पाकिस्तान में पहला टेस्ट ट्यूब बेबी जिसे 'गुनाह' और 'हराम' बताया गया

सांकेतिक तस्वीर
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पाकिस्तान में बांझपन के इलाज के लिए आईवीएफ़ की शुरुआत 1984 में हुई थी और मुल्क में इसकी शुरुआत करने वाले थे डॉक्टर राशिद लतीफ़ ख़ान. जिन्होंने लाहौर में पाकिस्तान के पहले आईवीएफ़ सेंटर 'लाइफ़' की स्थापना की थी.

पांच साल के उनके लगातार प्रयास के बाद साल 1989 में पाकिस्तान के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म संभव हुआ.

ब्रिटेन में जब दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा हुआ था, तो कुछ लोगों ने इसे सच मानने से इनकार कर दिया, तो कुछ ने इसकी आलोचना की थी.

भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म कराने वाले डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने तो लगातार आलोचना और उत्पीड़न से परेशान होकर अंत में आत्महत्या ही कर ली थी.

उनकी कहानी किसी और दिन बताएंगे, लेकिन अभी बात करते हैं डॉक्टर राशिद की जिनकी यात्रा बिल्कुल भी आसान नहीं थी और उन्हें भी कमोबेश इसी तरह के रवैयों का सामना करना पड़ा.

आज पाकिस्तान में हर साल हज़ारों बच्चे आईवीएफ़ से पैदा होते हैं लेकिन जब डॉक्टर राशिद ने इस तकनीक को पाकिस्तान लाने के बारे में सोचा, उस समय पूरी दुनिया में इसके बारे में लगभग कोई जागरूकता और संसाधन नहीं थे.

उन्होंने इसके लिए ऑस्ट्रेलिया को एक पत्र लिखा, जहां दुनिया के तीसरे टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ था और उनसे इस संबंध में प्रशिक्षण लेने के लिए आवेदन किया.

उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया और डॉक्टर राशिद कोर्स करने के लिए ऑस्ट्रेलिया चले गए. जब वो ऑस्ट्रेलिया से वापस लौटे, तो उन्होंने एक आईवीएफ़ केंद्र की स्थापना कर इसकी शुरुआत की, लेकिन पांच सालों तक उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

हालांकि, डॉक्टर राशिद के मुताबिक़ उन्हें इस इलाज के लिए कभी भी लोगों की तलाश नहीं करनी पड़ी क्योंकि बच्चे की चाहत रखने वाले जोड़े आस लिए उनके पास आते रहे.

वह कहते हैं, "मैंने हमेशा अपने मरीज़ों को सच बताया कि हमें इस इलाज में सफलता नहीं मिल रही है, लेकिन मेरे पास आने वाले हर जोड़े को मुझ पर और मेरी टीम पर पूरा भरोसा था, इसलिए वे कहते थे कि डॉक्टर साहब बिस्मिल्लाह कीजिये हमारा हो जायेगा."

पाकिस्तान में आईवीएफ़ से पहला गर्भधारण

डॉक्टर राशिद बताते हैं कि जब इस इलाज से पहला गर्भ ठहरा, तो उनकी टीम के एक सदस्य का भाई पाकिस्तान के एक प्रमुख अख़बार में काम करता था, इसलिए उन्होंने उस अख़बार में 'पाकिस्तान में आईवीएफ़ से पहला गर्भधारण हो गया है' शीर्षक से ख़बर छपवा दी.

इस ख़बर के छपने के बाद दस मौलवियों ने इसके ख़िलाफ़ मीडिया में बयान जारी कर इसे 'हराम' और अमेरिकी साज़िश बताया.

लेकिन इस गर्भधारण को कुछ ही समय बाद 'एक्टोपिक' गर्भ होने की वजह से गर्भपात कराना पड़ा.

जब आईवीएफ़ के ज़रिये दूसरी महिला को गर्भ ठहरा और कुछ महीने गुज़र गए, तो डॉक्टर राशिद ने आलोचना कर चुके मौलवियों से एक-एक कर मिलकर पूछा, कि क्या वो आईवीएफ़ प्रक्रिया के बारे में जानते भी हैं?

वो बताते हैं, "उस समय पाकिस्तान में बाईपास नया-नया शुरू हुआ था, तो मैंने उनसे कहा कि अगर पुरुष की दिल की नसों में मौजूद किसी विकार को दूर करने के लिए हार्ट का बाईपास किया जा सकता है, तो महिला के गर्भाशय में मौजूद विकार को दूर करने के लिए भी तो बाईपास किया जा सकता है? जिस पर इन मौलवियों को मेरी बात समझ आ गई."

