. इसकी लत भी लग सकती है. लेकिन बाहरी दुनिया को कंपनी एक अलग कहानी सुना रही थी.

डॉक्टर जेफ़री बताते हैं कि कंपनी बाहर की दुनिया से कहती रही, "ये उत्पाद सुरक्षित है. इससे कोई नुक़सान नहीं होता और अगर आप इसका इस्तेमाल करते हैं तो अपनी आज़ाद ख्याली से करते हैं."

जेफ़री पांच साल तक सवाल पूछते रहे और रहस्य की परत दर परत उतारते रहे. फिर एक दिन उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और चुप रहने की हिदायत दी गई.

इसके एक साल बाद यानी 1994 में जेफ़री के पूर्व बॉस समेत दुनिया की सात बड़ी तंबाकू कंपनियों के सीईओ ने सच बताने की कसम ली और अमेरिकी कांग्रेस के सामने साफ़ झूठ बोला. और यही बात खेल बदलने वाली साबित हुई. जेफ़री ने दुनिया को सच बताने का फ़ैसला किया.

वो बताते हैं, " मुझे व्हिसिल ब्लोअर कहा गया. उसके बाद तमाम मुश्किलें शुरू हो गईं. मेल के जरिए दो बार मेरे बच्चों को मारने की धमकी मिली. मेरे घर के बाहर मीडिया का जमघट लग गया. दो हथियारबंद पूर्व सीक्रेट एजेंट 24 घंटे हमारी सुरक्षा में तैनात रहते."

ये भले ही कभी साबित नहीं हुआ लेकिन जेफ़री मानते रहे कि उन्हें मिली धमकियों के पीछे 'ब्राउन एंड विलियम्सन' है. लेकिन, इसके बाद तंबाकू की बड़ी कंपनियां इस बात से इनकार नहीं कर सकीं कि निकोटिन की लत लग सकती है और ये इंसानी शरीर को नुक़सान पहुंचा सकता है.

इसके बाद कुछ देशों ने लोगों को धूम्रपान से दूर रखने के लिए दूरगामी उपाय किए. इनमें सिगरेट पैकेट की पैकिंग में बदलाव, सार्वजनिक जगहों और कार्यस्थलों पर धूम्रपान करने पर पाबंदी और टैक्स लगाकर कीमतें कई गुना बढ़ाना शामिल है.

जेफ़री दावा करते हैं कि अमेरिका और यूरोप के देशों में नियम बदले गए तो तंबाकू कंपनियों ने अपना फोकस दूसरे देशों की तरफ कर दिया.

जेफ़री कहते हैं, " तंबाकू कंपनियों को मुनाफा बनाए रखने का ज़रिया तलाशना था. तो उन्होंने पुराने तरीके आज़माना शुरू कर दिया. उन्होंने विकासशील देशों या फिर ऐसे देशों का रुख किया जहां नियम उतने सख़्त नहीं थे, जहां के लोग अपेक्षाकृत कम पढ़े लिखे और ग़रीब हों और उन्होंने वहां तंबाकू उत्पादों की मार्केटिंग शुरू कर दी."

जेफ़री कहते हैं कि तंबाकू उद्योग से जुड़ी कंपनियों को अपने उत्पाद बेचने से जो पैसा मिलता है, उससे वो उन्हीं उत्पादों की मार्केटिंग करते हैं, ये जानते हुए भी कि ये प्रोडक्ट लोगों की जान ले सकते हैं.

हालांकि, तंबाकू कंपनियां ये दलील देती हैं कि वो किसी पर धूम्रपान के लिए दबाव नहीं डालती हैं. शायद ये सही भी हैं. ऐसे में सवाल है कि लोग धूम्रपान शुरू क्यों करते हैं, जवाब जानते हैं अगले एक्सपर्ट से.

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अजब सा नशा

हेल्थ साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर इल्डिको टोम्बोर कहती हैं, "मेरी मां बहुत ज़्यादा धूम्रपान करती थीं. जब मैं बच्ची थी तब सिगरेट के धुएं से घिरी रहती थी."

