कैसे पृथ्वी पर सूर्य जैसी ऊर्जा पैदा करने में लगी हैं ये भारतीय वैज्ञानिक ? जानिए

गांधीनगर, 11 जुलाई: जीवाश्म ईंधन के संकट ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश में लगा रखा है। ऊर्जा के ऐसे स्रोतों की तलाश हो रही है, जो ज्यादा दिनों तक चले भी और पर्यावरण को भी संकट की स्थिति से बाहर निकाले। काम आसान नहीं है। लेकिन, इसमें एक भारतीय वैज्ञानिक भी लगी हुई हैं, जो पृथ्वी पर ही सूर्य जैसी ऊर्जा पैदा करना चाहती हैं, जो मानवीय जरूरतों को भी पूरा कर सके और उसका प्रकृति पर कोई बुरा प्रभाव भी ना पड़े। चुनौती कठिन है। लेकिन बुलंद हौसले से इस नई तकनीक पर प्रयोगों का दौर जारी है। सबकुछ उम्मीदों के मुताबिक चला तो जल्द ही अच्छे नतीजे भी सामने आ सकते हैं।

सूर्य पर कैसे पैदा होती है ऊर्जा ?

सूर्य पर कैसे पैदा होती है ऊर्जा ?

सूर्य और बाकी सितारे असीमित ऊर्जा के स्रोत हैं। यह अक्षय ऊर्जा पैदा करते हैं, जो कभी खत्म नहीं होने वाली। यह ऊर्जा तब पैदा होती है, जब हाइड्रोजन गैस अत्यधिक तापमान पर एक दूसरे से टकराती हैं। तारों के मूल भाग का तापमान करीब 15,000,000 डिग्री सेल्सियत तक रहता है। इतने उच्च तापमान पर हाइड्रोजन के परमाणु अपने इलेक्ट्रोन खो देते हैं और आयनित अवस्था में बदल जाते हैं, जिसे प्लाजमा कहा जाता है। बाकी बचे नूक्लीअस तब आपस में टकराकर हीलियम गैस बन जाते हैं। इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर फ्यूजन कहते हैं, जिसमें असीमित ऊर्जा पैदा होती है।

सेजल शाह और उनकी टीम इस अभियान में लगी है

सेजल शाह और उनकी टीम इस अभियान में लगी है

न्यूजबाइट्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्लाजमा शोधकर्ताओं की एक टीम इसी तरह की ऊर्जा पृथ्वी पर पैदा करने के अभियान में लगी है और इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाजमा रिसर्च, गांधीनगर की सेजल शाह भी उसी टीम का हिस्सा हैं। शाह और उनके सहयोगी सूर्य और बाकी अरबों सितारों पर जिस तरह हर वक्त ऊर्जा निकलती है, उस प्रक्रिया को पृथ्वी पर दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा हो सके। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग से बदहाल इंसान के लिए इनका काम कुछ ऐसा है, जो दुनिया को ग्रीन एनर्जी का बेहतर वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करवा सकता है।

यह प्रयोग क्यों महत्वपूर्ण है ?

यह प्रयोग क्यों महत्वपूर्ण है ?

इंसान आज ऊर्जा पर जितना निर्भर हो चुका है, उतना कभी नहीं रहा। अपनी गलतियों की वजह से हम जीवाश्म ईंधन को खोते जा रहे हैं और अब ज्यादा समय तक इसके भरोसे नहीं रह सकते। जीवाश्म ईंधन के गलत इस्तेमाल ने पृथ्वी को इससे लगभग दूर करना शुरू कर दिया है। जबतक यह पूरी तरह से खत्म हो जाए, उससे पहले ही किसी विकल्प की आवश्यकता है और सेजल शाह उसी के लिए प्रयासरत हैं।

जीवाश्म ईंधन के भरोसे हम कब से हैं ?

जीवाश्म ईंधन के भरोसे हम कब से हैं ?

औद्योगिक क्रांति के समय से मानव ने अपने विकास के लिए जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध दोहन किया है। इसका फायदा उठाने के चक्कर में हमने इसके साथ अन्याय किया है और परिणाम हमें ही भुगतना पड़ रहा है। एक तरफ जीवाश्म ईंधन तो विलुप्त हो ही रहा है, ऊपर से इसके उपभोग ने ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन करके हमारी धरती को जलवायु को संकट में डाल दिया है। लिहाजा, पूरी दुनिया के वैज्ञानिक ग्रीन एनर्जी के स्रोत की तलाश में लगे हुए हैं, जो पृथ्वी को कम से कम सांस लेने लायक बने रहने दें।

Tokamaks क्या है और यह कैसे काम करता है ?

Tokamaks क्या है और यह कैसे काम करता है ?

धरती पर न्यूक्लियर फ्यूजन (परमाणु संलयन) की स्थिति पैदा करने के लिए सबसे पहले हमें उस उच्च तापमान को प्राप्त करने की आवश्यकता है, जिस स्थिति में परमाणु आपस में टकरा सकें। दूसरा, प्लाजमा बनाने के लिए प्रयोगशाला में नूक्लीअस को टकराने की स्थिति पैदा करना जरूरी है। इसके लिए वैज्ञानिक Tokamaks नाम के एक विशेष उपकरण का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें प्लाजमा को रखकर न्यूक्लियर रियेक्शन को अंजाम दिया जा सके। इसका लक्ष्य Tokamaks में उपभोग होने वाली ऊर्जा से ज्यादा ऊर्जा उत्पादित करना है।

वैज्ञानिक शाह का परीक्षण अभी किस अवस्था में है ?

वैज्ञानिक शाह का परीक्षण अभी किस अवस्था में है ?

शाह प्लाज्मा शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय संघ में शामिल हैं, जो इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंट रिएक्टर (आईटीईआर) नाम के दुनिया के सबसे बड़े न्यूक्लियर फ्यूजन (परमाणु संलयन) की कोशिश में लगे हैं। यह टीम उसी तरह के परमाणु संयलन की स्थिति पृथ्वी पर पैदा करने में लगी है, जो सूर्य और बाकी सितारों के मूल भाग में होता है। गौरतलब है कि परमाणु संलयन से पैदा हुई ऊर्जा नुकसानदेह गैसों से मुक्त होती है और जीवाश्म ईंधन के मुकाबले ज्यादा समय तक रहने वाली है। (तस्वीरें- प्रतीकात्मक)

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