जब पाकिस्तान के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म का दिन नज़दीक आया तो इसके लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए. बच्चे के जन्म के लिए 6 जुलाई 1989 का दिन चुना गया और उसी दिन पांच और डिलीवरी करवाई गईं ताकि लोग आईवीएफ़ पद्धति वाले दंपत्ति को तंग न करें.

अगले दिन जब अख़बार में ये ख़बर आई कि पाकिस्तान का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा हो गया है, तो बच्चे के पिता डॉक्टर के पास आए और कहा कि डॉक्टर साहब ये ख़बर पढ़ कर मेरे पिता (बच्चे के दादा) पूछ रहे थे, कि ये हराम काम तुमने तो नहीं किया?

आईवीएफ़ क्या है?

किसी पुरुष या महिला में दोष या जटिलता के कारण, जब पुरुष का शुक्राणु महिला के एग्स तक नहीं पहुंच पाता है तो इसकी वजह से प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म संभव नहीं हो पाता है.

ऐसे में महिला के एग्स और पुरुष के शुक्राणु को उनके शरीर से बाहर निकाल कर लेबोरेटरी में मिला दिया जाता है. इसके दो दिन बाद इसे महिला के गर्भाशय में रख दिया जाता है, जहां यह सामान्य गर्भ की तरह विकसित होता है और नौ महीने बाद बच्चे का जन्म होता है.

हालांकि, यह आईवीएफ़ की केवल एक किस्म है. इसके अलावा, 'सरोगेसी', 'एग डोनेशन' और 'स्पर्म डोनेशन' के ज़रिये निःसंतान दंपत्ति भी संतान का सुख प्राप्त कर सकते हैं.

सरोगेसी की प्रक्रिया में एक पुरुष के शुक्राणु और महिला के एग को मिलाकर तीसरी महिला के गर्भाशय में रख दिया जाता है, जहां नौ महीने तक विकसित होने के बाद बच्चे का जन्म होता है.

इसके अलावा, यदि किसी पुरुष के शुक्राणु या महिला के एग की गुणवत्ता एक स्वस्थ बच्चा पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो इसके बजाय किसी डोनर के एग या शुक्राणु से भी बच्चे का जन्म संभव है.

यानी अगर पत्नी के एग की गुणवत्ता अच्छी नहीं है तो पति के शुक्राणु के साथ किसी और महिला का एग मिलाकर पत्नी के गर्भाशय में या दूसरी महिला (सरोगेट मदर) के गर्भाशय में पलने के लिए रखा जा सकता है.

इसी तरह यदि किसी पुरुष के शुक्राणु की गुणवत्ता अच्छी नहीं है, तो पत्नी के एग्स को दूसरे पुरुष के शुक्राणु के साथ मिलाया जा सकता है.

लैब
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आईवीएफ़ से 'बेटा' या 'बेटी' चुनना संभव है?

आईवीएफ़ के ज़रिये पैदा होने वाले बच्चे के लिंग का चयन भी संभव है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ पाकिस्तानी समाज में ज़्यादातर लोग बेटा चाहते हैं और अक्सर इस इच्छा को पूरा करने के लिए एक के बाद एक बेटी पैदा करने और एक से ज्यादा शादियां करने से भी नहीं कतराते.

इसलिए, पाकिस्तान में 'फैमिली स्पेसिंग' के तहत, आईवीएफ़ करवाने वाले दंपति बच्चे के लिंग का चयन कर सकते हैं.

दुनिया के अन्य देशों में भी आईवीएफ़ से पैदा होने वाले बच्चे के लिंग का चयन किया जा सकता है, लेकिन यह विकल्प माता-पिता की व्यक्तिगत पसंद या नापसंद पर आधारित नहीं होता है. यह विकल्प तब होता है जब माता-पिता में मौजूद किसी जेनेटिक बीमारी के बच्चे में आने का ख़तरा हो.

कुछ ऐसी जेनेटिक बीमारी होती है जिनका ख़तरा लड़कियों में अधिक होता है इसलिए उनके आधार पर बेटे और बेटी का चयन किया जाता है.

फाइल फोटो
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क्या पाकिस्तानी क़ानून और इस्लाम में आईवीएफ़ की अनुमति है?