डॉक्टर इल्डिको बताती हैं कि उनकी मां गर्भवती हुईं तो उन्होंने सिगरेट छोड़ दी लेकिन दूध पिलाना बंद करते ही वो दोबारा स्मोकिंग करने लगीं.

इल्डिको ने पहली केस स्टडी अपनी मां पर ही की. उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि लोगों की अपनी बारे में जो राय होती है, वो उनके बर्ताव को प्रभावित करती है.

वो कहती हैं, "पहचान की प्रेरक शक्ति जबरदस्त होती है. ये बर्ताव तय करती है. कई तरह के बर्ताव, चाहे धूम्रपान करना हो, शराब पीना हो, कसरत करना हो या फिर किसी खास ब्रांड का सामान या उपकरण खरीदना हो."

ये खुद की पहचान बनाने की तरह है. वो पहचान जो किसी ख़ास समूह या जाति से जुड़ी हो और आप ये तय कर रहे हों कि हर किसी को इसके बारे में जानकारी है.

डॉक्टर इल्डिको कहती हैं, "कई बार पहचान साफ़ तौर पर जाहिर होती है. जब आप किसी यूनिवर्सिटी की पोशाक पहनते हैं या फिर अपने पसंदीदा फुटबॉल क्लब की जर्सी पहनते हैं, तब इसके मायने होते हैं कि आप उस ख़ास समाजिक समूह का हिस्सा हैं. कई बार ये आपके लिए बहुत अहम होता है."

कोई समूह जितना ख़ास होगा, उसमें दाखिल होने की ख्वाहिश उतनी ही ज्यादा होगी. ख़ास होने की पहचान बनाए रखने के लिए नए लोगों को ऐसा कुछ करना होता है जिससे उनकी प्रतिबद्धता जाहिर हो सके.

डॉक्टर इल्डिको कहती हैं कि धूम्रपान करने वाले ज़्यादातर लोग 26 साल की उम्र के पहले ही स्मोकिंग शुरू कर देते हैं. किसी किशोर के लिए किसी 'कूल ग्रुप' में जगह बनाना बहुत अहम होता है.

डॉक्टर इल्डिको कहती हैं कि धूम्रपान एक 'सोशल पासपोर्ट' की तरह है. उन्हें रिसर्च से जानकारी हुई कि जो लोग धूम्रपान को अच्छी नज़र से देखते हैं, उन्हें लगता है कि इसका फ़ायदा सामाजिक तौर पर और करियर की तरक्की में मिलता है. ऐसे लोगों के लिए इसे छोड़ना बहुत मुश्किल होता है.

वो बताती हैं, "हमने धूम्रपान करने वाले लोगों से पूछा कि उन्हें धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के तौर पर अपनी पहचान पसंद है या नहीं. 18 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें ये पसंद है. ऐसे लोगों से छह महीने बाद दोबारा संपर्क किया गया तब जानकारी हुई कि उनमें से कम ही लोगों ने इस दौरान सिगरेट छोड़ने की कोशिश की थी. इससे पता चलता है कि जो इस छवि को अच्छा मानते हैं,उनके लिए ये सोच सिगरेट छोड़ने के रास्ते में बड़े अवरोध की तरह है."

सब जानते हैं कि धूम्रपान करने में खतरे हैं और इससे आपकी जान भी जा सकती है. लेकिन सभी लोग जोखिम को एक ही तरह से नहीं देखते हैं.

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दांव पर जान

शोधकर्ता कार्ल लेज़वे बताते हैं, "मैं नौकरीपेशा परिवार से आता हूं. जब मैं 14 साल का था तब मेरे पिता की मौत हो गई. परिवार की ज़िम्मेदारी मेरी मां पर आ गई. हम न्यूजर्सी के साधारण से कस्बे में रहते थे."

कार्ल लेज़वे ने ऐसे लोगों पर अध्ययन किया है, जिन्हें धूम्रपान की लत है. वो और उनकी टीम धूम्रपान करने वाले ऐसे लोगों में दिलचस्पी लेते थे जो नतीजे जानते हुए भी स्वास्थ्य को जोखिम में डालने को तैयार थे.

