मशहूर है मेघालय का 'विसेल विलेज', सीटी बजाकर एक दूसरे से बात करते हैं लोग
मेघालय का एक गांव अपने अजीबोगरीब रीति-रीवाजों को लेकर चर्चा में है। इस गांव में 700 लोग रहते हैं और यहां बातचीत के लिए 700 तरह के ही साउंड का इस्तेमाल किया जाता है।

मेघालय आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर खबरों में है। ये चुनाव 27 फरवरी को होने जा रहे हैं। सभी नेता वोटर्स पाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं। मेघालय राज्य अपने हरे-भरे जंगलों और शानदार माहौल के लिए जाना जाता है। राज्य में कई ऐसी दुर्लभ वनस्पतियां हैं, जो कहीं और नहीं पाई जातीं। यहां की यही खूबियां इसे एक बेहतरीन टूरिस्ट प्लेस बनाती हैं। सदियों से यहां पुरानी संस्कृतियों का भी संरक्षण होता आया है। आज भी यहां लोग कुछ अनोखी और दुर्लभ परंपराओं के साथ जीते हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है सीटी कम्यूनिकेशन। जी हां! यहां लोग बोलकर नहीं बल्कि सीटी बजाकर एक दूसरे से बातचीत करते हैं।

अनोखे तरीके से संदेश पहुंचाते हैं लोग
राजधानी शिलॉंग से 60 किलोमीटर दूर पूर्वी खासी हिल्स जिले में स्थित इस गांव का नाम कोंगथोंग है। ये गांव बेहद अनोखा है, जिसे व्हिसलिंग विलेज के नाम से भी जाना जाता है। इसके नाम के पीछे का कारण बड़ा ही दिलचस्प है। दरअसल, यहां लोग एक दूसरे तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए सीटी की धुन का इस्तेमाल करते हैं, जिस कारण इसे ये अनोखा नाम भी मिला है।

बेहद खास है लोगों की धुन
हर एक ग्रामीण के लिए ये धुन बेहद ही खास है। यहां के ग्रामीण एक दूसरे को इस अनोखी धुन से बुलाते हैं। ये परंपरा आज से नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही है। न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, फिवस्टार खोंगसित नाम के एक ग्रामीण बताते हैं कि कोंगथोंग के ग्रामीणों ने इस खास और अनोखी धुन को जिंगरवाई लवबी नाम दिया है। इसका मतलब है कि मां का प्यार भरा गीत।

700 लोगों की 700 धुन
ग्रामीण जिप्सन सोखलेट बताते हैं कि इस गांव में तकरीबन 700 लोग रहते हैं। इसलिए यहां 700 अलग-अलग तरीके की धुन हैं। एक गीत है लेकिन उसे गाने के तरीके भी अलग अलग हैं। एक पूरा गीत और एक छोटी सी धुन। इससे भी दिलचस्प बात तो ये है कि अगर इस गांव का कोई एक व्यक्ति भी मर जाता है तो उसके साथ वो गीत या फिर वो धुन भी खत्म हो जाएगी। उसके जाने के बाद उस गीत या फिर उस धुन का इस्तेमाल कभी भी नहीं किया जाएगा।

सदियों से चली आ रही परंपराएं
भारत में ऐसे न जाने कितने ही गांव हैं, जहां पारंपरिक रीति-रिवाज अभी तक चले आ रहे हैं। इन स्थानीय लोगों ने खुद पर कभी भी पाश्चात्य संस्कृति या फिर कल्चर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। आज भी कई ऐसी रीतियां हैं, जिनके बारे में सुनकर या फिर जिन्हें देखने के बाद आपको अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो पाएगा। ऐसी ही कहानी मेघालय के इस गांव की भी है।
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