जब खाया नहीं जाता, तो इतना तीखा खाते क्यों हैं हम?
पिछले साल एक अमरीकी अस्पताल के इमरजेंसी रूम में एक व्यक्ति को भर्ती कराया गया. डॉक्टर ये पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि उसे आख़िर हुआ क्या है. वो व्यक्ति तेज़ सर दर्द, गर्दन में दर्द से तड़प रहा था और उसे बार-बार उल्टी आ रही थी.
सीटी स्कैन, पेशाब की जांच, ब्लड प्रेशर जांच और शारीरिक जांच करने के बाद डॉक्टरों को पता चला कि उस व्यक्ति पर ज़हर का असर नहीं था और ना ही उसे कोई रहस्यमयी बीमारी थी, बल्कि उसने एक बहुत ही तीखी मिर्ची खा ली थी.
मिर्ची की जो किस्म उन्होंने खाई थी, उसका नाम है "कैरोलिना रीपर" (ये जेलापीनो पेपर से 275 गुना ज़्यादा तीखी है). 34 साल के इस शख़्स ने एक प्रतियोगिता में ये मिर्च खाने का फ़ैसला किया था.
ये मिर्च खाने की वजह से उनके दिमाग़ की धमनियां सिकुड़ने लगी थीं, लेकिन क़िस्मत से वो बच गए और बाद में पूरी तरह ठीक हो गए.
ये तो एक बड़ा उदाहरण हो गया, लेकिन लाखों बल्कि शायद करोड़ों लोग तीखा खाना खाते हैं, जिसकी वजह से उनकी जीभ जलने लगती है और उस खाने को खाते ही वो पानी मांगने लगते हैं. कई बार तो उनका पेट भी ख़राब हो जाता है. जब तीखा खाने से इतनी परेशानी होती है तो वो खाते क्यों हैं?
मिर्च से लोगों का ये प्यार हज़ारों साल पुराना है और ये कम होता नहीं दिख रहा. वर्ष 2017 और 2018 के बीच दुनियाभर में हरी मिर्च का उत्पादन 27 मिलियन से बढ़कर 37 मिलियन हो गया है.
मार्केट एनालिसिस फर्म इंडेक्स बॉक्स के आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल औसतन हर व्यक्ति ने क़रीब पांच किलो मिर्ची खाई.
कुछ देशों में तो और ज़्यादा मिर्च खाई जाती है.
तुर्की में एक दिन में एक शख़्स औसतन 86.5 ग्राम मिर्च खाता है. यानी पूरी दुनिया में यहां सबसे ज़्यादा मिर्च खाई जाती है.
यहां मेक्सिको से भी कहीं ज़्यादा मिर्च खाई जाती है, जो अपने मसालेदार खाने के लिए लोकप्रिय है. मेक्सिको में एक शख़्स एक दिन में औसतन 50.95 ग्राम मिर्च खाता है.
तो हमें इतनी मिर्च खाना पसंद क्यों है?
रोमांच तलाशने की चाहत और मिर्ची में केमिकल के टेस्ट की बढ़ती इच्छाओं के बीच झूलती ये एक जटिल कहानी है.
प्रकृति का रहस्य
वक्त के साथ मिर्च के भीतर कैप्सासिन नाम का एक केमिकल आया, जो इसके तीखेपन का कारण है. हालांकि इस पर विवाद अभी थमा नहीं है.
वौज्ञानिक मानते हैं कि इस पौधे में ये तीखा केमिकल इस कारण बना, ताकि जानवर या कीड़े-मकोड़े इसे खा ना लें.
लेकिन पक्षियों को इसे खाने में कोई दिक्कत नहीं होती.
अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना ने पता लगाया कि मिर्च के पौधों के लिए ये कैसे फायदेमंद होता है.
स्तनधारी जानवरों के पाचन तंत्र में मिर्च के बीज टूट जाते हैं और वो फिर से अंकुरित नहीं हो पाते.
लेकिन पक्षियों के साथ ऐसा नहीं है. वो पूरा बीज निगल लेते हैं और फिर उनके मल से जब वो बीज निकलता है तो नया पौधा उग जाता है.
लेकिन अगर मिर्च का तीखापन स्तनधारी जानवरों को उसे खाने से रोकता है तो इंसान कैसे मिर्च खा लेता है?
एक थ्योरी ये है कि इंसान मसालेदार खाना इसलिए खाता है क्योंकि उसमें एंटी फंगल और एंटी बैक्टीरियल प्रोपर्टीज़ होती हैं.