कार्ल लेज़वे बताते हैं, "हमने एक गेम बनाया. ये कंप्यूटर से तैयार बैलून पर आधारित था. इसमें बैलून फुलाने पर पैसे दिए जाते थे. आप जितना बड़ा बैलून फुलाते, उतना ज़्यादा पैसे जीत सकते थे. लेकिन एक जगह आकर ये बैलून फट सकता था."

कार्ल की टीम ने पाया कि धूम्रपान नहीं करने वालों की तुलना में स्मोकिंग करने वाले लोग बैलून को ज़्यादा बड़ा फुलाते थे. कार्ल कहते हैं कि इस प्रयोग से सिर्फ़ ये साबित नहीं हुआ कि धूम्रपान करने वाले जोखिम लेते हैं बल्कि ये भी पता चला कि वो किस हद तक जा सकते हैं.

कार्ल इसकी तुलना बंजी जंपिंग के साथ करते हैं. वहां जब आप किसी ब्रिज से छलांग लगाते हैं तब जो चीज आपको ज़मीन से टकराने से रोकती है वो है आपके जिस्म से बंधा रबरबैंड. अगर वो टूटा तो खेल ख़त्म.

स्मोकिंग के मामले में एक आशंका रहती है कि आगे जाकर आपको ऐसी बीमारी हो सकती है जो जान भी ले सकती है लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है.

वो कहते हैं कि ये समझना भी ज़रूरी है कि धूम्रपान करने वाले अपनी भावनाओं पर कैसे काबू पाते हैं. ख़ासकर तनाव के दौरान.

कार्ल कहते हैं, "अगर मेरी मां की कहानी पर वापस आएं तो उन्होंने परिवार की मदद के लिए हाई स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी. ताउम्र उनके कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ रहा. मैंने उनके धूम्रपान करने को लेकर जो बात नोटिस की वो ये थी कि उनके लिए ये ब्रेक की तरह था. तब जो कुछ हो रहा था, वो उसके बारे में नहीं सोच रही होती थीं."

कार्ल कहते हैं कि उनकी मां की तरह के लोग जिन्हें दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वो हर दिन कई चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं. वो कहते हैं कि ऐसे लोगों को कमज़ोर इच्छा शक्ति वाला बताना ठीक नहीं होगा. कार्ल कहते हैं कि ऐसे लोगों की स्थिति का अंदाज़ा वो लोग नहीं लगा सकते हैं जो उसी तरह की आर्थिक दिक्कतों का सामना नहीं कर रहे हैं.

लेकिन धूम्रपान से मिलने वाली खुशी या सुकून जोखिम के बोझ को हर बार कुछ और बढ़ा देता है. कार्ल की मां को अब इसका अहसास हो चुका है.

कार्ल बताते हैं, "करीब तीन साल पहले मेरी मां को फेफड़े का कैंसर होने की जानकारी मिली. वो ठीक हो गईं. फिर उन्हें ब्रेन कैंसर हुआ. ये एक ऐसा दर्द है जिसे मैं निजी तौर पर महसूस कर सकता हूं."

लौटते हैं उसी सवाल पर कि आखिर कि आखिर लोग सिगरेट छोड़ते क्यों नहीं हैं?

हमारे एक्सपर्ट की राय है कि कुछ लोगों के लिए ये जीवन के तनाव से निपटने का तरीका है. कुछ लोगों के लिए ये अपनी पहचान जाहिर करने का जरिया है. हमने ये भी समझा कि कुछ लोग निकोटिन की लत के प्रति अनुवांशिक तौर पर ज़्यादा संवेदनशील होते हैं. वो और तमाम दूसरे लोग तंबाकू बेचने वाली बड़ी कंपनियों के निशाने पर भी रहते हैं.

और सबसे अहम वजह ये है कि धूम्रपान करने वालों को निकोटिन की लत लग जाती है. और इस लत की गिरफ़्त शायद हेरोइन से भी ज़्यादा होती है.

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