जोशीमठ में ज़मीन धंसने के लिए क्या ये प्रोजेक्ट ज़िम्मेदार है


  • स्थानीय लोगों का दावा, इलाक़े में खोदी जा रही सुरंग से दरक रहा है पहाड़
  • 12 किलोमीटर लंबी सुरंग, नदी से पानी टरबाइन तक ले जाएगी
  • परियोजना पर काम करने वाली कंपनी एनटीपीसी ने टनल की वजह से धसान का किया खंडन
  • जानकारों के मुताबिक जोशीमठ ढीले पत्थरों और मिट्टी पर खड़ा है इसलिए बड़ी परियोजनाओं सही नहीं.
  • 1976 में तैयार महेश चंद्र मिश्र की रिपोर्ट ने परियोजनाएं न रुकने की स्थिति में दी थी तबाही की चेतावनी
  • पढ़िए अब क्या कह रहे हैं स्थानीय लोग और एक्सपर्ट

जोशीमठ शहर के धसान के लिए तपोवन-विष्णुगढ़ बिजली परियोजना की एक सुरंग को मुख्य रूप से ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.

12 किलोमीटर लंबी सुरंग नदी का पानी पन-बिजली स्टेशन के टरबाइन तक ले जाएगी जिसके कुछ हिस्से शहरियों के दावे के अनुसार जोशीमठ की ज़मीन के भीतर से पास हो रहे हैं.

इन लोगों का दावा है कि सुरंग तैयार करने के लिए जो 'ब्लास्ट' किया जा रहा है उसके कारण धरती के भीतर मौजूद कोई प्राकृतिक जलस्रोत फट गया है जिसके बाद शहर के एक हिस्से से बेहद तेज़ कीचड़ वाला पानी पूरे वेग से लगातार बह रहा है और शहर तेज़ी से धंसने लगा है.

हालांकि परियोजना पर काम कर रही कंपनी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) ने ऐसी किसी आशंका से इंकार किया है.

एनटीपीसी ने एक बयान में कहा है कि 'सुरंग शहर के नीचे से नहीं गुज़र रही है. ये सुरंग टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) की मदद से तैयार हो रही है और इसके लिए किसी तरह के विस्फोटक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.'

'जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति' के अतुल सती ने दावा किया है कि कंपनी की टीबीएम मशीन पिछले चार सालों से किसी कारण फंस गई है. अब बाई-पास टनल तैयार की जा रही है और उसमें विस्फोटकों का प्रयोग हो रहा है.

अतुल सती ने कहा कि सुरंग को लेकर कंपनी की क्या नीति है ये तो फ़रवरी 2021 में तपोवन आपदा के समय साफ़ हो गया था जिसमें सौ से अधिक मज़दूरों की मौत हो गई थी. इनमें से बहुतों के शव तक नहीं मिल पाए थे.

उन्होंने कहा, "हम भी सरकार के कहने पर गए थे, लेकिन वहां जाने के क्रम में ये बात सामने आई कि कंपनी के पास तो सुरंग का कोई नक़्शा तक नहीं था, लोगों को सेना और दूसरी संस्थाओं की मदद से निकालने की जो बातें हो रही थीं वो सब कोरे दावों के सिवा कुछ नहीं था."

क्या तपोवन प्रोजेक्ट ज़िम्मेदार है?

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तपोवन प्रोजेक्ट में दो साल पहले ग्लेशियर के तेज़ बहाव के कारण दुर्घटना हुई थी. ये परियोजना भी एनटीपीसी की ही है.

भूगर्भ विज्ञानी एसपी सती का कहना है कि 'जोशीमठ में दो-तीन फ़ीट लंबी दरारें दिखने लगी हैं, ज़मीन कितनी नीचे धंस रही है ये तो अभी साफ़ नहीं हो रहा है, लेकिन शहर पूरी तरह ज़मींदोज़ हो जाएगा. अब प्राचीन आध्यात्मिक शहर रहने लायक़ नहीं रह गया है.'

एसपी सती उस टीम का हिस्सा थे जिसने तपोवन दुर्घटना के बाद जोशीमठ का दौरा किया था और उस पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें आज सामने आ रहे कई मामलों को लेकर प्रशासन को चेताया गया था.

सुरंग में दो तरफ़ से काम?