जब 1978 में दुनिया के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ तब मिस्र की अल-अज़हर यूनिवर्सिटी ने 1980 में एक फ़तवा जारी किया था. फ़तवे में कहा गया था कि अगर आईवीएफ़ में इस्तेमाल किए गए एग्स पत्नी और शुक्राणु पति के हैं, तो पैदा होने वाला बच्चा जायज़ और शरीयत के अनुसार होगा.

इसलिए, जब पाकिस्तान में पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ तो बहुत से मौलवियों ने इस पर व्यक्तिगत तौर पर आपत्तियां जताई थीं लेकिन अल-अज़हर यूनिवर्सिटी के इस फ़तवे के आधार पर, 2015 तक राज्य स्तर पर आईवीएफ़ के संबंध में कोई आपत्ति सामने नहीं आई थी.

लेकिन फिर 2015 में आईवीएफ़ से पैदा हुए बच्चे की कस्टडी के मुद्दे पर एक जोड़े ने फेडरल शरिया कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

नवजात शिशु
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नवजात शिशु

पाकिस्तान मूल के अमेरिकी डॉक्टर फ़ारूक़ सिद्दीक़ी और उनकी पत्नी कई सालों से निःसंतान थे. इसलिए उन्होंने अख़बार में विज्ञापन दिया कि उन्हें बच्चा पैदा करने के लिए किराए की कोख की ज़रूरत है यानी उनके होने वाले बच्चे की सरोगेट मां बने और इसके लिए उस महिला को मुआवज़ा भी दिया जाएगा.

इस विज्ञापन को पढ़ने के बाद, फरज़ाना नाहीद ने डॉक्टर फ़ारूक़ सिद्दीक़ी से संपर्क किया और उनके बच्चे की मां बनने की इच्छा व्यक्त की. डॉक्टर फ़ारूक़ का दावा है कि उन्होंने नाहीद के साथ एक मौखिक समझौता किया था कि वह उनके बच्चे को जन्म देगी जिसके लिए उसे मुआवज़ा दिया जाएगा.

डॉक्टर फ़ारूक़ के मुताबिक, उन्होंने फरज़ाना को डॉक्टर की जांच और इलाज के लिए 25 हज़ार रुपये दिए.

फरज़ाना ने नौ महीने बाद एक बेटी को जन्म दिया, लेकिन बेटी को जन्म देने के बाद उन्होंने डॉक्टर फ़ारूक़ और उनकी पत्नी को बच्चा देने से इनकार कर दिया और दावा किया कि वह डॉक्टर फ़ारूक़ की पत्नी हैं, इसलिए डॉक्टर फ़ारूक़ हर महीने उन्हें बच्ची का खर्चा दें.

जबकि डॉक्टर फ़ारूक़ का कहना था कि परिवार वालों की आलोचना से बचने के लिए उन्होंने फरज़ाना से शादी करने का नाटक किया था.

गर्भवती महिला
PA Media
गर्भवती महिला

सरोगेसी गैरक़ानूनी घोषित

फेडरल शरिया कोर्ट ने 2017 में केस का फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि आईवीएफ़ पाकिस्तानी क़ानून और शरिया के अनुसार तभी सही माना जायेगा जब इसमें इस्तेमाल किये गए एग और गर्भाशय दोनों पत्नी के हों और शुक्राणु पति का हो.

शरिया कोर्ट ने इस फ़ैसले में डोनेशन के एग्स और शुक्राणुओं से पैदा हुए बच्चे को नाजायज़ माना. साथ ही सरोगेसी को भी गैरक़ानूनी घोषित कर दिया था.

अदालत ने इस संबंध में और नियम इसी आधार पर बनाने के हुक्म जारी किए.

हालांकि, ईरान और लेबनान में, डोनेट किए गए एग से पैदा होने वाले बच्चे को वैध माना गया है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडीज़ के अनुसार, पाकिस्तान में 22 प्रतिशत जोड़ो में बांझपन की समस्या है, जिसका मतलब है कि पांच जोड़ों में से एक जोड़ा प्राकृतिक तरीके से बच्चा पैदा करने में असमर्थ है और उन्हें इसके लिए मदद की ज़रूरत है.

डॉक्टर राशिद लतीफ़ का कहना है कि हालांकि, बांझपन की संभावना पुरुषों और महिलाओं में बराबर होती है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में बच्चे न होने के लिए ज़्यादातर पत्नियों को दोषी ठहराया जाता है और पुरुष अपना टेस्ट कराने से हिचकते हैं.

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