लोगों को इस बात का अहसास हुआ कि जो खाना स्वाद में मसालेदार होता है, उसके सड़ने की संभावना कम होगी.
ये परिकल्पना कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी जेनिफर बिलिंग और पॉल डब्ल्यू. शेरमन ने 1998 में सामने रखी थी.
उन्होंने 36 देशों में मीट के हज़ारों पारंपरिक व्यंजनों को बनाने के तरीके ध्यान से देखे. जिसमें उन्होंने पाया कि गर्म इलाकों में मसालों का अक्सर इस्तेमाल होता है, क्योंकि गर्म जगहों पर खाना ख़राब होने का ख़तरा रहता है.
उन्होंने पाया, "गर्म देशों में क़रीब-क़रीब हर मीट के व्यंजन में कम से कम एक मसाला डलता है, और ज़्यादातर में कई सारे मसाले. वहीं ठंडे देशों में व्यंजनों में कम मसाले डाले जाते हैं."
थाइलैंड, फिलीपींस, भारत और मलेशिया मिर्च का इस्तेमाल करने में सबसे आगे हैं. वहीं स्वीडन, फिनलैंड और नॉर्वे जेसे देशों में मिर्च का सबसे कम इस्तेमाल किया जाता है.
शेरमन कहते हैं, "खाने के साथ हम जो भी करते हैं, उसे सुखाना, नमक लगाना या उसमें मसाले मिलाना- ये करके हम खाने को कीटाणुओं से बचाने की कोशिश करते हैं. क्योंकि कीटाणु भी उसी खाने को खाने की कोशिश करते हैं. ऐसा करके हम खुद को फूड पॉइजनिंग से बचाते हैं."
स्वाद का ज़रिया?
फूड एंथ्रोपोलॉजिस्ट काओरी कोनोर इसका एक और कारण बताती हैं.
वो बताती हैं कि गन्ने और आलू की तरह सदियों तक यूरोप में मिर्च के बारे में भी कोई नहीं जानता था. लेकिन जब यूरोप के लोग अमरीका पहुंचे और व्यापार के रास्ते खोलने लगे तो वो दुनियाभर में फैल गई.
वो बताती हैं, "यूरोप के लोगों ने मिर्च को दुनिया भर में फैलाया."
"भारत, चीन और थाइलैंड समेत कई देशों में लोगों ने मिर्च के इस अलग से स्वाद को अपने व्यंजनों में आज़माना शुरू किया."
"उस वक्त यूरोप में खाना बेस्वाद हुआ करता था. फिर चीनी की तरह ही मिर्च ने भी उनके खाने के स्वाद को बेहतर किया."
स्वाद का रोमांच और पेट दर्द
हालांकि मिर्च और मसालेदार खाने से प्यार की वजह से हमारे लिए मुश्किलें भी पैदा हुईं.
यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया में मनोविज्ञान के प्रोफेसर पॉल रोज़िन ने एक अध्ययन करने का सोचा. उन्हें लगा कि ज़्यादातर स्तनधारी तो मिर्च नहीं खाते हैं.
उन्होंने लोगों को तीखी से तीखी मिर्च दी, ये देखने के लिए कि वो कबतक इसे सहन कर पाते हैं.
लोगों को पूछा गया कि उन्हें सबसे ज़्यादा अच्छा कौन-सी मिर्च खाकर लगा, तो उन्होंने कहा कि जो सबसे तीखी मिर्च थी, वो उन्हें अच्छी लगी.
रोज़िन कहते हैं, "इंसान ही अकेली ऐसी प्रजाति है, जिसे नकारात्मक घटनाओं में भी रोमांच आता है."
"कभी कभी हमारा शरीर ख़तरे में होता है, लेकिन हमारा दिमाग़ कहता है कि सब ठीक है."
ऐसा लगता है कि जैसे हमें भूतिया फिल्में देखने में मज़ा आता है, वैसे ही हमें तीखी मिर्च खाने में भी आनंद मिलता है.
लेकिन कुछ लोगों को दूसरे लोगों से ज़्यादा मिर्च खाना क्यों पसंद होता है.
फूड साइंटिस्ट नादिया बायरेंस ने ये समझने की कोशिश की कि क्या पुरुषों या महिलाओं में तीखा खाना खाने की आदतें अलग-अलग हैं.
उन्होंने पाया कि मेक्सिको में मिर्च खाने को ताक़त, हिम्मत और मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है.
उन्होंने देखा कि पुरुष ये दिखाना चाहते हैं कि वो ज़्यादा तीखी मिर्च खा सकते हैं, वहीं महिलाएं खुद उस तीखेपन को महसूस करना चाहती थीं.
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