ख़बरों के मुताबिक तपोवन-विष्णुगढ़ के लिए जो सुरंग तैयार हो रही है उसमें दो तरफ़ से काम हो रहा है- एक तो तपोवन, दूसरे सेलंग गांव की तरफ़ से. इसके लिए एक यूरोपीय कंपनी की मदद ली जा रही है.

कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि सुरंग तैयार करने वाली मशीन से सुरंग बनाने का काम भी कंपनी ने बेहद दबाव के बाद शुरू किया था. प्रोजेक्ट को लेकर कई तरह के सवाल हैं - जैसे धौली नदी और विष्णु गंगा में पानी का बहाव कितना है और पिछले पचास-सौ सालों में बारिश को लेकर क्या किसी तरह के आंकड़े की कोई स्टडी की गई है, वग़ैरह.

ये सवाल लोगों ने साल 2005 में परियोजना को लेकर हुई जन-सुनवाई के दौरान उठाए थे. इन मामलों पर साल 2003 में भारत के राष्ट्रपति को पहले भी चिट्ठी भेजी जा चुकी थी.

जाने-माने पर्यावरणविद् शेखर पाठक कहते हैं कि हिमालय का इलाक़ा ख़ासतौर पर जोशीमठ, जो कभी ढीले पत्थरों और मिट्टी पर खड़ा है, बड़ी परियोजनाओं के लिए है ही नहीं. इस बात को बार-बार जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया भी दोहरा चुका है, लेकिन सरकारें विकास के नाम पर उसकी अनदेखी करती रही हैं.

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रिपोर्ट में दी गई थी चेतावनी

1976 में तैयार महेश चंद्र मिश्र की रिपोर्ट में इन बातों को लेकर चेतावनी दी गई थी और सरकार ने उस समय वहां तैयार हो रही एक परियोजना को रद्द भी कर दिया था.

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग के सेक्रेटरी रंजीत सिन्हा ने नागरिकों के दावों को लेकर कहा कि ये सब क़यास के सिवा कुछ नहीं है, दोनों में किसी तरह का कोई संबंध है ये बात अब तक सामने नहीं आ पाई है और पूरे कारणों की जानकारी किसी स्टडी के बाद ही संभव है.

रंजीत सिन्हा का कहना था कि शासन इस मामले की खोजबीन का काम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हाईड्रॉलोजी को सौंपने जा रहा है.

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सरकार किराये के मकान मुहैया करा रही है

पिछले कुछ दिनों से शहर में घरों और दूसरे स्थानों पर पड़ रही दरारों और उनके धंसने की घटना में तेज़ी आने के बाद प्रशासन अब तक सौ से ज़्यादा परिवारों को शिफ़्ट करवा चुका है, जो सरकारी शिविरों में रह रहे हैं.

जबकि कई लोगों ने दूसरे सुरक्षित स्थानों पर किराये के मकान लिए हैं जिसके लिए उत्तराखंड सरकार प्रति परिवार चार हज़ार रुपये किराये के तौर पर दे रही है.

आपदा प्रबंधन के लिए सरकार ने 11 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है.

हालांकि एसपी सती का कहना है कि अब कुछ लोगों को नहीं बल्कि अलग-अलग समूहों में पूरे शहर को वहां से हटाकर दूसरी जगह बसाने की ज़रूरत है और इसके लिए सबसे अधिक प्रभावित, उससे कम और उसके बाद वालों की लिस्ट तैयार करनी होगी.

नागिरकों का कहना है कि इसके लिए एक समिति तैयार हो जिसमें स्थानीय लोगों को भी शामिल किया जाए.

कुछ नागरिकों ने आरोप लगाया कि लोग 14 माह से इस मामले को उठा रहे थे, लेकिन प्रशासन अब जागा है. वहीं रंजीत सिन्हा का कहना है कि शासन ने इस मामले में एक सर्वेक्षण करवाया था जिसके बाद पानी की निकासी और दीवार बांधने वग़ैरह का काम भी शुरू किया गया था.

हालांकि अतुल सती ने एक बातचीत में आरोप लगाया कि 'सर्वेक्षण के दौरान लोगों पर दबाव बनाया गया. लगता है सरकार ये चाहती थी कि आपदा बढ़े ताकि उसके लिए बड़ी रक़म मुहैया हो सके.'

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